नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने गुरुवार को दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई और अंकिता भंडारी के माता-पिता को हिरासत में लिए जाने की घटना पर केंद्र सरकार से तीखे सवाल किए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जवाबदेही की मांग करने वाले नागरिकों की आवाज सुनने के बजाय उन्हें हिरासत में लेने का सहारा ले रही है। थरूर ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है और इसे केवल इसलिए प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता क्योंकि सरकार प्रदर्शनकारियों के सवालों से असहज है।थरूर की प्रतिक्रिया जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के कार्यकर्ताओं को न्यायिक हिरासत में भेजे जाने और इंडिया गेट पर अंकिता भंडारी के माता-पिता को हिरासत में लिए जाने के बाद सामने आई है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर इन घटनाओं की आलोचना की।
'क्या सरकार जवाबदेही की जिम्मेदारी भूल गई?'
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सवाल किया कि क्या सरकार ने जवाबदेही तय करने की अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह छोड़ दी है और अब सवाल पूछने वाले लोगों को हिरासत में लेकर चुप कराने की कोशिश की जा रही है।उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर पर युवा नागरिक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। उनके हाथों में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा भी था, लेकिन इसके बावजूद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।थरूर ने कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रखना लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने सरकार से पूछा कि ऐसे प्रदर्शनकारियों से सार्वजनिक व्यवस्था को क्या खतरा हो सकता है।
अंकिता भंडारी के माता-पिता की हिरासत पर नाराजगी
शशि थरूर ने इंडिया गेट पर अंकिता भंडारी के माता-पिता को हिरासत में लिए जाने पर भी नाराजगी जताई।उन्होंने कहा कि अपनी बेटी के लिए न्याय मांग रहे माता-पिता को गुरुवार तड़के करीब चार बजे हिरासत में लिया गया। उनके समर्थन में मौजूद कांग्रेस कार्यकर्ताओं को भी पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा।अंकिता भंडारी की सितंबर 2022 में उत्तराखंड में हत्या कर दी गई थी। उनके माता-पिता लंबे समय से न्याय और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।परिवार हाल में दुष्यंत कुमार गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किए जाने का विरोध कर रहा था। उनकी मांग थी कि सीबीआई जांच पूरी होने तक इस नियुक्ति पर रोक लगाई जाए। परिवार की आपत्तियां आरोपों पर आधारित हैं और किसी व्यक्ति की आपराधिक संलिप्तता को सिद्ध नहीं करतीं।
प्रदर्शनकारी अपराधी नहीं, शोक में डूबे माता-पिता खतरा नहीं'
थरूर ने अपने बयान में कहा कि विरोध प्रदर्शन करने वाले किसी नागरिक को केवल प्रदर्शन करने के कारण अपराधी नहीं माना जाना चाहिए। इसी तरह अपनी बेटी के लिए न्याय मांग रहे माता-पिता को सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा नहीं समझा जाना चाहिए।उन्होंने सवाल उठाया कि पहले से दुख झेल रहे परिवार को हिरासत जैसी कार्रवाई का सामना क्यों करना पड़ रहा है।थरूर ने जोर देकर कहा कि हिरासत में लेने की शक्ति का इस्तेमाल असहमति की आवाज दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
CJP के दो कार्यकर्ताओं को पांच दिन की न्यायिक हिरासत
दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच CJP के कार्यकर्ता सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।पुलिस के अनुसार, कार्यकर्ताओं पर प्रतिबंधित प्रदर्शन स्थल में प्रवेश करने और कानून-व्यवस्था संबंधी निर्देशों का उल्लंघन करने के आरोप हैं।न्यायिक कार्रवाई के दौरान सार्वजनिक शांति बनाए रखने को लेकर भी चिंता जताई गई थी। वहीं, CJP ने पुलिस कार्रवाई को विरोध की आवाज दबाने का प्रयास बताया है।
विरोध प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार पर दिया जोर
थरूर ने कहा कि संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार देता है। यह अधिकार सरकार की सहमति या असहमति पर निर्भर नहीं होना चाहिए।हालांकि, भारत में शांतिपूर्ण सभा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत संरक्षित है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था के हित में इस पर कानूनी और उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।थरूर ने कहा कि पुलिस स्टेशन के दरवाजे पर न्याय की मांग समाप्त नहीं हो जाती और गिरफ्तारी का डर नागरिकों को सवाल पूछने से नहीं रोकना चाहिए।
हिरासत के मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज
अंकिता भंडारी के माता-पिता को हिरासत में लिए जाने और CJP कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई पर विपक्षी नेताओं ने भी सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित कई नेताओं ने परिवार के प्रति समर्थन व्यक्त किया है।दूसरी ओर, भाजपा नेताओं ने अंकिता भंडारी मामले में उत्तराखंड सरकार की कार्रवाई का बचाव करते हुए जांच, आरोपियों की गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया का उल्लेख किया है।इन घटनाओं के बाद दिल्ली में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।