NVS-02 की तकनीकी गड़बड़ी दोहराने से बचा ISRO, नारायणन ने बताया NVS-03 का खास प्लान
श्रीहरिकोटा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने नेविगेशन सैटेलाइट मिशन में पिछली तकनीकी खामियों से सबक लेते हुए एक बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव किया है। शुक्रवार देर रात GSLV-F18 रॉकेट के जरिए NVS-03 सैटेलाइट का सफल प्रक्षेपण किया गया। इस मिशन को लेकर शनिवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में ISRO प्रमुख वी. नारायणन ने एक महत्वपूर्ण तकनीकी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि मिशन की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने और पिछले मिशन में सामने आई तकनीकी समस्या को दोबारा होने से रोकने के लिए NVS-03 को तीन पाइरो वाल्व पहले से खुले रखकर संचालित किया गया। यह फैसला सामान्य प्रक्रिया से अलग था और इसे लागू करने से पहले विशेषज्ञों की समिति ने कई स्तरों पर परीक्षण किए थे।
NVS-02 की विफलता के बाद बदली गई रणनीति
दरअसल, ISRO के लिए NVS-03 मिशन इसलिए भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि इससे पहले लॉन्च किया गया NVS-02 सैटेलाइट अपने निर्धारित ऑर्बिट तक पहुंचने में असफल रहा था। 29 जनवरी 2025 को GSLV-F15 रॉकेट के जरिए NVS-02 को सफलतापूर्वक जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया गया था। रॉकेट से अलग होने के बाद सैटेलाइट के सोलर पैनल भी खुल गए थे और उसने बिजली उत्पादन के लिए अपनी दिशा स्थिर कर ली थी।
हालांकि, इसके बाद जब सैटेलाइट को अपनी कक्षा को ऊंचा करने की प्रक्रिया पूरी करनी थी, तब समस्या सामने आई। ऑर्बिट रेजिंग के लिए जरूरी इंजन को सक्रिय करने में तकनीकी बाधा आई। परिणामस्वरूप सैटेलाइट अपनी निर्धारित अंतिम कक्षा तक नहीं पहुंच सका।
इस घटना के बाद ISRO ने पूरे मामले की जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की थी। 25 फरवरी 2026 को जारी आधिकारिक जानकारी में ISRO ने बताया कि जांच समिति ने पाया कि इंजन की ऑक्सीडाइजर लाइन के पाइरो वाल्व तक ड्राइव सिग्नल नहीं पहुंचा था। इसकी सबसे संभावित वजह मुख्य और वैकल्पिक दोनों सर्किट में कनेक्टर के कम से कम एक संपर्क का अलग हो जाना था।
क्या होते हैं पाइरो वाल्व और क्यों हैं महत्वपूर्ण?
अंतरिक्ष यान के प्रोपल्शन यानी प्रणोदन सिस्टम में पाइरो वाल्व की भूमिका बेहद अहम होती है। इनका काम ईंधन और ऑक्सीडाइजर के प्रवाह को नियंत्रित करने वाले रास्ते को जरूरत के समय खोलना होता है। इन वाल्वों को विशेष पाइरोटेक्निक प्रक्रिया के जरिए सक्रिय किया जाता है। एक बार सक्रिय होकर खुलने के बाद इन्हें सामान्य तरीके से दोबारा बंद नहीं किया जा सकता।
सैटेलाइट को पृथ्वी की निर्धारित कक्षा से आगे अपनी अंतिम कक्षा तक पहुंचाने के लिए ऑनबोर्ड इंजन का इस्तेमाल करना पड़ता है। इसके लिए ईंधन और ऑक्सीडाइजर की आपूर्ति जरूरी होती है। यदि संबंधित वाल्व समय पर नहीं खुलता या उसे सक्रिय करने वाला सिग्नल नहीं पहुंचता, तो इंजन काम नहीं कर पाता।
NVS-02 के मामले में भी इसी तरह की तकनीकी बाधा सामने आई थी। ऐसे में NVS-03 के लिए ISRO ने प्रक्रिया में बदलाव करते हुए तीन पाइरो वाल्व पहले से खुले रखने का निर्णय लिया, ताकि उड़ान के बाद उन्हें सक्रिय करने से जुड़ी संभावित तकनीकी समस्या से बचा जा सके।
किरण कुमार की अध्यक्षता वाली समिति ने किए थे कड़े परीक्षण
ISRO प्रमुख वी. नारायणन ने बताया कि तीन पाइरो वाल्व खुले रखने का फैसला जल्दबाजी में नहीं लिया गया था। इसके लिए पूर्व ISRO प्रमुख ए.एस. किरण कुमार की अध्यक्षता में राष्ट्रीय स्तर की समिति ने विस्तृत परीक्षण किए थे।
समिति ने सैटेलाइट पर कंपन (Vibration) और झटके (Shock) से जुड़े कठोर परीक्षण किए। इन परीक्षणों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि रॉकेट के प्रक्षेपण के दौरान होने वाले तेज कंपन, दबाव और झटकों के बावजूद पहले से खुले वाल्व सुरक्षित तरीके से काम करते रहें।
नारायणन के मुताबिक, विशेषज्ञों की जांच और परीक्षण के बाद ही इस तकनीकी व्यवस्था को मंजूरी दी गई। ISRO का मुख्य उद्देश्य यह था कि NVS-02 में सामने आई समस्या नए मिशन में दोबारा न आए और सैटेलाइट की कक्षा परिवर्तन प्रक्रिया में किसी तरह की बाधा उत्पन्न न हो।
