नई दिल्ली : राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने देश में ई-सिगरेट और वेपिंग के कथित बढ़ते इस्तेमाल को लेकर राज्यसभा में चिंता जताई है। उन्होंने खासतौर पर बच्चों और युवाओं तक ई-सिगरेट की पहुंच का मुद्दा उठाते हुए सरकार से इसकी अवैध बिक्री के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। मालीवाल ने कहा कि अलग-अलग रंग, डिजाइन और फ्लेवर में उपलब्ध वेपिंग डिवाइस युवाओं को आकर्षित कर रही हैं और इसके जरिए कम उम्र में ही बच्चे निकोटिन के संपर्क में आ सकते हैं। उन्होंने स्कूलों और कॉलेजों में ई-सिगरेट के नुकसान को लेकर व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की भी मांग की।
मालीवाल ने सदन में कहा कि ई-सिगरेट सामान्य सिगरेट से अलग दिखती है और इसके इस्तेमाल का पता माता-पिता को आसानी से नहीं चल पाता। वेपिंग डिवाइस में सामान्य सिगरेट की तरह तंबाकू जलाया नहीं जाता, बल्कि बैटरी से चलने वाली डिवाइस एक तरल पदार्थ को गर्म करती है। इससे बनने वाले एरोसोल को उपयोगकर्ता सांस के जरिए अंदर लेता है। इस तरल पदार्थ को आमतौर पर ई-लिक्विड या वेप लिक्विड कहा जाता है, जिसमें निकोटिन, फ्लेवर और दूसरे रसायन मौजूद हो सकते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक ई-सिगरेट से निकलने वाले एरोसोल को केवल पानी की भाप समझना सही नहीं है। इसमें निकोटिन सहित ऐसे पदार्थ मौजूद हो सकते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ विशेष रूप से बच्चों और किशोरों में निकोटिन के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताते रहे हैं, क्योंकि कम उम्र में इसकी लत लगने का खतरा अधिक हो सकता है।
स्वाति मालीवाल ने मिंट, कैंडी और मैंगो जैसे फ्लेवर का उदाहरण देते हुए दावा किया कि इस तरह के विकल्प बच्चों और युवाओं को वेपिंग की तरफ आकर्षित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि आकर्षक डिजाइन वाली छोटी डिवाइस होने के कारण कई बार परिवार को भी इसके इस्तेमाल की जानकारी नहीं हो पाती। ऐसे में केवल प्रतिबंध लागू करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बच्चों और अभिभावकों को इसके खतरों की जानकारी देना भी जरूरी है।
ई-सिगरेट को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का एक प्रमुख कारण निकोटिन है। स्वास्थ्य संस्थाओं के मुताबिक निकोटिन की लत लग सकती है और किशोरावस्था में इसका इस्तेमाल विकसित हो रहे मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। ई-सिगरेट के एरोसोल में निकोटिन के अलावा अन्य रसायन भी पाए जा सकते हैं। इसी वजह से इसे सामान्य सिगरेट का पूरी तरह सुरक्षित विकल्प मानना उचित नहीं माना जाता।
भारत में ई-सिगरेट को लेकर पहले से कड़ा कानून मौजूद है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2019 में 'प्रोहिबिशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट्स एक्ट' लागू किया था। इस कानून के तहत ई-सिगरेट के उत्पादन, निर्माण, आयात, निर्यात, परिवहन, बिक्री, वितरण, भंडारण और विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसके बावजूद अवैध रूप से ई-सिगरेट उपलब्ध होने के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
मालीवाल ने इसी कानून का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रतिबंध के बावजूद ई-सिगरेट ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से बेचे जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। उन्होंने केंद्र सरकार से राज्यों के साथ समन्वय स्थापित कर अवैध बिक्री करने वालों के खिलाफ कार्रवाई तेज करने की मांग की। उनका कहना था कि ई-सिगरेट की उपलब्धता रोकने के लिए बिक्री और आपूर्ति नेटवर्क पर प्रभावी निगरानी जरूरी है।
राज्यसभा सांसद ने स्कूलों और कॉलेजों में विशेष जागरूकता अभियान चलाने का सुझाव भी दिया। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को यह बताया जाना चाहिए कि आकर्षक पैकेजिंग या अलग-अलग फ्लेवर के बावजूद वेपिंग स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। इसके साथ ही अभिभावकों को भी ई-सिगरेट की पहचान, इसके इस्तेमाल के संकेत और संभावित नुकसान के बारे में जागरूक करने की आवश्यकता है।
मालीवाल ने इस मुद्दे को केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रखते हुए प्रतिबंधित उत्पादों की अवैध बिक्री से भी जोड़कर देखा। उन्होंने सरकार से कानून को प्रभावी तरीके से लागू करने और युवाओं तक ऐसे उत्पादों की पहुंच रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की अपील की।