नई दिल्ली। साल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर भारत निर्वाचन आयोग ने तैयारियां तेज कर दी हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष, पारदर्शी और व्यवस्थित तरीके से संपन्न कराने के लिए प्रशासनिक व्यवस्थाओं की समीक्षा की जा रही है। इसी बीच उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची पुनरीक्षण से जुड़े अधिकारियों के तबादलों को लेकर अहम निर्देश जारी किए गए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण के दौरान संबंधित अधिकारियों का स्थानांतरण बिना पूर्व अनुमति नहीं किया जा सकेगा। यह प्रतिबंध 12 नवंबर 2026 से 4 जनवरी 2027 तक प्रभावी रहेगा। दूसरी ओर, पांचों चुनावी राज्यों में प्रशासनिक तैयारियों, सुरक्षा व्यवस्था, मतदान केंद्रों और निर्वाचन कर्मचारियों की उपलब्धता की समीक्षा भी तेज हो गई है।
चुनाव आयोग ने अधिकारियों के तबादलों पर क्यों की सख्ती?
निर्वाचन आयोग का मुख्य उद्देश्य चुनाव से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रियाओं में निरंतरता बनाए रखना है। चुनाव से पहले मतदाता सूची तैयार करना, नए मतदाताओं के नाम जोड़ना, गलत प्रविष्टियों को सुधारना और अपात्र नामों को हटाना महत्वपूर्ण कार्य होते हैं।
इन कार्यों के बीच संबंधित अधिकारियों का बार-बार तबादला होने से प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसलिए उत्तर प्रदेश में आयोग ने विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण से जुड़े अधिकारियों के स्थानांतरण के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य कर दी है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने 21 अक्टूबर को जारी जानकारी में स्पष्ट किया कि पुनरीक्षण कार्य से जुड़े अधिकारियों के पद खाली नहीं रखे जाएंगे।इस व्यवस्था का उद्देश्य निर्धारित समय पर मतदाता सूची तैयार करना और निर्वाचन संबंधी कार्यों को व्यवस्थित तरीके से पूरा करना है।
डीएम, एसडीएम और निर्वाचन अधिकारियों पर लागू होंगे निर्देश
उत्तर प्रदेश में जारी निर्देशों के अनुसार, जिला निर्वाचन अधिकारी, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी और सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी सहित मतदाता सूची पुनरीक्षण में लगे कर्मचारियों के स्थानांतरण पर प्रतिबंध लागू होगा।
इसमें संबंधित जिम्मेदारी निभाने वाले जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी और तहसीलदार स्तर के अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं।हालांकि, इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि राज्य के सभी सरकारी अधिकारियों के तबादलों पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। प्रतिबंध मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्य से सीधे जुड़े अधिकारियों के लिए है।आवश्यक परिस्थितियों में संबंधित अधिकारी का स्थानांतरण चुनाव आयोग की पूर्व अनुमति मिलने के बाद किया जा सकेगा।
12 नवंबर से 4 जनवरी तक लागू रहेगी व्यवस्था
उत्तर प्रदेश में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण का कार्यक्रम घोषित किया जा चुका है। इसके तहत 12 नवंबर 2026 को मतदाता सूची का प्रारूप प्रकाशित किया जाएगा।इसके बाद 11 दिसंबर तक मतदाता अपने नाम और अन्य विवरणों से संबंधित दावे तथा आपत्तियां दर्ज करा सकेंगे।इन दावों और आपत्तियों का निस्तारण 28 दिसंबर तक किया जाना है। इसके बाद 4 जनवरी 2027 को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने का कार्यक्रम निर्धारित है।इसी अवधि में चुनावी कार्यों से जुड़े अधिकारियों के स्थानांतरण के लिए आयोग की अनुमति आवश्यक होगी।
इस प्रक्रिया में 1 जनवरी 2027 को पात्रता की आधार तिथि माना गया है। इसका मतलब है कि इस तारीख तक 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले पात्र नागरिक मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन कर सकेंगे।
पांच राज्यों की 690 विधानसभा सीटों पर होना है चुनाव
साल 2027 में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर की कुल 690 विधानसभा सीटों पर चुनाव होने हैं।इनमें सबसे अधिक 403 सीटें उत्तर प्रदेश में हैं। पंजाब में 117, उत्तराखंड में 70, मणिपुर में 60 और गोवा में 40 विधानसभा सीटें हैं।
