नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 को लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर एक अनोखा आयोजन देखने को मिला। नई दिल्ली के एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में नागरिक अधिकार समूह 'सिटिजन्स फॉर डेमोक्रेसी' की ओर से 'लोकतंत्र बनाम अराजकता' विषय पर मॉक पार्लियामेंट यानी प्रतीकात्मक संसद का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से आए युवा प्रतिभागियों ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं की भूमिकाएं निभाईं। संसद की कार्यवाही की तर्ज पर सवाल-जवाब, तर्क-वितर्क और राजनीतिक बहस के माध्यम से देश के सामने मौजूद लोकतांत्रिक तथा संवैधानिक मुद्दों को उठाया गया। कार्यक्रम में चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम), मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), चुनाव आयोग की भूमिका, संसदीय मर्यादा और राजनीतिक जवाबदेही जैसे विषय प्रमुख रहे। यह आयोजन ऐसे समय हुआ, जब विपक्षी INDIA गठबंधन भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर अलग कार्यक्रम आयोजित कर रहा था।

जानकारी के अनुसार, सिटिजन्स फॉर डेमोक्रेसी ने शुक्रवार सुबह 10:30 बजे से एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में मॉक पार्लियामेंट का कार्यक्रम निर्धारित किया था। इसके लिए आयोजन स्थल पर संसद जैसी अस्थायी व्यवस्था तैयार की गई।

कार्यक्रम में भाग लेने वाले युवाओं के बैठने की व्यवस्था सत्ता पक्ष और विपक्ष की तर्ज पर की गई थी। वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं के नाम वाली नेमप्लेट भी लगाई गई थीं, ताकि प्रतिभागियों को वास्तविक संसदीय माहौल जैसा अनुभव हो सके।

सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित कई प्रमुख नेताओं की भूमिकाएं युवा प्रतिभागियों के लिए निर्धारित की गई थीं।

इस व्यवस्था का उद्देश्य प्रतिभागियों को विभिन्न राजनीतिक दृष्टिकोणों को समझने और उनके आधार पर तर्क प्रस्तुत करने का अवसर देना था।

मॉक पार्लियामेंट में वास्तविक संसद की तरह प्रश्न पूछने, जवाब देने और अलग-अलग मुद्दों पर बहस करने का प्रारूप रखा गया। युवा प्रतिभागियों ने राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की भूमिकाओं के माध्यम से देश के वर्तमान राजनीतिक वातावरण को प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

आयोजकों के मुताबिक, कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली से परिचित कराना है। इसके साथ ही लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका, संवैधानिक मूल्यों और नागरिक जिम्मेदारियों पर सार्थक चर्चा को बढ़ावा देना भी इसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है।

कार्यक्रम में चुनावी व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को विशेष महत्व दिया गया। इनमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की विश्वसनीयता, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया जैसे विषय शामिल रहे।

हाल के महीनों में विपक्षी दलों ने चुनावी पारदर्शिता और मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रियाओं को लेकर कई सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग और सत्तापक्ष की ओर से चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता तथा नियमों के पालन पर जोर दिया जाता रहा है।

इन्हीं अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोणों को मॉक पार्लियामेंट में चर्चा का विषय बनाया गया।

विशेष रूप से एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद बने हुए हैं। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाने का खतरा है।

वहीं चुनावी प्रक्रिया के समर्थकों का तर्क है कि मतदाता सूची में सही और अद्यतन जानकारी बनाए रखना निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक है।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि मतदाता सूची में अनियमितता या कथित वोट चोरी के आरोपों को प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों का आकलन आधिकारिक रिकॉर्ड और संबंधित जांच के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

मॉक पार्लियामेंट में इन सवालों को राजनीतिक और संवैधानिक बहस के रूप में प्रस्तुत करने की योजना बनाई गई थी।

इसके अलावा लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन की भूमिका भी चर्चा का महत्वपूर्ण विषय रही। आयोजकों ने 'लोकतंत्र बनाम अराजकता' विषय के माध्यम से लोकतांत्रिक असहमति और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच अंतर को समझने पर जोर दिया।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को शांतिपूर्ण और कानूनसम्मत तरीके से अपनी राय व्यक्त करने तथा विरोध करने का अधिकार प्राप्त है। साथ ही सार्वजनिक सुरक्षा और अन्य लोगों के अधिकारों की रक्षा करना भी आवश्यक है।

इस संदर्भ में प्रतिभागियों के सामने यह प्रश्न रखा गया कि लोकतांत्रिक विरोध और कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों के बीच अंतर कैसे किया जाना चाहिए।

