पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने गुरुवार को कहा कि नागरिकों को विरोध करने का अधिकार है, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण होने चाहिए और संविधान के दायरे में रहने चाहिए। उन्होंने लोकतंत्र के नाम पर जनजीवन को बाधित करने की कोशिशों की आलोचना की और लोगों से धैर्य रखने तथा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से राजनीतिक बदलाव लाने की अपील की।
नई दिल्ली के आईटीसी मौर्य में 'भारत की सोच' के अध्यक्ष अनिल राजपूत द्वारा आयोजित "विकसित भारत के लिए नागरिक के कर्तव्य" विषय पर एक सत्र को संबोधित करते हुए, नायडू ने कहा कि आजादी के नाम पर अव्यवस्था और अशांति फैलाना मौलिक अधिकारों का दुरुपयोग है। उन्होंने कहा, "क्या इसका मतलब यह है कि लोगों को विरोध करने का अधिकार नहीं है? उन्हें निश्चित रूप से विरोध करने का अधिकार है। लेकिन विरोध शांतिपूर्ण होना चाहिए और संविधान का पालन करने वाला होना चाहिए।" उनकी यह टिप्पणी राजधानी में विपक्षी दलों द्वारा 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) प्रक्रिया और चुनावी मुद्दों को लेकर किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच आई है।
नायडू ने कहा कि जो लोग राजनीतिक बदलाव चाहते हैं, उन्हें जनजीवन में शामिल होना चाहिए, लोगों से जुड़ना चाहिए और हंगामा करने के बजाय चुनावों के जरिए अपने मौके का इंतजार करना चाहिए। उन्होंने कहा, "अगर आप सत्ता बदलना चाहते हैं, तो कड़ी मेहनत करें, जनजीवन में हिस्सा लें और अपने मौके का इंतजार करें।" उन्होंने नागरिकों से दूसरों को शिक्षित करने, समुदायों के साथ जुड़ने और समाज में सकारात्मक योगदान देने का आग्रह किया। अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच संबंध पर जोर देते हुए, नायडू ने कहा कि राष्ट्र-निर्माण का काम केवल सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता। मौलिक अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे पर निर्भर हैं, और नागरिकों को अपने अधिकारों का उपयोग करते समय अपनी जिम्मेदारियों को भी पूरा करना चाहिए। उन्होंने कहा, "आजकल हर कोई अधिकारों की बात करता है, लेकिन कर्तव्यों के बारे में ज्यादा चिंता नहीं करता।"
नायडू ने मतदाताओं से अपील की कि वे अपने प्रतिनिधियों को जाति, समुदाय, आपराधिक पृष्ठभूमि या पैसे के आधार पर नहीं, बल्कि उनके चरित्र, योग्यता, क्षमता और आचरण के आधार पर चुनें। उन्होंने सांसदों और विधायकों से भी संसद और विधानसभा की बहसों और चर्चाओं में प्रभावी ढंग से भाग लेने को कहा।
उन्होंने कहा, "सांसदों और विधायकों को चर्चा करनी चाहिए, बहस करनी चाहिए और निर्णय लेना चाहिए। यानी तीन 'D' - चर्चा (Discuss), बहस (Debate) और निर्णय (Decide)।" पूर्व उपराष्ट्रपति ने सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों को बहाल करने और देश की पारिवारिक तथा शिक्षा प्रणालियों को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कक्षा 8 से ही स्कूली पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा को शामिल करने की वकालत की। उन्होंने कहा कि शिक्षा को अकादमिक ज्ञान और कौशल के साथ-साथ ईमानदारी, करुणा, अनुशासन और जिम्मेदारी को भी बढ़ावा देना चाहिए।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि बच्चों को रामायण और महाभारत के नैतिक पाठ पढ़ाए जाने चाहिए, न कि इन्हें केवल एक संकीर्ण धार्मिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। नायडू ने युवाओं से उच्च शिक्षा प्राप्त करने, आधुनिक कौशल विकसित करने और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग लेने का आग्रह किया। एक ग्रामीण गांव से देश के दूसरे सर्वोच्च संवैधानिक पद तक के अपने सफर को याद करते हुए उन्होंने कहा कि कड़ी मेहनत, अनुशासन और जनसेवा के प्रति समर्पण ने ही उनके करियर को आकार दिया है। उन्होंने युवा पीढ़ी से राष्ट्र-निर्माण में योगदान देने का आह्वान करते हुए कहा, "ऊंचे लक्ष्य रखें, बड़े सपने देखें और कड़ी मेहनत करें।" प्रगति के लिए शांति को अनिवार्य बताते हुए, नायडू ने कहा कि नागरिकों को कानून के शासन, सार्वजनिक संपत्ति और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करना चाहिए।