बिजनेस : कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आम लोगों और कई उद्योगों के लिए राहत की खबर लेकर आई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव 88 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आने के बाद पेट्रोल-डीजल, पेंट, प्लास्टिक और कई अन्य सेक्टरों को फायदा मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। लेकिन दूसरी तरफ पैकेज्ड फूड कंपनियों के लिए यह स्थिति एक नई चुनौती बनकर सामने आ रही है। कम ऊर्जा लागत जहां उत्पादन और परिवहन खर्च को कम कर रही है, वहीं कंपनियों के लिए अपने उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी करना मुश्किल हो गया है।
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में बार्कलेज के विश्लेषकों के हवाले से बताया गया है कि तेल की कीमतों में गिरावट से कंपनियों को कई स्तरों पर राहत मिलती है। ट्रांसपोर्टेशन, पैकेजिंग और मैन्युफैक्चरिंग लागत कम होने से कंपनियों का खर्च घट सकता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि कंपनियों के पास अब कीमतें बढ़ाने का मजबूत आधार नहीं रह जाता। ऐसे समय में जब ग्राहक पहले ही महंगाई से परेशान हैं, कंपनियों के लिए ज्यादा कीमत वसूलना बिक्री पर असर डाल सकता है।
पैकेज्ड फूड सेक्टर पिछले कुछ समय से कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। कच्चे माल की बढ़ती कीमतें, सप्लाई चेन की समस्याएं और महंगाई के कारण कंपनियों को अपने मार्जिन बचाने के लिए कई कदम उठाने पड़े हैं। कई कंपनियों ने लागत बढ़ने के कारण अपने उत्पादों की कीमतों में इजाफा किया, लेकिन इसका असर ग्राहकों की खरीदारी क्षमता पर पड़ा।
अगर भारतीय पैकेज्ड फूड कंपनियों के शेयर प्रदर्शन पर नजर डालें तो तस्वीर मिली-जुली दिखाई देती है। इस साल नेस्ले इंडिया के शेयरों में 14 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। वहीं दूसरी ओर ब्रिटानिया के शेयरों में करीब 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। स्नैक्स और फूड प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनी बीकाजी फूड्स के शेयर भी इस साल करीब 14 प्रतिशत नीचे आ चुके हैं।
अमेरिकी बाजार में भी पैकेज्ड फूड कंपनियां दबाव में हैं। जनरल मिल्स के शेयरों में इस साल अब तक करीब 25 प्रतिशत की गिरावट आई है। वहीं कैंपबेल के शेयर लगभग 24 प्रतिशत और कॉनाग्रा ब्रांड्स के शेयर करीब 22 प्रतिशत तक गिर चुके हैं। इन आंकड़ों से साफ पता चलता है कि दुनियाभर में पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री मांग और लागत के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
बिक्री बढ़ाने के लिए कंपनियां दे रही हैं ऑफर
पैकेज्ड फूड कंपनियां इस समय एक मुश्किल स्थिति में फंस गई हैं। एक तरफ उत्पादन लागत और अन्य खर्चों का दबाव है, वहीं दूसरी तरफ कीमतें बढ़ाने के बाद ग्राहकों की खरीदारी कम हो रही है। बढ़ते किराना खर्च के कारण कई ग्राहक जरूरी सामान की खरीदारी में भी कटौती कर रहे हैं।
इस स्थिति से निपटने के लिए कंपनियां अब नए तरीके अपना रही हैं। कई कंपनियां ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए प्रमोशनल ऑफर, डिस्काउंट और छोटे पैक लॉन्च कर रही हैं। कुछ कंपनियां सीधे कीमतों में कटौती करके बिक्री बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। कंपनियों का लक्ष्य है कि ग्राहकों की मांग फिर से मजबूत हो और बिक्री में सुधार आए।
हालांकि, कंपनियों पर लागत का दबाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। कुछ समय पहले मिडिल ईस्ट में तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण ऊर्जा कीमतों में तेजी आई थी। इससे सप्लाई चेन प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया था। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती तो खाद्य कंपनियों को अपने मुनाफे को बचाने के लिए कीमतें और बढ़ानी पड़ सकती थीं।
खासकर उन कंपनियों के लिए स्थिति ज्यादा कठिन है, जिन पर कर्ज का बोझ ज्यादा है। ऐसी कंपनियों के लिए मुनाफे का स्तर बनाए रखना बेहद जरूरी होता है। कई बार उन्हें बिक्री में गिरावट का जोखिम उठाकर भी कीमतें बढ़ानी पड़ती हैं ताकि उनका मार्जिन सुरक्षित रह सके।
अब कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से जहां कुछ खर्च कम होंगे, वहीं कंपनियों के सामने ग्राहक मांग को बनाए रखने की चुनौती बनी रहेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में पैकेज्ड फूड कंपनियों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे लागत नियंत्रण, कीमतों और ग्राहकों की जरूरतों के बीच कितना बेहतर संतुलन बना पाती हैं।
कुल मिलाकर कच्चे तेल की गिरती कीमतें अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों के लिए राहत लेकर आई हैं, लेकिन पैकेज्ड फूड सेक्टर के लिए यह एक अलग तरह की चुनौती बन गई है। अब कंपनियों को कम लागत का फायदा ग्राहकों तक पहुंचाने और अपनी बिक्री बढ़ाने के बीच सही रणनीति तैयार करनी होगी।