आयोजन से जुड़े लोगों के अनुसार, युवाओं को केवल राजनीतिक घटनाक्रमों की जानकारी देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें तर्कपूर्ण बहस और संवैधानिक प्रक्रियाओं को समझने का अवसर देना भी जरूरी है।

मॉक पार्लियामेंट में वकीलों, विद्यार्थियों, चार्टर्ड अकाउंटेंट और युवा सामाजिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी की जानकारी भी सामने आई है।

शुक्रवार को दिल्ली में इस आयोजन के समानांतर विपक्षी INDIA गठबंधन की ओर से भी चुनावी प्रक्रिया को लेकर कार्यक्रम आयोजित किया गया।

विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रतीकात्मक 'जन महाभियोग' का कार्यक्रम रखा। इस आयोजन का उद्देश्य चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक स्तर पर सवाल उठाना बताया गया।

विपक्ष के कार्यक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं की भागीदारी की जानकारी सामने आई।

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को इस प्रतीकात्मक कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया गया था।

हालांकि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ऐसे आयोजनों में पारित किए जाने वाले प्रतीकात्मक प्रस्तावों का संवैधानिक महाभियोग की प्रक्रिया पर सीधे कोई कानूनी प्रभाव नहीं पड़ता।

मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया संविधान और संबंधित कानूनों के तहत निर्धारित है। किसी नागरिक संगठन या राजनीतिक समूह का मॉक पार्लियामेंट वास्तविक संसद का विकल्प नहीं होता।

इस तरह शुक्रवार को राजधानी दिल्ली में लोकतंत्र और चुनावी व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर दो समानांतर आयोजन राजनीतिक चर्चा का केंद्र बने।

एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में आयोजित मॉक पार्लियामेंट को विपक्षी कार्यक्रम के राजनीतिक जवाब के रूप में भी देखा जा रहा है।

इससे पहले प्रकाशित रिपोर्टों में आयोजन को भाजपा समर्थित नागरिक पहल बताया गया था। हालांकि आयोजकों ने कहा था कि कार्यक्रम में भाजपा के नेता और सांसद भाग नहीं लेंगे तथा इसकी गतिविधियां नागरिकों और युवाओं पर केंद्रित होंगी।

संसदीय लोकतंत्र में इस प्रकार के अभ्यासों का शैक्षणिक महत्व भी होता है। युवा प्रतिभागियों को विधायी प्रक्रियाओं, संसदीय नियमों, प्रश्नकाल, बहस और राजनीतिक जवाबदेही के सिद्धांतों से परिचित कराने के लिए विभिन्न शिक्षण संस्थानों में युवा संसद का आयोजन किया जाता है।

ऐसी गतिविधियों से विद्यार्थियों में सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने, विरोधी विचारों को सुनने और तथ्यों के आधार पर तर्क प्रस्तुत करने का कौशल विकसित हो सकता है।

हालांकि किसी भी मॉक पार्लियामेंट की उपयोगिता इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसमें विभिन्न दृष्टिकोणों को कितनी निष्पक्षता और गंभीरता से प्रस्तुत किया जाता है।

लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जहां सरकार की जिम्मेदारी नीतियों और योजनाओं को लागू करना है, वहीं विपक्ष का दायित्व सरकार के कामकाज की समीक्षा करना तथा जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाना है।

इसी प्रकार नागरिक संगठनों और युवा समूहों की भूमिका सार्वजनिक संवाद को अधिक व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

दिल्ली के इस आयोजन में भी युवाओं को प्रमुख नेताओं की भूमिकाएं देकर राजनीतिक मुद्दों पर अपनी समझ विकसित करने का अवसर प्रदान करने की कोशिश की गई।

कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि इसमें चुनाव आयोग, ईवीएम और मतदाता सूची जैसे विषयों पर बहस के साथ संसदीय मर्यादाओं और राजनीतिक जवाबदेही को भी शामिल किया गया।

फिलहाल 'लोकतंत्र बनाम अराजकता' विषय पर आयोजित मॉक पार्लियामेंट ने राष्ट्रीय राजधानी में जारी राजनीतिक चर्चा को एक अलग मंच दिया है।

आयोजकों का कहना है कि ऐसी पहल से युवाओं में लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जागरूकता बढ़ेगी और वे संवैधानिक प्रक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।

शुक्रवार का यह आयोजन इस मायने में भी महत्वपूर्ण रहा कि वास्तविक राजनीतिक दलों के बीच चल रही बहस के समानांतर युवा प्रतिभागियों ने संसदीय प्रक्रिया का मंचन करके समकालीन लोकतांत्रिक सवालों पर विचार प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

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