नई दिल्ली : देश में निजी एयरलाइंस द्वारा हवाई किराए और विभिन्न सहायक शुल्कों (एंसिलरी चार्ज) में होने वाले अचानक उतार-चढ़ाव के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट सोमवार, 13 जुलाई को एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करेगा। इस याचिका में मांग की गई है कि एयरलाइंस की मूल्य निर्धारण प्रणाली को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए स्पष्ट नियामक (रेगुलेटरी) दिशानिर्देश तैयार किए जाएं। साथ ही नागरिक उड्डयन क्षेत्र में यात्रियों के हितों की रक्षा के लिए एक स्वतंत्र और प्रभावी नियामक संस्था गठित करने की भी मांग की गई है।
यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता एस. लक्ष्मीनारायणन ने दायर की है। मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ करेगी। याचिका में कहा गया है कि निजी एयरलाइंस द्वारा टिकटों के दाम और अतिरिक्त शुल्कों में अचानक की जाने वाली बढ़ोतरी से यात्रियों को आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है और मौजूदा व्यवस्था में उनके हितों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं हो पा रही है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि मौजूदा समय में एयरलाइंस कंपनियां मांग और उपलब्धता के आधार पर किराए तय करती हैं, लेकिन कई बार बिना किसी स्पष्ट कारण के टिकटों की कीमतों में भारी वृद्धि देखी जाती है। इसके अलावा सीट चयन, अतिरिक्त सामान, भोजन, टिकट संशोधन और अन्य सेवाओं के लिए लिए जाने वाले सहायक शुल्क भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं। इन शुल्कों के निर्धारण में पर्याप्त पारदर्शिता नहीं होने के कारण यात्रियों को वास्तविक लागत की जानकारी नहीं मिल पाती।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि केंद्र सरकार और संबंधित नियामक संस्थाओं को निर्देश दिए जाएं ताकि हवाई किराए और अतिरिक्त शुल्कों के निर्धारण के लिए स्पष्ट और प्रभावी दिशानिर्देश बनाए जा सकें। याचिकाकर्ता का तर्क है कि विमानन क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के बावजूद यात्रियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत नियामक व्यवस्था आवश्यक है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि नागरिक उड्डयन क्षेत्र के लिए एक स्वतंत्र नियामक संस्था गठित की जानी चाहिए, जो एयरलाइंस कंपनियों की मूल्य निर्धारण प्रक्रिया की निगरानी करे और यात्रियों की शिकायतों का निष्पक्ष समाधान सुनिश्चित करे। इस संस्था का उद्देश्य किराए में पारदर्शिता बढ़ाना, अनुचित शुल्कों पर नियंत्रण रखना और उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा करना होना चाहिए।
हाल के वर्षों में त्योहारों, छुट्टियों, प्राकृतिक आपदाओं और विशेष परिस्थितियों के दौरान हवाई किराए में अचानक कई गुना बढ़ोतरी को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। कई उपभोक्ता संगठनों और यात्रियों ने शिकायत की है कि मांग बढ़ते ही टिकटों की कीमतें सामान्य स्तर से काफी अधिक हो जाती हैं। इसके अलावा टिकट बुकिंग के दौरान अलग-अलग प्रकार के अतिरिक्त शुल्क भी अंतिम भुगतान राशि को काफी बढ़ा देते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि विमानन क्षेत्र में डायनेमिक प्राइसिंग (मांग के अनुसार किराया तय करने की व्यवस्था) एक सामान्य व्यावसायिक प्रक्रिया है, लेकिन इसके साथ पारदर्शिता और उपभोक्ता संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। यदि किराया निर्धारण के लिए स्पष्ट नियम और निगरानी व्यवस्था हो तो यात्रियों का भरोसा बढ़ेगा और अनावश्यक विवादों में भी कमी आएगी।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि कई देशों में विमानन क्षेत्र के लिए स्वतंत्र नियामक संस्थाएं कार्यरत हैं, जो किराया निर्धारण, उपभोक्ता अधिकारों और सेवा गुणवत्ता पर निगरानी रखती हैं। भारत में भी इसी तरह की व्यवस्था लागू करने की आवश्यकता बताई गई है, ताकि एयरलाइंस कंपनियों और यात्रियों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोई महत्वपूर्ण निर्देश जारी करता है तो इसका प्रभाव देश के पूरे नागरिक उड्डयन क्षेत्र पर पड़ सकता है। इससे हवाई किराया तय करने की प्रक्रिया, अतिरिक्त शुल्कों की व्यवस्था और उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े नियमों में बदलाव की संभावना भी बन सकती है।
फिलहाल सभी की निगाहें 13 जुलाई को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट याचिकाकर्ता की दलीलों के साथ-साथ केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों का पक्ष भी सुनेगा। इसके बाद अदालत तय करेगी कि इस मामले में आगे क्या दिशा-निर्देश जारी किए जाएं या किन बिंदुओं पर विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता है।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब देश में हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में किराया निर्धारण की पारदर्शी व्यवस्था और यात्रियों के अधिकारों की सुरक्षा का मुद्दा पहले से अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस जनहित याचिका पर क्या रुख अपनाता है और क्या इससे नागरिक उड्डयन क्षेत्र में नई नियामक व्यवस्था की दिशा में कोई महत्वपूर्ण पहल होती है।