GSLV-F18 ने सफलतापूर्वक स्थापित किया NVS-03
NVS-03 को 30 अक्टूबर की रात 11 बजकर 51 मिनट पर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड से रवाना किया गया था। इसे GSLV-F18 रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा गया। यह GSLV रॉकेट की 20वीं उड़ान थी।
प्रक्षेपण के लगभग 18 मिनट बाद रॉकेट ने NVS-03 को निर्धारित जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया। इसकी निर्धारित कक्षा की ऊंचाई पृथ्वी से सबसे नजदीकी बिंदु पर लगभग 170 किलोमीटर और सबसे दूर के बिंदु पर 37,023 किलोमीटर है।
करीब 2,232 किलोग्राम वजन वाला यह सैटेलाइट आगे अपने ऑनबोर्ड प्रोपल्शन सिस्टम की मदद से 32.5 डिग्री पूर्वी देशांतर पर अपनी अंतिम जियोसिंक्रोनस कक्षा तक पहुंचेगा। ISRO के मुताबिक, इस मिशन में लगातार दो GSLV उड़ानों के बीच केवल 56 दिनों का अंतर रहा, जो संगठन के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
भारत के NavIC नेविगेशन सिस्टम को मिलेगी मजबूती
NVS-03 भारत के स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NavIC (Navigation with Indian Constellation) की अगली पीढ़ी का तीसरा सैटेलाइट है। इसका उद्देश्य भारत और आसपास के क्षेत्र में नेविगेशन सेवाओं की निरंतरता बनाए रखना और उनकी क्षमता को मजबूत करना है।
इस सैटेलाइट में स्वदेशी रूबिडियम एटॉमिक क्लॉक के साथ अन्य परमाणु घड़ियां भी लगाई गई हैं। एटॉमिक क्लॉक किसी भी नेविगेशन सैटेलाइट का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। इसकी मदद से सटीक समय और स्थान संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने में सहायता मिलती है।
NVS-03 में पहले से इस्तेमाल किए जा रहे L5 और S बैंड के अलावा L1 सिग्नल भी शामिल किया गया है। इससे नेविगेशन सेवाओं की उपयोगिता बढ़ाने में मदद मिलेगी। इसका कवरेज पूरे भारतीय भूभाग के साथ भारत की सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर तक के क्षेत्र के लिए निर्धारित है।
NavIC भारत की स्वतंत्र क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली है। इसका इस्तेमाल परिवहन, समुद्री गतिविधियों, आपातकालीन सेवाओं, सटीक स्थान निर्धारण और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किया जाता है। यह प्रणाली विदेशी नेविगेशन सेवाओं पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण है।
मछली पकड़ने वाले जहाजों से लेकर ट्रेनों तक हो रहा इस्तेमाल
ISRO प्रमुख नारायणन ने NavIC के व्यावहारिक इस्तेमाल की जानकारी भी साझा की। उन्होंने बताया कि वर्तमान में लगभग 10,400 रेल इंजनों और 64,000 मछली पकड़ने वाले जहाजों की रियल टाइम ट्रैकिंग की जा रही है।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत अगले छह महीनों में इस सुविधा का विस्तार करके एक लाख मछली पकड़ने वाले जहाजों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा करीब 15 लाख ट्रैकिंग डिवाइस वाहनों में लगाए जा चुके हैं।
मोबाइल फोन में NavIC की सुविधा उपलब्ध कराने को लेकर पूछे गए सवाल पर नारायणन ने कहा कि सात सैटेलाइट का पूरा समूह तैयार होने के बाद इसे लेकर आगे की प्रक्रिया पूरी होगी। इससे भविष्य में आम मोबाइल उपयोगकर्ताओं को भी स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली का लाभ मिलने की उम्मीद है।
आगे ISRO के सामने कई बड़े मिशन
NVS-03 के सफल प्रक्षेपण के बाद ISRO का अगला लक्ष्य आगामी अंतरिक्ष अभियानों को निर्धारित समय पर पूरा करना है। नारायणन ने बताया कि चालू वित्त वर्ष में संगठन पांच और प्रक्षेपण करने की योजना बना रहा है। इनमें गगनयान कार्यक्रम का पहला मानवरहित मिशन G1 और छोटे सैटेलाइट मिशन भी शामिल हैं।
NVS-03 मिशन की खासियत केवल इसका सफल प्रक्षेपण नहीं है, बल्कि पिछली तकनीकी विफलता से सीख लेकर सुरक्षा और विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए अपनाया गया नया तरीका भी है। ISRO ने परीक्षणों के आधार पर अपने डिजाइन और संचालन की रणनीति में बदलाव किया है।
अब सैटेलाइट के अंतिम निर्धारित स्थान तक पहुंचने और NavIC प्रणाली में अपनी भूमिका निभाने पर नजर रहेगी। यह मिशन भारत की स्वदेशी अंतरिक्ष तकनीक और नेविगेशन क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।