विश्व स्ट्रोक दिवस पर डॉक्टरों ने स्ट्रोक का शीघ्र पता लगाने पर जोर दिया
विशाखापत्तनम: डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों ने गुरुवार को 'विश्व स्ट्रोक दिवस' मनाया। इस मौके पर एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें स्ट्रोक के लक्षणों को जल्दी पहचानने और तुरंत इलाज कराने के महत्व पर जोर दिया गया, ताकि विकलांगता को रोका जा सके और लोगों की जान बचाई जा सके।
एक छोटे नाटक के जरिए लोगों को स्ट्रोक, इसके शुरुआती संकेतों और तुरंत इलाज की जरूरत के बारे में जानकारी दी गई। नाटक में चेहरे का एक तरफ झुक जाना, एक हाथ में कमजोरी आना और बोलने में दिक्कत होना जैसे आम लक्षणों को दिखाया गया, और साथ ही यह भी बताया गया कि बिना देरी किए अस्पताल पहुंचना कितना जरूरी है।
इस कार्यक्रम में सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. के. सत्य राव, डॉ. टी. सुरेश, डॉ. के. सुरेश, डॉ. दलाई, डॉ. विनय भूषण, डॉ. पवन रुद्र, डॉ. अनिल देवरा और सेंटर हेड डॉ. अरुण कुमार शामिल हुए।
डॉक्टरों ने बताया कि स्ट्रोक मुख्य रूप से दो तरह के होते हैं: 'इस्केमिक स्ट्रोक' (जो मस्तिष्क को खून पहुंचाने वाली नस में रुकावट आने से होता है) और 'हेमोरेजिक स्ट्रोक' (जो मस्तिष्क के अंदर या आसपास किसी नस के फटने और खून बहने से होता है)। दोनों ही स्थितियों में लकवा मार सकता है, बोलने में दिक्कत हो सकती है, देखने में परेशानी आ सकती है और अन्य गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
विशेषज्ञों ने बताया कि इलाज के तरीकों में आए सुधारों से स्ट्रोक के मरीजों के ठीक होने की संभावना काफी बेहतर हुई है। लक्षण दिखने के 4.5 घंटे के भीतर, मरीज को 'थ्रोम्बोलिसिस' (खून का थक्का घोलने वाला इलाज) दिया जा सकता है। कुछ खास मामलों में, 'मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी' (थक्का निकालने की प्रक्रिया) भी की जा सकती है, जो मरीज के आखिरी बार ठीक होने के समय से 24 घंटे के भीतर तक संभव है।
इस साल के संदेश "हर मिनट मायने रखता है" (Every Minute Counts) पर जोर देते हुए डॉक्टरों ने बताया कि अगर इस्केमिक स्ट्रोक का इलाज न किया जाए, तो हर मिनट लगभग 19 लाख (1.9 मिलियन) ब्रेन सेल्स नष्ट हो सकते हैं।
उन्होंने लोगों से 'BE FAST' (बैलेंस, आइज, फेस, आर्म्स, स्पीच और टाइम) शब्द को याद रखने की अपील की, ताकि वे स्ट्रोक के शुरुआती संकेतों को पहचान सकें और तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता ले सकें।
चिकित्सा विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि समय रहते पहचान और इलाज से विकलांगता को काफी हद तक कम किया जा सकता है, मरीज के ठीक होने की संभावना बेहतर हो सकती है और जान बचाई जा सकती है। उन्होंने इस संदेश को दोहराया: "समय ही मस्तिष्क है" (Time is Brain)।