नई दिल्ली। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में बच्चों के टीकाकरण को लेकर महत्वपूर्ण प्रगति के बावजूद खसरे और वैक्सीन से रोकी जा सकने वाली दूसरी बीमारियों के प्रकोप चिंता का विषय बने हुए हैं। क्षेत्र में टीकाकरण कार्यक्रमों की प्रगति, मौजूदा चुनौतियों और भविष्य की प्राथमिकताओं की समीक्षा के दौरान विशेषज्ञों ने कहा कि केवल ऊंचे औसत टीकाकरण कवरेज से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता। बच्चों और किशोरों में जहां भी रोग प्रतिरोधक क्षमता की कमी बनी हुई है, वहां केंद्रित प्रयासों की जरूरत है।WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय टीकाकरण तकनीकी सलाहकार समूह यानी SEAR ITAG की 17वीं बैठक में टीकाकरण कवरेज को बनाए रखने, खसरे सहित वैक्सीन से रोकी जा सकने वाली बीमारियों को नियंत्रित करने और दुर्गम समुदायों तक टीके पहुंचाने जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई।बैठक में WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के प्रभारी अधिकारी डॉ. नीलेश बुद्ध ने कहा कि अब तक हुई प्रगति को लापरवाही का कारण नहीं बनने देना चाहिए। उन्होंने मजबूत निगरानी, स्थानीय स्तर के आंकड़ों के समय पर इस्तेमाल और टीकाकरण कार्यक्रमों की नियमित समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।
ऊंचे कवरेज के बावजूद बनी हुई हैं चुनौतियां
दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र ने बच्चों के नियमित टीकाकरण कवरेज में उल्लेखनीय प्रगति की है। इसके बावजूद क्षेत्र के कई हिस्सों में खसरे और अन्य वैक्सीन-रोकथाम योग्य बीमारियों के प्रकोप सामने आ रहे हैं।विशेषज्ञों के अनुसार, इसका एक महत्वपूर्ण कारण अलग-अलग इलाकों और समुदायों में मौजूद 'इम्युनिटी गैप' है। किसी देश का कुल टीकाकरण कवरेज अच्छा दिखाई दे सकता है, लेकिन उसके भीतर कुछ जिले, ग्रामीण क्षेत्र, दूरदराज के समुदाय या अन्य समूह ऐसे हो सकते हैं जहां पर्याप्त संख्या में बच्चों को समय पर जरूरी टीके नहीं मिले हों।ऐसी स्थिति में बीमारी फैलने पर कम प्रतिरक्षा वाले समुदायों में संक्रमण तेजी से फैल सकता है। यही वजह है कि WHO ने राष्ट्रीय औसत के साथ स्थानीय स्तर के आंकड़ों को भी गंभीरता से देखने पर जोर दिया है।
'प्रगति से लापरवाह नहीं होना चाहिए'
SEAR ITAG की बैठक के उद्घाटन संबोधन में डॉ. नीलेश बुद्ध ने कहा, “प्रगति से हमें लापरवाह नहीं होना चाहिए। टीकाकरण कवरेज के ऊंचे स्तर को बनाए रखने के लिए मजबूत निगरानी, स्थानीय डेटा का समय पर इस्तेमाल और कार्यक्रम की सघन समीक्षा जरूरी है।”उन्होंने कहा कि टीकाकरण से जुड़ी कमियों को दूर करना और निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाना आवश्यक है। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जीवन बचाने वाले टीके हर बच्चे और हर समुदाय तक पहुंचें।यह संदेश ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में समग्र टीकाकरण कवरेज बेहतर होने के बावजूद कुछ स्थानों पर वैक्सीन से रोकी जा सकने वाली बीमारियों के मामले सामने आ रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर कमियों की पहचान जरूरी
SEAR ITAG के अध्यक्ष प्रोफेसर राकेश अग्रवाल ने भी कुल टीकाकरण कवरेज के आंकड़ों से आगे बढ़कर स्थानीय परिस्थितियों पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई।उन्होंने कहा कि अब उन उप-राष्ट्रीय क्षेत्रों और दुर्गम समुदायों पर विशेष ध्यान देना होगा, जहां टीकाकरण की कमियां बनी हुई हैं। इसके लिए स्थानीय आंकड़ों और महामारी विज्ञान यानी एपिडेमियोलॉजी के आधार पर केंद्रित टीकाकरण अभियान चलाने की जरूरत है।इस तरह की रणनीति का उद्देश्य उन बच्चों तक पहुंचना है, जो किसी कारण नियमित टीकाकरण कार्यक्रम से छूट गए हैं या जिन्हें निर्धारित समय पर टीके की सभी जरूरी खुराक नहीं मिल पाई हैं।
