नई दिल्ली। कैंसर के इलाज को अधिक किफायती बनाने और मरीजों पर दवाओं के खर्च का बोझ कम करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के फार्मास्यूटिकल्स विभाग के अंतर्गत आने वाली राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने 137 चिन्हित गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन रैशनलाइजेशन (TMR) लागू किया है। इस पहल का उद्देश्य दवाओं की बिक्री में अत्यधिक व्यापारिक मार्जिन को नियंत्रित करना, मरीजों को उचित कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराना और कैंसर के इलाज की पहुंच को बेहतर बनाना है।सरकार की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, इस फैसले से चिन्हित दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) में मौजूदा कीमतों के आधार पर 70 प्रतिशत तक की कमी आने की उम्मीद है। हालांकि, वास्तविक कटौती अलग-अलग दवाओं और उनके मौजूदा मूल्य के अनुसार अलग हो सकती है। इससे कैंसर का इलाज करा रहे मरीजों और उनके परिवारों को दवाओं पर होने वाले खर्च में राहत मिलने की संभावना है।
2019 के पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के बाद बढ़ाया गया दायरा
केंद्र सरकार की यह पहल वर्ष 2019 में शुरू किए गए ट्रेड मार्जिन रैशनलाइजेशन पायलट प्रोजेक्ट पर आधारित है। उस समय 42 कैंसर-रोधी दवाओं के व्यापारिक मार्जिन को सीमित किया गया था। इसके बाद गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाओं के 526 ब्रांडों के अधिकतम खुदरा मूल्य में 90 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई थी। इस अनुभव के आधार पर अब अधिक दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाने की दिशा में कदम उठाया गया है।नई व्यवस्था में स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) की विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर दवाओं का चयन किया गया है। इसका उद्देश्य मरीजों को महंगी कैंसर-रोधी दवाएं अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध कराना है। सरकार का मानना है कि दवाओं की बिक्री में अत्यधिक व्यापारिक मार्जिन को सीमित करने से उनके अंतिम मूल्य पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
क्या होता है ट्रेड मार्जिन रैशनलाइजेशन?
ट्रेड मार्जिन रैशनलाइजेशन यानी TMR एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके जरिए दवा की आपूर्ति और बिक्री के विभिन्न चरणों में जोड़ा जाने वाला व्यापारिक मार्जिन नियंत्रित किया जाता है। दवा निर्माता से लेकर वितरक और खुदरा विक्रेता तक पहुंचने की प्रक्रिया में अलग-अलग स्तर पर मार्जिन जुड़ सकता है। यदि ये मार्जिन बहुत अधिक हों, तो मरीजों को वही दवा काफी ऊंची कीमत पर खरीदनी पड़ सकती है।इस व्यवस्था का उद्देश्य व्यापारिक मार्जिन को निर्धारित सीमा में रखना है, ताकि दवाओं की कीमतें अधिक किफायती बन सकें। सरकार ने गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाओं के लिए 30 प्रतिशत तक ट्रेड मार्जिन की सीमा तय करने की पहल की है। इससे कुछ दवाओं के MRP में 70 प्रतिशत तक की कमी संभव होने का अनुमान है। हालांकि, हर दवा की कीमत में समान अनुपात से गिरावट होना जरूरी नहीं है। वास्तविक बदलाव संबंधित दवा के मौजूदा मूल्य और लागू नियमों पर निर्भर करेगा।
कैंसर मरीजों और परिवारों को कैसे मिलेगी राहत?
कैंसर के इलाज में दवाओं पर लगातार खर्च करना कई परिवारों के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती बन जाता है। उपचार के दौरान मरीजों को लंबे समय तक दवाओं की आवश्यकता हो सकती है। ऐसे में दवाओं की कीमत में कमी आने से मरीजों के परिवारों का खर्च घट सकता है और उपचार जारी रखना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।इस कदम से विशेष रूप से उन मरीजों को लाभ मिलने की उम्मीद है, जिन्हें चिन्हित गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाओं की आवश्यकता होती है। फिर भी यह ध्यान रखना जरूरी है कि कैंसर के पूरे इलाज में केवल दवाओं का खर्च ही शामिल नहीं होता। अस्पताल में भर्ती होने, जांच, सर्जरी, रेडिएशन और अन्य चिकित्सकीय सेवाओं पर भी खर्च हो सकता है। इसलिए दवाओं की कीमतों में कमी महत्वपूर्ण राहत जरूर है, लेकिन इससे इलाज का पूरा खर्च समाप्त नहीं होगा।
दवाओं की उपलब्धता और कीमतों पर निगरानी भी जरूरी
NPPA की पहल का एक प्रमुख उद्देश्य कैंसर-रोधी दवाओं को किफायती बनाने के साथ उनकी उपलब्धता बेहतर करना भी है। मूल्य नियंत्रण के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए जरूरी होगा कि दवा कंपनियां, वितरक और खुदरा विक्रेता निर्धारित नियमों का पालन करें। मरीजों को भी दवाएं खरीदते समय पैकेट पर दर्ज अधिकतम खुदरा मूल्य और संबंधित मूल्य संबंधी निर्देशों की जानकारी लेनी चाहिए।कुल मिलाकर, 137 चिन्हित गैर-अनुसूचित कैंसर-रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन रैशनलाइजेशन की पहल कैंसर उपचार को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि निर्धारित सीमा का प्रभावी क्रियान्वयन होता है, तो दवाओं के खर्च में उल्लेखनीय राहत मिल सकती है। मरीजों के लिए वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित दवाओं के संशोधित मूल्य कितनी प्रभावी तरीके से लागू होते हैं और बाजार में उनकी उपलब्धता बनी रहती है।