उत्तर प्रदेश विधानसभा का कार्यकाल 22 मई 2027 को समाप्त होगा। वहीं, अन्य चार राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल मार्च 2027 में अलग-अलग तारीखों पर पूरा होगा।इसी को ध्यान में रखते हुए आयोग ने संबंधित राज्यों में चुनावी व्यवस्थाओं का आकलन शुरू कर दिया है।हालांकि, विधानसभा चुनावों की वास्तविक मतदान तारीखों और चरणों की घोषणा अभी नहीं हुई है।
मणिपुर पहुंच चुकी चुनाव आयोग की टीम
पांच राज्यों में चुनावी तैयारियों की समीक्षा के लिए वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्तों के नेतृत्व में अधिकारियों की टीमें दौरे कर रही हैं।21 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, आयोग की टीम मणिपुर में चुनावी व्यवस्थाओं की समीक्षा कर रही थी। इससे पहले निर्वाचन अधिकारियों का दल
उत्तराखंड
का दौरा कर चुका था।
पंजाब में चुनावी तैयारियों की समीक्षा के लिए 28 अक्टूबर का कार्यक्रम निर्धारित किया गया है।वहीं, गोवा में प्रस्तावित दौरे की तारीखों में बदलाव किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में आयोग की टीम के दौरे की तारीख अभी स्पष्ट नहीं है।इन दौरों के दौरान प्रशासनिक तैयारियों, मतदान व्यवस्था और सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं का आकलन किया जा रहा है।गृह जिले में तैनाती को लेकर क्या है आयोग की नीति?
चुनाव आयोग की सामान्य स्थानांतरण नीति के तहत चुनाव कार्य से सीधे जुड़े अधिकारियों को उनके गृह जिले में तैनात नहीं रखने का प्रावधान है।इसके अतिरिक्त ऐसे अधिकारियों के स्थानांतरण का भी नियम है, जिन्होंने संबंधित अवधि में एक ही जिले में लंबे समय तक सेवाएं दी हों।आयोग की स्थापित नीति में पिछले चार वर्षों के दौरान तीन वर्ष की सेवा पूरी करने की शर्त महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसका उद्देश्य चुनावी प्रशासन में निष्पक्षता बनाए रखना है।
हालांकि, पांचों राज्यों के लिए 2027 के चुनावों से संबंधित अलग-अलग स्थानांतरण समयसीमाओं की ताजा आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान तबादलों पर लगी रोक एक अलग प्रशासनिक व्यवस्था है।
ईवीएम और वीवीपैट की जांच भी शुरू
चुनाव आयोग केवल अधिकारियों की तैनाती ही नहीं, बल्कि मतदान से जुड़ी तकनीकी तैयारियों पर भी ध्यान दे रहा है।उत्तर प्रदेश और गोवा में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों तथा वीवीपैट की प्रथम स्तरीय जांच शुरू होने की जानकारी सामने आई है।इस प्रक्रिया में मशीनों की तकनीकी स्थिति का परीक्षण किया जाता है, ताकि मतदान के दौरान इस्तेमाल होने वाले उपकरण निर्धारित मानकों के अनुसार तैयार रहें।इसके अलावा मतदान केंद्रों पर बिजली, पेयजल, शौचालय, दिव्यांग मतदाताओं के लिए रैंप और संचार सुविधाओं की उपलब्धता भी चुनावी तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
निष्पक्ष चुनाव के लिए प्रशासनिक तैयारी महत्वपूर्ण
चुनाव आयोग की ओर से अधिकारियों के स्थानांतरण और मतदाता सूची पुनरीक्षण से जुड़े निर्देशों का उद्देश्य चुनावी व्यवस्था को प्रभावी बनाना है।लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13सीसी के अनुसार मतदाता सूची तैयार करने और संशोधन के कार्य में लगे अधिकारी संबंधित अवधि के दौरान चुनाव आयोग के नियंत्रण, पर्यवेक्षण और अनुशासन के अधीन काम करते हैं।इससे आयोग को निर्वाचन संबंधी जिम्मेदारियों के संचालन में प्रशासनिक नियंत्रण प्राप्त होता है।
अब चुनाव कार्यक्रम की घोषणा पर रहेंगी नजरें
उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में चुनाव आयोग की तैयारियां लगातार आगे बढ़ रही हैं। मतदाता सूची के पुनरीक्षण, चुनावी अधिकारियों की तैनाती, मतदान केंद्रों की समीक्षा और ईवीएम की जांच जैसी प्रक्रियाओं को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।आगामी दिनों में वरिष्ठ अधिकारियों की समीक्षा पूरी होने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त भी संबंधित राज्यों में चुनावी व्यवस्थाओं का जायजा ले सकते हैं।
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