पेट्रोल-डीजल पर टैक्स में बड़ा बदलाव, पेट्रोल पर जीरो टैक्स, डीजल पर ₹11.50
बिज़नेस : केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाली स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) में बड़ा बदलाव किया है। सरकार ने निर्यात किए जाने वाले पेट्रोल पर इस विशेष शुल्क को पूरी तरह समाप्त करने का फैसला लिया है। वहीं डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) यानी विमान ईंधन पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क बढ़ाया गया है। इस फैसले का असर मुख्य रूप से पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात, तेल कंपनियों की लागत और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धा पर पड़ सकता है।
सरकार का यह कदम ऐसे समय सामने आया है, जब अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की कीमतों, आपूर्ति और समुद्री परिवहन को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। पश्चिम एशिया में तनाव के कारण तेल बाजार पर दबाव है और कई देशों की ऊर्जा नीतियों में बदलाव देखने को मिल रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत सरकार ने अलग-अलग पेट्रोलियम उत्पादों पर शुल्क की दरों में संशोधन किया है।
हालांकि, इस फैसले को घरेलू पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में सीधे बदलाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। निर्यात पर लगने वाले विशेष शुल्क और पेट्रोल पंपों पर बिकने वाले ईंधन की कीमतें अलग-अलग विषय हैं।
पेट्रोल पर स्पेशल एक्साइज ड्यूटी पूरी तरह समाप्त
सरकार ने पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाली स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी को शून्य कर दिया है। इसका मतलब है कि संबंधित प्रावधान के तहत पेट्रोल निर्यात करने वाली कंपनियों को अब यह विशेष शुल्क नहीं देना होगा।
इस बदलाव से पेट्रोल निर्यात की लागत कम हो सकती है। भारतीय रिफाइनरियां घरेलू बाजार के साथ विदेशों में भी पेट्रोलियम उत्पाद बेचती हैं। ऐसे में निर्यात शुल्क में कमी से उनकी लागत और व्यापारिक निर्णय प्रभावित हो सकते हैं।
हालांकि, इसका वास्तविक फायदा अंतरराष्ट्रीय कीमतों, परिवहन खर्च और कंपनियों के निर्यात अनुबंधों पर निर्भर करेगा।
डीजल के निर्यात पर 3 रुपये प्रति लीटर बढ़ा टैक्स
केंद्र सरकार ने हाई-स्पीड डीजल के निर्यात पर लगने वाली SAED को 8.50 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 11.50 रुपये प्रति लीटर कर दिया है। यानी अब डीजल निर्यात करने वाली कंपनियों को पहले की तुलना में प्रति लीटर तीन रुपये अधिक विशेष शुल्क देना होगा।
इसके अलावा एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात पर शुल्क 10.50 रुपये से बढ़ाकर 11 रुपये प्रति लीटर किया गया है। इसमें 50 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है।
वित्त मंत्रालय ने 31 अक्टूबर 2026 को जारी अधिसूचनाओं के जरिए ये बदलाव लागू किए हैं।
पेट्रोल-डीजल और ATF की नई एक्सपोर्ट ड्यूटी
पेट्रोलियम उत्पाद पुरानी दर नई दर
पेट्रोल ₹2.50/लीटर ₹0
डीजल ₹8.50/लीटर ₹11.50
एविएशन फ्यूल (ATF) ₹10.50/लीटर ₹11.00
ये दरें 31 अक्टूबर 2026 से निर्यात पर लागू हैं, घरेलू खुदरा बिक्री पर नहीं।
आम जनता को क्या पेट्रोल सस्ता मिलेगा?
सरकार के इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम होंगी?
इसका जवाब है कि इस अधिसूचना से घरेलू ईंधन की कीमतों में सीधे कोई बदलाव नहीं हुआ है। सरकार ने निर्यात पर लगने वाले विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क में संशोधन किया है।
भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें कई कारकों पर निर्भर करती हैं। इनमें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च, केंद्रीय कर, राज्यों का वैट और तेल विपणन कंपनियों के मूल्य निर्धारण संबंधी निर्णय शामिल हैं।
इसलिए पेट्रोल के निर्यात पर शुल्क समाप्त होने का मतलब यह नहीं है कि घरेलू बाजार में पेट्रोल तुरंत 2.50 रुपये प्रति लीटर सस्ता हो जाएगा। इसी तरह डीजल निर्यात पर शुल्क बढ़ने से घरेलू डीजल की कीमत अपने आप तीन रुपये नहीं बढ़ती।
क्या है स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी?
स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी एक विशेष उत्पाद शुल्क है, जिसे सरकार निर्धारित पेट्रोलियम उत्पादों पर लागू कर सकती है। मौजूदा व्यवस्था में इसका इस्तेमाल पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन के निर्यात पर किया जा रहा है।
इसे आम बोलचाल में विंडफॉल टैक्स से भी जोड़ा जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव के दौरान सरकार इस प्रकार के शुल्क में बदलाव कर सकती है।
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की कीमतें बढ़ती हैं, तो कुछ परिस्थितियों में निर्यात घरेलू बिक्री के मुकाबले अधिक लाभदायक हो सकता है। ऐसे में निर्यात शुल्क का इस्तेमाल देश में पर्याप्त ईंधन उपलब्ध रखने और निर्यात से होने वाले अतिरिक्त लाभ को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।
मार्च 2026 में क्यों लगाया गया था निर्यात शुल्क?
पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े जोखिमों के बीच केंद्र सरकार ने 27 मार्च 2026 से पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर विशेष शुल्क की व्यवस्था लागू की थी।
सरकार का उद्देश्य घरेलू बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना था। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय कीमतों की स्थिति को देखते हुए समय-समय पर शुल्क दरों की समीक्षा की जा रही है।
वित्त मंत्रालय के अनुसार, दरें तय करने में पिछले समीक्षा काल के दौरान कच्चे तेल और संबंधित पेट्रोलियम उत्पादों की औसत अंतरराष्ट्रीय कीमतों को ध्यान में रखा जाता है।
तेल कंपनियों पर क्या होगा असर?
पेट्रोल निर्यात करने वाली रिफाइनरियों को विशेष शुल्क समाप्त होने से लागत के स्तर पर राहत मिल सकती है। इससे निर्यात के लिए उपलब्ध पेट्रोल की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित हो सकती है।
दूसरी ओर डीजल और ATF पर शुल्क बढ़ने से इन उत्पादों का निर्यात अपेक्षाकृत महंगा हो जाएगा। कंपनियों को अपने निर्यात अनुबंधों और संभावित मुनाफे का आकलन नई दरों के आधार पर करना होगा।
हालांकि, इस बदलाव से निर्यात कितना बढ़ेगा या घटेगा, इसका आकलन केवल शुल्क दरों के आधार पर नहीं किया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय मांग, उत्पादों की कीमतें, मालभाड़ा और घरेलू जरूरतें भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
घरेलू ईंधन आपूर्ति पर सरकार की नजर
भारत कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। देश में रिफाइनरियां आयातित कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल, विमान ईंधन और अन्य उत्पादों में बदलती हैं।
वैश्विक तनाव के समय कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने या कीमतें बढ़ने का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे में सरकार के सामने घरेलू बाजार की जरूरतें पूरी करने और निर्यात व्यापार के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती रहती है।
पेट्रोल पर निर्यात शुल्क हटाने और डीजल तथा ATF पर बढ़ाने के फैसले को इसी व्यापक ऊर्जा नीति के संदर्भ में देखा जा सकता है।