नई दिल्ली : देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और कच्चे तेल एवं प्राकृतिक गैस के आयात पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक बड़ी पहल की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में 84,084 करोड़ रुपये की राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना को मंजूरी दे दी गई है। इस योजना को आधुनिक ‘समुद्र मंथन’ के रूप में देखा जा रहा है, जिसके तहत समुद्र की गहराइयों में छिपे तेल और गैस भंडारों की खोज की जाएगी।
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत लागू होने वाली इस योजना का उद्देश्य गहरे समुद्री और अति-गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेल एवं गैस की खोज को बढ़ावा देना है। इसके तहत अन्वेषण कुओं की ड्रिलिंग, नई खोजों को उत्पादन तक पहुंचाने और साझा बुनियादी ढांचे के विकास के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।
सरकार के अनुसार, योजना के तहत गहरे समुद्र में ड्रिलिंग करने वाली कंपनियों को प्रत्येक कुएं के लिए 650 करोड़ रुपये तक की सहायता दी जाएगी। इसका मुख्य लक्ष्य देश में घरेलू तेल और गैस उत्पादन को बढ़ाना है, ताकि विदेशी आयात पर निर्भरता कम की जा सके।
राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना के कुल बजट में से 43,200 करोड़ रुपये अगले पांच वर्षों यानी वर्ष 2031 तक गहरे समुद्री क्षेत्रों में ड्रिलिंग गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए खर्च किए जाएंगे। वहीं, 10,000 करोड़ रुपये नई खोजों को उत्पादन में बदलने के लिए जरूरी साझा बुनियादी ढांचे के विकास पर लगाए जाएंगे।
इसके अलावा समुद्री क्षेत्रों से आंकड़े जुटाने और वैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए 28,534 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। तेल एवं गैस क्षेत्र में विनिर्माण और सेवा गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए 2,000 करोड़ रुपये अलग से आवंटित किए जाएंगे।
गहरे समुद्र में तेल और गैस की खोज बेहद महंगी और जोखिम भरी प्रक्रिया होती है। जहां पानी की गहराई 1,500 मीटर से अधिक होती है, वहां एक कुएं की ड्रिलिंग में करीब 10 करोड़ डॉलर से 25 करोड़ डॉलर तक खर्च आ सकता है। इसके बावजूद सफलता की कोई निश्चित गारंटी नहीं होती। ऐसे में सरकार की वित्तीय सहायता से कंपनियों को जोखिम उठाने में मदद मिलेगी और नए क्षेत्रों में अन्वेषण को गति मिलेगी।
सरकार का मानना है कि यह योजना भारत के समुद्री बेसिन क्षेत्रों में ऊर्जा संसाधनों की खोज को तेज करेगी। इससे देश में निवेश बढ़ेगा, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और घरेलू विनिर्माण क्षेत्र को भी मजबूती मिलेगी।
भारत लंबे समय से अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर रहा है। आंकड़ों के अनुसार, पिछले दशक में देश की कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता लगभग 77 प्रतिशत से बढ़कर 88 प्रतिशत तक पहुंच गई है। वहीं, प्राकृतिक गैस की कुल जरूरत का लगभग आधा हिस्सा भी आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है। ऐसे में घरेलू भंडारों की खोज सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।
केंद्र सरकार का दावा है कि इस योजना के माध्यम से 60 करोड़ टन से अधिक संभावित तेल और गैस भंडारों की खोज में मदद मिल सकती है। इससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी फायदा मिलेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2025 में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने संबोधन में समुद्री ऊर्जा संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल की बात कही थी। उन्होंने आधुनिक तकनीक और बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण के जरिए समुद्र की गहराइयों में मौजूद संसाधनों को तलाशने का आह्वान किया था।
भारत ने वर्ष 1997 के बाद से तेल और गैस अन्वेषण नीति में कई बदलाव किए हैं। पहले उत्पादन साझेदारी अनुबंध प्रणाली लागू थी, लेकिन बाद में राजस्व साझेदारी और अन्वेषण प्रतिबद्धताओं पर आधारित व्यवस्था को अपनाया गया।
राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना को देश की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। आने वाले वर्षों में यह योजना भारत को ऊर्जा क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।