दिसपुर: सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनिमल राइट्स (CRAR), भारत ने 'कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन एंडेंजर्ड स्पीशीज़ ऑफ़ वाइल्ड फ़ौना एंड फ़्लोरा' (CITES) से सितंबर में असम से तमिलनाडु भेजे गए पाँच हाथियों के मामले की जाँच करने का आग्रह किया है। संगठन ने मालिकाना हक के रिकॉर्ड में गड़बड़ी का आरोप लगाया है और आशंका जताई है कि उपहार के नाम पर इन्हें अवैध रूप से पकड़ा और व्यावसायिक तौर पर हासिल किया गया हो सकता है।
जेनेवा में CITES सचिवालय को 12 अक्टूबर को लिखे एक पत्र में, CRAR के संस्थापक और वकील आलोक हिसारवाला गुप्ता ने तमिलनाडु के धार्मिक संस्थानों में दुर्गा, रूपसिंह, शिव, हीरालाल और बिजली को भेजे जाने के मामले की जाँच की माँग की। पत्र में भारत, नेपाल और म्यांमार के बीच सहयोग की भी बात कही गई ताकि हाथियों की घरेलू माँग और सीमा-पार तस्करी नेटवर्क के बीच संभावित संबंधों की जाँच की जा सके।
पत्र में 'नॉर्थईस्ट नाउ' की उन रिपोर्टों का हवाला दिया गया है जो हाथियों के स्थानांतरण की खबरें कवर कर रहा है; इसे CITES से जाँच की माँग के लिए अपनी अर्जी का हिस्सा बनाया गया है। इसमें सुप्रीम कोर्ट की हाई-पावर्ड कमेटी के सामने हाथी विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं द्वारा रखी गई बातों का भी ज़िक्र किया गया है।
CRAR ने CITES से कहा है कि वह भारतीय अधिकारियों से जवाब माँगे, आगे और हाथियों को हासिल करने के प्रस्तावों की जाँच करे और अवैध रूप से पकड़ने व तस्करी की चिंताओं को दूर करने के लिए रोकथाम के उपाय सुझाए।
मालिकाना हक के रिकॉर्ड और मूल स्थान की जाँच
पत्र में पाँच में से दो हाथियों के दस्तावेज़ों में गड़बड़ी की ओर इशारा किया गया है। दुर्गा के जन्म का रिकॉर्ड फरवरी 2021 का है, जबकि उसका मालिकाना हक का प्रमाण पत्र अक्टूबर 2025 में जारी किया गया था। CRAR का कहना है कि उसकी माँ की पहचान, कानूनी कस्टडी और जन्म के रिकॉर्ड की जाँच ज़रूरी है।
पत्र में कहा गया है कि रूपसिंह का माइक्रोचिप नंबर जून 2019 की उन रिपोर्टों से जुड़ा है जिनमें उसे जंगल से अवैध रूप से पकड़े जाने का आरोप लगाया गया था। CRAR ने माँग की है कि इसकी पहचान का मिलान मूल वन रिकॉर्ड और माइक्रोचिप डेटा से किया जाए।
संगठन ने 'सूचना का अधिकार अधिनियम' (RTI) के तहत 'वाइल्डलाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया' (DNA प्रोफ़ाइलिंग के लिए अधिकृत संस्था) से मिले जवाबों का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि उनके पास हाथियों की DNA प्रोफ़ाइल नहीं है।
CRAR का कहना है कि इन प्रोफ़ाइलों के न होने से यह सवाल उठता है कि क्या इन जानवरों के कैद में पैदा होने के दावों की पुष्टि की गई थी। संगठन का तर्क है कि इस मुद्दे और दस्तावेज़ों से जुड़ी अन्य चिंताओं को देखते हुए एक स्वतंत्र जाँच की ज़रूरत है। हालांकि, DNA प्रोफ़ाइल न होने से यह साबित नहीं होता कि हाथियों में से किसी को जंगल से पकड़ा गया था।
