नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर जारी बहस के बीच केंद्रीय कैबिनेट मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस प्रक्रिया का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) किसी मतदाता का नाम उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना मतदाता सूची से नहीं हटा सकता। उनके इस बयान का मुख्य जोर मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया तथा सुनवाई के अधिकार पर है।SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना, पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करना और अपात्र या गलत प्रविष्टियों की पहचान करना है। हालांकि, इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने और पात्र मतदाताओं के सूची से बाहर रह जाने की आशंकाओं को लेकर राजनीतिक दलों तथा नागरिक संगठनों ने सवाल उठाए हैं। ऐसे में भूपेंद्र यादव का बयान मतदाता सूची के पुनरीक्षण और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर चल रही बहस के बीच आया है।
क्या है SIR और ERO की भूमिका?
SIR चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण करने की प्रक्रिया है। इसके तहत मतदाताओं की जानकारी का सत्यापन किया जाता है और सूची में दर्ज प्रविष्टियों की जांच की जाती है। निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी यानी ERO संबंधित विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची के रखरखाव और उसमें बदलाव से जुड़े वैधानिक निर्णयों के लिए जिम्मेदार होता है।मतदाता सूची से किसी नाम को हटाने की प्रक्रिया में संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर देना जरूरी है। चुनावी नियमों के तहत प्रस्तावित नाम हटाने के मामलों में नोटिस, आपत्तियां और सुनवाई जैसी प्रक्रियाएं निर्धारित हैं। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने भी सितंबर 2026 में स्पष्ट किया था कि नोटिस जारी होने का मतलब यह नहीं है कि मतदाता का नाम निश्चित रूप से हटा दिया जाएगा। नाम हटाने के लिए उचित सुनवाई और कारण दर्ज करने वाला अपील योग्य आदेश जरूरी है।
SIR को लेकर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
SIR के दौरान मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस हुई है। द इंडियन एक्सप्रेस की 5 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की मसौदा मतदाता सूचियों से करीब 13 करोड़ नाम हटाए जाने के बाद चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया की समीक्षा और छूट गए मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए थे। ध्यान देने वाली बात यह है कि हटाए गए सभी नाम पात्र मतदाताओं के गलत तरीके से हटाए जाने का प्रमाण नहीं हैं।आलोचकों की मुख्य चिंता यह है कि सत्यापन प्रक्रिया के दौरान कोई पात्र नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित न रह जाए। वहीं, चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची में पात्र लोगों के नाम शामिल करना और अपात्र प्रविष्टियों को हटाना उसकी जिम्मेदारी है।
छूटे मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान
चुनाव आयोग ने सितंबर के अंत में उन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए थे, जहां SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। इस अभियान का उद्देश्य छूट गए पात्र मतदाताओं, युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले लोगों को सूची में शामिल करने में सहायता देना है।इसके तहत संबंधित अधिकारियों को SIR से पहले और बाद की मतदाता सूचियों की तुलना करने, हटाए गए नामों की पहचान करने और पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के निर्देश दिए गए। पात्र व्यक्ति निर्धारित प्रक्रिया के तहत फॉर्म-6 के माध्यम से नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
मतदाता के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया पर जोर
भूपेंद्र यादव के बयान के संदर्भ में मतदाता सूची की शुद्धता और मतदाताओं को सुनवाई का अवसर देने का सवाल महत्वपूर्ण है। किसी भी पुनरीक्षण प्रक्रिया में प्रशासनिक जांच के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि पात्र मतदाताओं को अपना पक्ष रखने और जरूरी दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर मिले।फिलहाल, SIR को लेकर जारी बहस में दो प्रमुख मुद्दे सामने हैं—मतदाता सूची को सही और अद्यतन बनाना तथा यह सुनिश्चित करना कि कोई पात्र नागरिक प्रक्रिया की खामी के कारण अपने मतदान के अधिकार से वंचित न हो। इस पूरी प्रक्रिया में ERO की वैधानिक जिम्मेदारी, चुनाव आयोग के दिशा-निर्देश और मतदाताओं को उपलब्ध शिकायत एवं अपील के विकल्प महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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