जंतर-मंतर पर गूंज रही फैज की 'हम देखेंगे', चार दशक पुरानी नज्म बनी Gen-Z की आवाज
दिल्ली : जंतर-मंतर पर हुए जेन-जी प्रदर्शन के दौरान कई नारे, गीत और कविताएं लोगों की आवाज बनीं। इन्हीं में मशहूर उर्दू शायर फैज अहमद फैज की करीब चार दशक पुरानी नज्म 'हम देखेंगे' ने एक बार फिर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। सोशल मीडिया से लेकर प्रदर्शन स्थलों तक यह नज्म तेजी से वायरल हो रही है। युवा पीढ़ी इसे अन्याय के खिलाफ आवाज और बदलाव की उम्मीद के तौर पर देख रही है।
फैज अहमद फैज की यह नज्म सिर्फ एक कविता नहीं बल्कि प्रतिरोध और उम्मीद का प्रतीक मानी जाती है। हाल के आंदोलनों में भी इस नज्म की पंक्तियां लोगों के बीच लोकप्रिय हुई हैं। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं ने इसे गाकर अपनी भावनाएं व्यक्त कीं, जिसके बाद सोशल मीडिया पर भी इसके वीडियो और पोस्ट तेजी से वायरल होने लगे।
दरअसल, फैज ने यह नज्म पाकिस्तान के तत्कालीन सैन्य शासक जनरल जिया-उल-हक के शासन के विरोध में लिखी थी। साल 1977 में जनरल जिया-उल-हक ने पाकिस्तान में सत्ता पर कब्जा कर लिया था और सैन्य शासन स्थापित किया था। उनके शासन के दौरान अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर कई सवाल उठे थे। इसी दौर में फैज ने साल 1979 में 'हम देखेंगे' नज्म लिखी और इसके जरिए दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की।
इस नज्म में फैज ने उम्मीद जताई थी कि कोई भी अत्याचार हमेशा नहीं रहता। चाहे सत्ता कितनी भी मजबूत क्यों न हो, एक दिन जनता की ताकत के सामने उसे झुकना पड़ेगा। कविता में उन्होंने ऐसे भविष्य की कल्पना की, जहां अन्याय और जुल्म खत्म होंगे और लोगों को बराबरी और न्याय मिलेगा।
फैज की यह रचना सिर्फ पाकिस्तान की राजनीतिक परिस्थितियों तक सीमित नहीं रही। दुनिया भर में जहां भी लोग अन्याय, असमानता और दमन के खिलाफ आवाज उठाते हैं, वहां फैज की शायरी लोगों को प्रेरणा देती रही है। यही वजह है कि आज की युवा पीढ़ी भी उनकी नज्मों से खुद को जोड़ पाती है।
फैज अहमद फैज 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली उर्दू शायरों में शामिल रहे हैं। उनका जन्म अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के सियालकोट में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। वह सिर्फ शायर ही नहीं बल्कि पत्रकार, शिक्षक, सेना अधिकारी और सामाजिक विचारक भी थे। उन्होंने अपनी शायरी में प्रेम, इंसानियत, सामाजिक न्याय और राजनीतिक संघर्ष जैसे विषयों को जगह दी।
फैज अपनी बेबाक लेखनी के लिए कई बार सत्ता के निशाने पर भी रहे। उन्हें जेल जाना पड़ा और कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी कलम से अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना जारी रखा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उन्हें काफी सम्मान मिला और साल 1962 में उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
'हम देखेंगे' की लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह इसकी भाषा और संदेश है। यह नज्म लोगों को सिर्फ विरोध करना नहीं सिखाती, बल्कि मुश्किल हालात में उम्मीद बनाए रखने का संदेश भी देती है। यही कारण है कि दशकों बाद भी यह कविता नई पीढ़ी के बीच उतनी ही प्रभावशाली बनी हुई है।
आज जब युवा अपनी आवाज और अधिकारों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं, तो फैज की नज्में उन्हें अपनी भावनाएं व्यक्त करने का माध्यम देती हैं। 'हम देखेंगे' और 'बोल कि लब आजाद हैं तेरे' जैसी रचनाएं आज भी लोगों को साहस, बदलाव और उम्मीद का संदेश देती हैं। यही वजह है कि चार दशक पहले लिखी गई फैज की यह नज्म आज भी आंदोलनों और जनआवाजों का हिस्सा बनी हुई है।