नई दिल्ली। साउथ सुपरस्टार और अब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन चुके विजय की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'जन नायगन' आखिरकार सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। लंबे इंतजार, विवादों और सेंसर बोर्ड से जुड़ी परेशानियों के बाद फिल्म दर्शकों के सामने है। यह फिल्म इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि राजनीति में सक्रिय होने के बाद विजय की यह आखिरी फिल्म बताई जा रही है। ऐसे में फैंस के लिए यह सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि उनके पसंदीदा अभिनेता की सिनेमाई यात्रा का आखिरी पड़ाव भी है।
फिल्म को लेकर पिछले कई महीनों से जबरदस्त चर्चा थी। निर्माताओं और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के बीच विवाद के बाद फिल्म में कई बदलाव किए गए। कई संवादों को म्यूट किया गया और कुछ दृश्यों पर कट लगाए गए। इसके बाद फिल्म को ए सर्टिफिकेट के साथ रिलीज की अनुमति मिली।
क्या है 'जन नायगन' की कहानी?
फिल्म की कहानी थलपति वेट्री कोंडन (विजय) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो जेल में बंद है। कहानी में एक पुलिस अधिकारी की मौत के बाद उसकी आखिरी इच्छा के रूप में विजय के किरदार को उसकी बेटी विजी (ममिता बैजू) की जिम्मेदारी मिलती है।
थलपति विजी को मजबूत बनाना चाहता है और उसे सेना में जाने के लिए प्रेरित करता है। इसी बीच देश का दुश्मन जॉन हिमलर (बॉबी देओल) एक बड़ी साजिश रचता है। अफ्रीका में तबाही मचाने के बाद अब उसका निशाना भारत होता है। वह 'प्रोजेक्ट एमएम' नाम की योजना के जरिए देश को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है।
जब थलपति और जॉन आमने-सामने आते हैं तो दोनों के बीच पुराने रिश्ते और अतीत के कई राज सामने आते हैं। इसके बाद कहानी एक्शन, संघर्ष और देशभक्ति के रंग में आगे बढ़ती है।
बड़े मुद्दों के बीच भटकती कहानी
फिल्म के निर्देशक एच विनोद ने कहानी और पटकथा दोनों संभाली है। फिल्म में विजय को एक बड़े नेता और सुपरहीरो जैसी छवि में दिखाने की कोशिश की गई है। उनकी एंट्री से लेकर बैकग्राउंड म्यूजिक तक हर चीज को भव्य बनाया गया है।
फिल्म में कई ऐसे संवाद हैं जो सीधे विजय के राजनीतिक सफर से जुड़ते हुए नजर आते हैं। जनता के नेता, लोकतंत्र की रक्षा और लोगों के अधिकार जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी गई है। कई जगह ऐसा महसूस होता है कि फिल्म विजय के राजनीतिक करियर की छवि को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
हालांकि इसी वजह से फिल्म की मुख्य कहानी कई बार पीछे छूट जाती है। फिल्म में महिलाओं की सुरक्षा, सोशल मीडिया की ताकत, वोट की अहमियत, धर्म और जाति के नाम पर राजनीति जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल किए गए हैं। लेकिन इतने सारे विषयों को एक साथ दिखाने के कारण कहानी कई जगह बिखरी हुई लगती है।
विजय का स्टारडम बरकरार
अभिनय की बात करें तो विजय ने अपने आखिरी प्रोजेक्ट में कोई कमी नहीं छोड़ी है। एक्शन, डांस और डायलॉग डिलीवरी में उनका वही पुराना अंदाज देखने को मिलता है। उनके फैंस के लिए फिल्म में कई ऐसे पल हैं जहां थिएटर में तालियां और सीटियां सुनाई दे सकती हैं।
बॉबी देओल ने विलेन के किरदार में प्रभावित किया है। उनका खतरनाक अंदाज फिल्म को मजबूती देता है, हालांकि हिंदी वर्जन में उनकी आवाज की डबिंग उनके अभिनय के स्तर से मेल नहीं खाती।
पूजा हेगड़े का किरदार एक बार फिर मुख्य नायक को सपोर्ट करने तक सीमित नजर आता है। वहीं ममिता बैजू ने विजी के किरदार में अच्छा काम किया है। कमजोर लड़की से मजबूत योद्धा बनने का उनका सफर प्रभावी लगता है। रेवती, प्रकाश राज और नासर जैसे कलाकारों ने भी अपने अनुभव से फिल्म को संभाला है।
फिल्म की खासियत और कमी
'जन नायगन' की सबसे बड़ी ताकत विजय का करिश्मा, एक्शन सीक्वेंस और बड़े पैमाने पर फिल्माया गया अंदाज है। फिल्म के कुछ संवाद दर्शकों को पसंद आ सकते हैं और विजय के प्रशंसकों के लिए यह एक भावनात्मक अनुभव बन सकती है।
वहीं दूसरी तरफ कमजोर स्क्रीनप्ले, जरूरत से ज्यादा हीरोइज्म और कई मुद्दों को एक साथ जोड़ने की कोशिश फिल्म की कमजोर कड़ी बनती है। कई दृश्य वास्तविकता से दूर और ज्यादा नाटकीय लगते हैं।
कुल मिलाकर 'जन नायगन' विजय के फैंस के लिए एक शानदार विदाई फिल्म साबित हो सकती है, जिसमें उनका स्टार पावर पूरी तरह नजर आता है। हालांकि मजबूत कहानी की उम्मीद रखने वाले दर्शकों को कुछ निराशा हो सकती है। फिल्म विजय के फिल्मी सफर को सम्मान देने की कोशिश करती है, लेकिन कहानी के स्तर पर यह उतनी प्रभावशाली नहीं बन पाती।