बिजनेस : नौकरीपेशा लोगों के लिए EPF यानी Employees' Provident Fund रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा का एक अहम साधन है। हर महीने कर्मचारी की सैलरी से एक हिस्सा EPF खाते में जमा होता है और नियोक्ता भी इसमें योगदान करता है। लंबे समय तक लगातार निवेश और ब्याज पर ब्याज यानी कंपाउंडिंग के कारण यह रकम रिटायरमेंट तक बड़ा फंड बन सकती है। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह है कि अगर किसी कर्मचारी की मौजूदा सालाना सैलरी 15 लाख रुपये है और उसकी उम्र 30 साल है, तो क्या वह 60 साल की उम्र तक केवल EPF के जरिए 5 करोड़ रुपये का रिटायरमेंट कॉर्पस तैयार कर सकता है?
इसका सीधा जवाब है कि यह संभव हो सकता है, लेकिन यह कई महत्वपूर्ण बातों पर निर्भर करता है। इनमें कर्मचारी की बेसिक सैलरी, EPF में वास्तविक योगदान, हर साल होने वाली सैलरी बढ़ोतरी, EPF की ब्याज दर और नौकरी के दौरान खाते से पैसे निकालने जैसी स्थितियां शामिल हैं।
एक अनुमान के मुताबिक, अगर कर्मचारी की उम्र 30 साल है, सालाना CTC 15 लाख रुपये है और रिटायरमेंट की उम्र 60 साल रखी जाती है, तो उसके पास निवेश के लिए करीब 30 साल का समय होगा। इस गणना में EPF पर 8.25 प्रतिशत सालाना ब्याज, कर्मचारी की ओर से बेसिक सैलरी और DA का 12 प्रतिशत योगदान, नियोक्ता के योगदान तथा बेसिक सैलरी को CTC का 50 प्रतिशत माना गया है। साथ ही यह भी माना गया है कि कर्मचारी निवेश की अवधि के दौरान EPF से कोई पैसा नहीं निकालता।
इस गणना में सबसे अहम भूमिका सैलरी ग्रोथ की है। अगर कर्मचारी की सैलरी औसतन 5 प्रतिशत हर साल बढ़ती है तो 60 साल की उम्र तक अनुमानित EPF कॉर्पस करीब 3 से 3.2 करोड़ रुपये हो सकता है। वहीं अगर सालाना सैलरी वृद्धि 8 प्रतिशत रहती है तो यही रकम करीब 4.5 से 5 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। 10 प्रतिशत की औसत सालाना वेतन वृद्धि होने पर यह कॉर्पस लगभग 6.2 से 6.5 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।
इसका मतलब यह है कि आज 15 लाख रुपये सालाना कमाने वाले कर्मचारी के लिए 30 साल बाद 5 करोड़ रुपये का EPF फंड बनाना संभव है, लेकिन केवल मौजूदा सैलरी के आधार पर इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती। लगातार वेतन वृद्धि और पर्याप्त EPF योगदान इस लक्ष्य के लिए बेहद जरूरी हैं।
यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू है, जिसे नौकरीपेशा लोगों को जरूर समझना चाहिए। EPF में योगदान वास्तविक बेसिक सैलरी पर हो रहा है या सिर्फ 15 हजार रुपये की वैधानिक वेतन सीमा तक सीमित है, इससे रिटायरमेंट फंड में बहुत बड़ा अंतर आ सकता है। यदि किसी कर्मचारी का EPF योगदान केवल निर्धारित वेतन सीमा तक सीमित है तो 15 लाख रुपये सालाना कमाने के बावजूद उसका EPF कॉर्पस अपेक्षाकृत कम रह सकता है। ऐसे मामले में लंबी अवधि में बनने वाली रकम करीब 35 से 40 लाख रुपये के आसपास रहने का अनुमान लगाया जा सकता है।
इसलिए कर्मचारियों को अपनी सैलरी स्लिप और कंपनी की EPF नीति की जानकारी जरूर रखनी चाहिए। यह देखना जरूरी है कि हर महीने PF खाते में कर्मचारी और नियोक्ता की ओर से कितनी रकम जमा हो रही है। लंबे समय तक लगातार योगदान और कंपाउंडिंग EPF की सबसे बड़ी ताकत है।
हालांकि रिटायरमेंट प्लानिंग में सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि 30 साल बाद आपके पास कितने करोड़ रुपये होंगे। महंगाई का असर भी समझना जरूरी है। अगर महंगाई लंबे समय तक औसतन 6 प्रतिशत रहती है तो आज के मुकाबले 30 साल बाद समान जीवनशैली बनाए रखने के लिए काफी अधिक रकम की जरूरत होगी। इसलिए 5 करोड़ रुपये का भविष्य का कॉर्पस सुनने में बड़ा लग सकता है, लेकिन उसकी वास्तविक खरीद क्षमता आज के 5 करोड़ रुपये के बराबर नहीं होगी।
इसी वजह से विशेषज्ञ EPF को रिटायरमेंट प्लानिंग का मजबूत आधार मानते हैं, लेकिन पूरी तरह उसी पर निर्भर रहने से बचने की सलाह देते हैं। कर्मचारी EPF के साथ VPF, NPS और अपनी जोखिम क्षमता के अनुसार लंबी अवधि के अन्य निवेश विकल्पों पर भी विचार कर सकते हैं। इससे रिटायरमेंट के समय एक से अधिक स्रोतों से आय का इंतजाम किया जा सकता है।
अगर रिटायरमेंट के समय किसी कर्मचारी के पास 5 करोड़ रुपये का कॉर्पस है और वह सालाना करीब 4 प्रतिशत की निकासी दर अपनाता है तो शुरुआती स्तर पर लगभग 1.67 लाख रुपये प्रति माह की आय के बराबर रकम निकाली जा सकती है। हालांकि वास्तविक आय निवेश रिटर्न, महंगाई, टैक्स और निकासी की रणनीति पर निर्भर करेगी।
कुल मिलाकर, 15 लाख रुपये सालाना सैलरी से केवल EPF के जरिए 5 करोड़ रुपये का रिटायरमेंट कॉर्पस बनना संभव है, लेकिन इसके लिए लंबी अवधि तक नौकरी, लगातार वेतन वृद्धि, पर्याप्त EPF योगदान और खाते से निकासी न करना जरूरी होगा। इसलिए नौकरी की शुरुआत से ही EPF को रिटायरमेंट फंड की नींव बनाकर अतिरिक्त निवेश की योजना तैयार करना ज्यादा बेहतर रणनीति हो सकती है।
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