नई दिल्ली। सड़क हादसे में जान गंवाने वाली 4 वर्षीय बच्ची के माता-पिता को छह साल बाद न्याय मिला है। दिल्ली मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने वर्ष 2020 में हुई एक दर्दनाक दुर्घटना में बच्ची की मौत के मामले में 40.37 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश जारी किया है। ट्रिब्यूनल ने हादसे के लिए तेज रफ्तार और लापरवाही से वाहन चलाने वाले ड्राइवर को जिम्मेदार ठहराया है। साथ ही वाहन मालिक और चालक को संयुक्त रूप से मुआवजे की राशि जमा करने के निर्देश दिए गए हैं।
ट्रिब्यूनल के पीठासीन अधिकारी सुनील कुमार ने 16 जुलाई को दिए अपने आदेश में कहा कि दुर्घटना पूरी तरह से चालक की लापरवाही और तेज गति से वाहन चलाने के कारण हुई थी। मामले में 'रेस इप्सा लोकीटुर' यानी 'चीज खुद बोलती है' के कानूनी सिद्धांत का हवाला देते हुए ट्रिब्यूनल ने माना कि हादसे की परिस्थितियां खुद यह साबित करती हैं कि इसमें चालक की गलती थी।
यह दुर्घटना 12 अक्टूबर 2020 को उत्तर दिल्ली इलाके में हुई थी। जानकारी के अनुसार, 4 वर्षीय बच्ची अपने भाई-बहनों और एक अन्य व्यक्ति के साथ सड़क पार कर रही थी। इसी दौरान तेज रफ्तार से आ रही एक कार ने उन्हें टक्कर मार दी। हादसे में बच्ची को गंभीर चोटें आईं, जिसके बाद उसकी मौत हो गई।
घटना के बाद बच्ची के परिवार ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल में मुआवजे के लिए याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान बच्ची के पिता की गवाही, पुलिस जांच रिपोर्ट और चार्जशीट समेत अन्य दस्तावेजों को आधार बनाया गया। ट्रिब्यूनल ने पाया कि हादसे के समय वाहन चालक ने सावधानी नहीं बरती और उसकी लापरवाही के कारण मासूम बच्ची की जान चली गई।
ड्राइवर पक्ष की ओर से दुर्घटना में लापरवाही के आरोपों को नकारने की कोशिश की गई, लेकिन वह अपने पक्ष में कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका। इसके बाद ट्रिब्यूनल ने चालक और वाहन मालिक को जिम्मेदार मानते हुए मुआवजे का आदेश दिया।
मुआवजे की राशि तय करते समय ट्रिब्यूनल ने दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों को ध्यान में रखा। नाबालिग बच्चे की मौत के मामलों में लागू दिशा-निर्देशों के अनुसार न्यूनतम मजदूरी, भविष्य की संभावनाओं, अंतिम संस्कार खर्च, संपत्ति नुकसान और माता-पिता को होने वाले मानसिक कष्ट जैसे विभिन्न पहलुओं को शामिल किया गया।
ट्रिब्यूनल ने कुल 40.37 लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया है। इसके अलावा, दावा दायर करने की तारीख से राशि पर 9 प्रतिशत सालाना ब्याज देने का भी आदेश दिया गया है। दोनों पक्षों को 30 दिनों के भीतर मुआवजे की राशि जमा करने के निर्देश दिए गए हैं।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, 'रेस इप्सा लोकीटुर' सिद्धांत का इस्तेमाल उन मामलों में किया जाता है, जहां दुर्घटना की परिस्थितियां इतनी स्पष्ट होती हैं कि लापरवाही का अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसे मामलों में पीड़ित पक्ष को हर बार प्रत्यक्ष प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि घटना की स्थिति और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय की जाती है।
यह मामला एक बार फिर सड़क सुरक्षा और वाहन चलाते समय जिम्मेदारी की अहमियत को उजागर करता है। तेज रफ्तार और लापरवाही से वाहन चलाने के कारण आए दिन गंभीर हादसे होते हैं, जिनमें कई परिवारों को अपूरणीय नुकसान उठाना पड़ता है। ट्रिब्यूनल का यह फैसला पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता देने के साथ-साथ वाहन चालकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है कि सड़क पर लापरवाही की कीमत बेहद गंभीर हो सकती है।