खसरे के प्रकोप ने बढ़ाई चिंता
खसरा अत्यधिक संक्रामक बीमारी है और इससे बचाव में टीकाकरण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। किसी समुदाय में पर्याप्त टीकाकरण नहीं होने पर बीमारी के फैलने का जोखिम बढ़ सकता है।इसी कारण टीकाकरण विशेषज्ञ ऐसे बच्चों की पहचान पर जोर दे रहे हैं जो नियमित टीकाकरण से छूट गए हैं। बच्चों के साथ किशोरों में भी प्रतिरक्षा की कमी की पहचान करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।WHO की प्राथमिकताओं में खसरे के मामलों की समय पर पहचान, बीमारी की निगरानी, प्रकोप की स्थिति में तेज प्रतिक्रिया और प्रभावित क्षेत्रों में टीकाकरण कवरेज बढ़ाना शामिल है।
केवल राष्ट्रीय औसत पर्याप्त नहीं
बैठक में एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह रहा कि किसी देश का राष्ट्रीय टीकाकरण औसत वास्तविक स्थिति की पूरी तस्वीर नहीं दिखा सकता। उदाहरण के तौर पर, राष्ट्रीय स्तर पर कवरेज ऊंचा होने के बावजूद कुछ जिलों या समुदायों में यह काफी कम हो सकता है।यही छोटे टीकाकरण अंतराल भविष्य में बीमारी के प्रकोप की वजह बन सकते हैं। विशेषज्ञों ने इसी कारण उप-राष्ट्रीय स्तर पर डेटा के विश्लेषण को प्राथमिकता देने की बात कही है।स्थानीय स्तर पर यह जानना जरूरी है कि किस गांव, जिले या समुदाय में बच्चे टीकाकरण से छूट रहे हैं और उसके पीछे क्या कारण हैं। दूरी, स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच, पलायन या टीकों को लेकर गलत जानकारी जैसे कई कारण टीकाकरण कार्यक्रम को प्रभावित कर सकते हैं।
निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत
टीकाकरण कार्यक्रम के साथ बीमारी की निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाना भी जरूरी बताया गया है। किसी क्षेत्र में खसरे या दूसरी वैक्सीन से रोकी जा सकने वाली बीमारी के मामले सामने आते हैं तो उसकी जल्द पहचान से समय रहते कार्रवाई करने में मदद मिल सकती है।मजबूत निगरानी से स्वास्थ्य विभाग को यह पता लगाने में भी सहायता मिलती है कि बीमारी किस क्षेत्र में फैल रही है और किन समुदायों में प्रतिरक्षा का स्तर कम हो सकता है।इसके बाद उपलब्ध संसाधनों को उन क्षेत्रों में प्राथमिकता के आधार पर लगाया जा सकता है जहां उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
हर बच्चे तक पहुंचने का लक्ष्य
WHO और टीकाकरण विशेषज्ञों का मुख्य जोर इस बात पर है कि कोई भी बच्चा केवल अपने निवास स्थान, आर्थिक स्थिति या स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच के कारण जरूरी टीकों से वंचित न रहे।दूरदराज और कमजोर समुदायों तक टीकाकरण सेवाएं पहुंचाने के लिए स्थानीय आंकड़ों के आधार पर रणनीति बनाने की जरूरत बताई गई है। इसमें नियमित टीकाकरण के साथ जरूरत के अनुसार विशेष अभियान भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।SEAR ITAG की 17वीं बैठक में सामने आया संदेश स्पष्ट है कि दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में टीकाकरण की उपलब्धियों को बनाए रखने के साथ अब उन छोटे लेकिन महत्वपूर्ण अंतरालों को भरने की जरूरत है, जहां बच्चे और किशोर अभी भी पर्याप्त प्रतिरक्षा से वंचित हैं।WHO ने इस दिशा में मजबूत निगरानी, स्थानीय डेटा के बेहतर इस्तेमाल, नियमित कार्यक्रम समीक्षा और केंद्रित टीकाकरण प्रयासों को प्रमुख प्राथमिकता बताया है। लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि ऊंचे टीकाकरण कवरेज का लाभ केवल आंकड़ों तक सीमित न रहे, बल्कि हर बच्चे और हर समुदाय तक जीवनरक्षक टीकों की वास्तविक पहुंच सुनिश्चित हो।