Monsoon सत्र से पहले डिलिमिटेशन बिल पर सियासी गणित तेज

Update: 2026-07-19 13:06 GMT

New Delhi नई दिल्ली :   संसद के मानसून सत्र से पहले राजनीतिक गलियारों में परिसीमन (डिलिमिटेशन) बिल को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। अटकलें लगाई जा रही हैं कि केंद्र सरकार एक बार फिर डिलिमिटेशन से जुड़ा विधेयक संसद में पेश कर सकती है। हालांकि, अभी तक सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है और न ही इसे संसद के सूचीबद्ध विधायी कार्यों में शामिल किया गया है। इसके बावजूद विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच इस मुद्दे पर चर्चाओं का दौर जारी है।

सूत्रों के अनुसार, सरकार विधेयक को पारित कराने के लिए आवश्यक समर्थन जुटाने में लगी हुई है। इसी बीच यह चर्चा भी सामने आई है कि पिछली बार परिसीमन के मुद्दे का विरोध करने वाली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) इस बार अपने रुख में बदलाव कर सकती है। हालांकि, इस संबंध में पार्टी की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे ने इसलिए भी ध्यान खींचा है क्योंकि डीएमके अब तक परिसीमन के सवाल पर दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं को प्रमुखता से उठाती रही है। पार्टी का कहना रहा है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए और किसी भी परिसीमन प्रक्रिया में सभी राज्यों के साथ न्याय होना आवश्यक है।

रविवार को आयोजित सर्वदलीय बैठक के बाद रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) के सांसद प्रेमचंद्रन ने दावा किया कि डीएमके इस बार डिलिमिटेशन बिल का समर्थन करने के लिए तैयार हो गई है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गईं। हालांकि, डीएमके की ओर से इस दावे की पुष्टि नहीं की गई है।

दूसरी ओर, डीएमके के वरिष्ठ सांसद तिरुचि शिवा ने इस विषय पर स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने अभी तक परिसीमन को लेकर कोई ठोस या आधिकारिक प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया है। उन्होंने कहा कि बिना प्रस्ताव देखे किसी भी प्रकार के समर्थन या विरोध की बात करना उचित नहीं होगा। उनका कहना था कि पार्टी अपने सिद्धांतों और राज्य के हितों को ध्यान में रखते हुए ही अंतिम निर्णय लेगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भविष्य में सरकार डिलिमिटेशन बिल पेश करती है, तो संसद में इसे लेकर व्यापक बहस देखने को मिल सकती है। यह मुद्दा केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संघीय ढांचे, राज्यों के प्रतिनिधित्व और जनसंख्या आधारित सीटों के पुनर्निर्धारण से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में विभिन्न दलों का रुख विधेयक के अंतिम स्वरूप पर निर्भर करेगा।

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि केंद्र सरकार मानसून सत्र में वास्तव में डिलिमिटेशन बिल पेश करेगी या नहीं। सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। वहीं डीएमके ने भी यह साफ किया है कि जब तक सरकार का प्रस्ताव सामने नहीं आता, तब तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

ऐसे में परिसीमन को लेकर जारी चर्चाओं के बीच सभी की निगाहें अब संसद के मानसून सत्र और सरकार की अगली रणनीति पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक तस्वीर और अधिक स्पष्ट होने की संभावना है।

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