CRAR समेत जानवरों की सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाले 150 संगठनों ने 1 अक्टूबर को एक संयुक्त पत्र में आरोप लगाया कि हाथियों की खरीद को तोहफ़े के तौर पर दिखाया जा रहा था। पत्र में हाल ही में जारी मालिकाना हक़ के सर्टिफ़िकेट, रूपसिंह के लिए रिन्यूअल में देरी और छह और हाथियों के ट्रांसफर को लेकर भी चिंता जताई गई।
CRAR ने कहा कि उसने 5 अक्टूबर को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री को अलग से पत्र लिखकर पूर्वोत्तर से हाथियों के ट्रांसफर पर रोक लगाने और स्वतंत्र जांच की मांग की थी।
खरीद के बड़े नेटवर्क पर सवाल
पत्र में 'कैप्टिव एलिफ़ेंट हेल्थकेयर एंड वेलफ़ेयर कमिटी' की फ़रवरी 2026 की बैठक में दर्ज नतीजों का ज़िक्र किया गया, जिसमें बताया गया था कि जांचे गए 2,075 सैंपल में से 40.5 प्रतिशत का स्रोत अज्ञात था।
CRAR ने माना कि इस आंकड़े से गैर-कानूनी रूप से पकड़े जाने की पुष्टि नहीं होती, लेकिन कहा कि इससे बंधक हाथियों के मूल स्रोत का पता लगाने में बड़ी कमियों का संकेत मिलता है।
इसने वाइल्डलाइफ़ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो के पूर्वी क्षेत्र द्वारा की गई जांच और कार्रवाई की समीक्षा की भी मांग की। पत्र के अनुसार, अगस्त 2024 में ब्यूरो ने पूर्वोत्तर से केरल तक हाथियों की कथित खरीद नेटवर्क और कमर्शियल ट्रांसफर के बारे में जानकारी मांगी थी।
हालांकि असम से तमिलनाडु तक हाथियों का ट्रांसफर देश के भीतर ही होता है, लेकिन CRAR ने चेतावनी दी कि हाथियों की मांग का असर भारत की सीमाओं के बाहर भी पड़ सकता है। पत्र में ज़िंदा एशियाई हाथियों के गैर-कानूनी व्यापार पर CITES की समीक्षा का हवाला देते हुए उन रास्तों का ज़िक्र किया गया जो भारत (पूर्वोत्तर राज्यों सहित) को नेपाल और म्यांमार से जोड़ते हैं।
इसमें तर्क दिया गया कि नई मांग से खरीद नेटवर्क को म्यांमार से हाथी लाने का प्रोत्साहन मिल सकता है और म्यांमार व नेपाल से होकर गुज़रने वाले रास्तों से सीमा-पार तस्करी को बढ़ावा मिल सकता है।
CRAR ने नेपाल के मामलों का हवाला दिया, क्षेत्रीय सहयोग की मांग की
पत्र में सीमा-पार हाथियों की आवाजाही को लेकर चिंताओं को समझाने के लिए नेपाल के दो मामलों का ज़िक्र किया गया।
2021 में, खबर थी कि आशाकली नाम के हाथी को भारत ले जाया जा रहा था; दावा किया गया था कि हाथी को किराए के समझौते के बाद वापस किया जा रहा था। हालांकि, नेपाल के वन्यजीव प्राधिकरण ने कहा कि परिवहन के लिए कोई आवेदन नहीं किया गया था। पत्र में कहा गया है कि 2022 में, एक भारतीय खरीदार को 'काजलकाली' बेचे जाने की घटना को पुलिस ने दो बार रोका था।
CRAR ने CITES से कहा है कि वह भारत, नेपाल और म्यांमार के बीच सहयोग को बढ़ावा दे ताकि हाथियों की पहचान, इन्वेंट्री, परमिट और ज़ब्ती से जुड़े रिकॉर्ड की तुलना की जा सके और बिचौलियों तथा तस्करी के रास्तों के बीच संभावित संबंधों की जांच की जा सके।
इसने सचिवालय से यह भी आग्रह किया है कि संबंधित देशों के निष्कर्षों और प्रतिक्रियाओं को CITES स्टैंडिंग कमेटी के सामने रखा जाए।
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