नई दिल्ली : दक्षिण भारतीय राज्यों में दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआत के करीब एक महीने बाद भी जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य से नीचे बना हुआ है। पिछले साल की तुलना में भी इस समय जल भंडारण काफी कम दर्ज किया गया है। जलाशयों में घटते पानी के स्तर ने खासकर तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्रों में धान की खेती को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
कावेरी बेसिन में जलाशयों का जलस्तर सामान्य भंडारण क्षमता से करीब 24.5 प्रतिशत कम बताया जा रहा है। किसानों को चिंता है कि अगर आने वाले कुछ हफ्तों में जलाशयों में पानी की आवक नहीं बढ़ी तो खरीफ सीजन की धान की बुवाई और सिंचाई प्रभावित हो सकती है।
दक्षिण भारतीय क्षेत्र में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना शामिल हैं। इन राज्यों के कुल 47 प्रमुख जलाशयों की निगरानी केंद्रीय जल आयोग (CWC) करता है। इन जलाशयों की कुल प्रत्यक्ष भंडारण क्षमता 55.288 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) है।
केंद्रीय जल आयोग की 9 जुलाई की ताजा स्टोरेज बुलेटिन के अनुसार, इन जलाशयों में वर्तमान में कुल प्रत्यक्ष जल भंडारण 13.614 BCM है। यह कुल क्षमता का केवल 24.62 प्रतिशत है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह आंकड़ा सामान्य स्तर से कम है और आने वाले समय में जल प्रबंधन को लेकर चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
दक्षिण भारत में मानसून का असर अभी तक अपेक्षा के अनुसार नहीं दिखा है। कई क्षेत्रों में बारिश हुई है, लेकिन जलाशयों में पर्याप्त पानी जमा होने के लिए लगातार और अच्छी बारिश की जरूरत होती है। केवल कुछ दिनों की बारिश से बड़े जलाशयों का स्तर तेजी से नहीं बढ़ता।
तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है और इसके लिए पर्याप्त सिंचाई पानी की जरूरत होती है। जलाशयों में कम पानी होने से किसानों को चिंता है कि यदि कावेरी नदी में पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं हुआ तो खेती प्रभावित हो सकती है।
किसानों का कहना है कि धान की बुवाई के लिए समय पर पानी मिलना बेहद जरूरी है। मानसून में देरी या जलाशयों में कम भंडारण का सीधा असर कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है। कावेरी क्षेत्र के कई किसान अब अच्छी बारिश और जलाशयों के भरने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
जल विशेषज्ञों के अनुसार, दक्षिण भारत के जलाशयों में पानी की स्थिति कई कारणों से प्रभावित होती है। इनमें पिछले साल की बारिश, गर्मियों में पानी की खपत, नदी क्षेत्रों में जल प्रवाह और वर्तमान मानसून की स्थिति शामिल हैं।
कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर पहले भी विवाद होते रहे हैं। ऐसे में जलाशयों में कम पानी की स्थिति दोनों राज्यों के लिए चिंता का विषय बन सकती है। खेती के साथ-साथ पेयजल और औद्योगिक जरूरतों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
हालांकि, मौसम विभाग के अनुसार मानसून अभी सक्रिय है और आने वाले दिनों में बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। यदि दक्षिण-पश्चिम मानसून के अगले चरण में अच्छी बारिश होती है तो जलाशयों के स्तर में सुधार की उम्मीद की जा सकती है।
सरकारी एजेंसियां जलाशयों की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। जल प्रबंधन को लेकर राज्यों के बीच समन्वय और उपलब्ध पानी के बेहतर इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जल संकट से निपटने के लिए केवल मानसून पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और सिंचाई के बेहतर तरीकों को अपनाना जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों का सामना कम करना पड़े।
फिलहाल दक्षिण भारत के जलाशयों में कम जल भंडारण ने कृषि क्षेत्र के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। आने वाले कुछ सप्ताह मानसून और खेती दोनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। अच्छी बारिश होने पर स्थिति सुधर सकती है, लेकिन अगर बारिश कमजोर रही तो कावेरी क्षेत्र के किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।