नई दिल्ली: कैंसर की महंगी दवाओं का खर्च उठा रहे मरीजों और उनके परिवारों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण ने चिह्नित 137 गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की अधिकतम सीमा 30 फीसदी तय की है। संशोधित कीमतें 9 नवंबर 2026 से प्रभावी होंगी। सरकार के अनुसार, मौजूदा मूल्य संरचना के आधार पर कुछ दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत में 70 फीसदी तक कमी आ सकती है। हालांकि, प्रत्येक दवा में कटौती समान नहीं होगी। 
यह फैसला केवल प्रस्ताव के स्तर पर नहीं है। इससे संबंधित अधिसूचना 17 अक्टूबर को जारी हो चुकी है। इसका दायरा अधिसूचित कैंसर रोधी दवाओं तक है। इसलिए इसे देश में बिकने वाली सभी दवाओं की कीमतों पर एक समान सीमा लगाने का निर्णय नहीं माना जा सकता। मरीजों को मिलने वाली वास्तविक राहत उनकी निर्धारित दवा, उसके ब्रांड और वर्तमान बिक्री मूल्य पर निर्भर करेगी। इसी तरह कैंसर के संपूर्ण उपचार का खर्च कितनी मात्रा में घटेगा, यह इलाज में इन दवाओं की हिस्सेदारी से तय होगा। 
क्या है ट्रेड मार्जिन की सीमा
ट्रेड मार्जिन का संबंध दवा की आपूर्ति और बिक्री के दौरान जुड़ने वाले व्यावसायिक अंतर से है। नई व्यवस्था में अधिकतम खुदरा मूल्य की गणना पहले बिक्री बिंदु पर स्टॉकिस्ट या वितरक को मिलने वाली कीमत के आधार पर होगी। अधिसूचना में इसके लिए निर्धारित फॉर्मूला दिया गया है। संबंधित दवा की मार्च 2026 की स्टॉकिस्ट अथवा वितरक कीमत गणना का आधार होगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य वितरण श्रृंखला में अत्यधिक मूल्य वृद्धि को नियंत्रित करना है, ताकि मरीज तक पहुंचते-पहुंचते दवा की कीमत अनावश्यक रूप से न बढ़े। 
यहां 30 फीसदी ट्रेड मार्जिन और खरीद कीमत पर 30 फीसदी अतिरिक्त राशि जोड़ने के बीच अंतर समझना जरूरी है। निर्धारित फॉर्मूले में जीएसटी रहित अंतिम मूल्य का अधिकतम 30 फीसदी ट्रेड मार्जिन होगा। उदाहरण के तौर पर, यदि गणना का आधार बनने वाली वितरक कीमत 700 रुपये है, तो अधिकतम 30 फीसदी मार्जिन के हिसाब से जीएसटी से पहले मूल्य 1,000 रुपये बनेगा। इसमें 300 रुपये का अंतर अंतिम मूल्य का 30 फीसदी है। यह केवल गणना समझाने वाला उदाहरण है; किसी वास्तविक दवा की घोषित कीमत नहीं है। 
हर दवा पर एक जैसी छूट नहीं
मार्जिन की सीमा तय होने का अर्थ प्रत्येक दवा पर सीधे 30 फीसदी छूट मिलना भी नहीं है। जिन दवाओं में वर्तमान व्यावसायिक अंतर अधिक है, उनकी कीमत में अपेक्षाकृत बड़ी गिरावट संभव है। जहां यह अंतर पहले से कम है, वहां बदलाव सीमित हो सकता है। सरकार ने अधिकतम 70 फीसदी तक कमी की संभावना जताई है, लेकिन इसे सभी उत्पादों पर लागू सुनिश्चित कटौती नहीं समझना चाहिए। मरीजों को किसी अनुमानित प्रतिशत के बजाय अपनी दवा की संशोधित अधिकतम खुदरा कीमत देखनी होगी। 
पहले से कम कीमत बढ़ाने की अनुमति नहीं
नई गणना से यदि किसी दवा की कीमत उसकी मौजूदा अधिकतम खुदरा कीमत से ज्यादा निकलती है, तो कंपनी को पहले वाली कम कीमत बनाए रखनी होगी। इस प्रावधान का महत्व यह है कि मार्जिन नियंत्रण की प्रक्रिया कीमत बढ़ाने का आधार न बन जाए। अधिसूचित सूची में कई पेटेंट वाली दवाएं भी शामिल हैं। हालांकि, अधिसूचना में उल्लिखित वैधानिक छूटों की स्थिति अलग हो सकती है। व्यवस्था संबंधित सूची में शामिल दवाओं के विभिन्न रूपों और खुराक संबंधी श्रेणियों को निर्धारित शर्तों के अनुसार कवर करती है। 
अस्पतालों और दवा विक्रेताओं की जिम्मेदारी
नई कीमतों का लाभ अस्पतालों से दवा खरीदने वाले मरीजों तक पहुंचाना भी इस फैसले का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कंपनियों को संशोधित मूल्य सूची संबंधित विक्रेताओं और अस्पतालों तक उपलब्ध करानी होगी। निर्धारित तारीख से बिक्री संशोधित कीमतों के अनुरूप करनी होगी। अस्पतालों की फार्मेसी में नई मूल्य सूची प्रदर्शित करने और अस्पतालों की वेबसाइट पर इसकी जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए गए हैं। इससे मरीज और परिजन बिल में दर्ज राशि की तुलना घोषित मूल्य से कर सकेंगे। अनुपालन की निगरानी में राज्य औषधि नियंत्रकों की भूमिका होगी। 
दवा की उपलब्धता बनाए रखना भी जरूरी
कीमत घटने के साथ बाजार में दवाओं की उपलब्धता बनी रहे, इसके लिए कंपनियों को वर्तमान उत्पादन और आपूर्ति स्तर बनाए रखने को कहा गया है। नीति का उद्देश्य अत्यधिक मार्जिन नियंत्रित करते हुए उपचार के लिए जरूरी दवाओं की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करना है। दवा उद्योग के संगठनों ने भी फैसले का स्वागत करते हुए प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी पर जोर दिया है। उनका कहना है कि मरीजों की पहुंच, किफायती कीमत और उपचार की निरंतरता पर इसके असर का आकलन करना महत्वपूर्ण होगा। 
इस कदम से खासतौर पर उन परिवारों को मदद मिलने की उम्मीद है, जिनका नियमित दवा खर्च अधिक है। फिर भी जांच, अस्पताल में भर्ती, सर्जरी और अन्य सेवाओं के खर्च इस मार्जिन सीमा से स्वतः कम नहीं होंगे। राहत का सही आकलन संशोधित मूल्य सूची लागू होने के बाद ही किया जा सकेगा। मरीजों के लिए उपयोगी होगा कि वे निर्धारित तारीख के बाद अपनी दवा का नाम, खुराक, पैक और घोषित कीमत मिलाकर बिल देखें। इस प्रक्रिया से कीमतों में हुए वास्तविक बदलाव और मिलने वाले लाभ की स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी।
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