बिहार के 6 हजार गांवों से पलायन, रोजगार की कमी बड़ी वजह

Update: 2026-08-10 04:00 GMT

पटना। बिहार में रोजगार और उच्च शिक्षा के सीमित अवसरों के कारण बड़ी संख्या में लोग दूसरे राज्यों और विदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं। राज्य के करीब 40 हजार राजस्व ग्रामों में छह हजार ऐसे गांव चिन्हित किए गए हैं, जहां से सबसे अधिक पलायन होता है। श्रम संसाधन विभाग के आंकड़ों और सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षणों के अनुसार, रोजगार के अवसरों की कमी और बेहतर शिक्षा की तलाश पलायन के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

बिहार से होने वाला पलायन केवल अंतरराज्यीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़ी संख्या में लोग रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश में दूसरे देशों का भी रुख करते हैं। राज्य के एक दर्जन से अधिक जिलों से सबसे अधिक पलायन दर्ज किया जाता है। इनमें ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाला पलायन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां स्थानीय स्तर पर रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं होने के कारण युवा दूसरे राज्यों का रुख करते हैं।

रोजगार की तलाश में गांव छोड़ रहे युवा

बिहार से पलायन करने वालों में बड़ी संख्या कामकाजी युवाओं की है। स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं होने के कारण लोग दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों की ओर जाते हैं। निर्माण क्षेत्र, फैक्ट्री, होटल, परिवहन, कृषि और अन्य असंगठित क्षेत्रों में काम की तलाश में बड़ी संख्या में श्रमिक राज्य से बाहर जाते हैं।

कई परिवारों के लिए दूसरे राज्यों में जाकर काम करना उनकी आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है। स्थानीय स्तर पर नियमित और बेहतर वेतन वाली नौकरियों के विकल्प सीमित होने के कारण युवाओं को अपने गांव और परिवार से दूर जाना पड़ता है। इससे कई परिवारों की आर्थिक स्थिति तो मजबूत होती है, लेकिन लंबे समय तक पलायन सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर भी असर डालता है।

उच्च शिक्षा भी पलायन की बड़ी वजह

रोजगार के साथ उच्च शिक्षा भी बिहार से बाहर जाने का एक प्रमुख कारण है। राज्य के कई जिलों में उच्च शिक्षा के सीमित विकल्पों के कारण विद्यार्थी स्नातक के बाद आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे शहरों का रुख करते हैं। बेहतर संस्थानों, तकनीकी शिक्षा और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की तलाश में बड़ी संख्या में विद्यार्थी पटना के अलावा दिल्ली, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद और अन्य शहरों की ओर जाते हैं।

शिक्षा के लिए बाहर जाने वाले कई युवा पढ़ाई पूरी करने के बाद वहीं नौकरी भी तलाश लेते हैं। इस तरह शिक्षा से शुरू हुआ पलायन रोजगार के कारण स्थायी रूप ले सकता है। यही वजह है कि राज्य में उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों का विस्तार पलायन को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

बाढ़ और सूखा भी बढ़ाते हैं पलायन

बिहार में प्राकृतिक आपदाएं भी पलायन की समस्या को बढ़ाती हैं। खासकर बाढ़ प्रभावित इलाकों में हर वर्ष बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका प्रभावित होती है। खेतों में पानी भरने, फसलों को नुकसान होने और कामकाज ठप पड़ने के कारण ग्रामीण परिवारों के सामने आय का संकट खड़ा हो जाता है।

इसी तरह सूखे की स्थिति में कृषि पर निर्भर परिवारों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं। जब स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के साधन कम हो जाते हैं, तो परिवारों के सदस्य दूसरे राज्यों में काम की तलाश में जाने को मजबूर होते हैं। इस तरह प्राकृतिक आपदाएं भी बिहार में अंतरराज्यीय पलायन का एक महत्वपूर्ण कारण बनती हैं।

एक दर्जन से अधिक जिलों से सबसे ज्यादा पलायन

श्रम संसाधन विभाग के आंकड़ों और सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षणों के अनुसार, राज्य के एक दर्जन से अधिक जिलों से सबसे अधिक पलायन दर्ज किया जाता है। इन जिलों में बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में राज्य से बाहर जाते हैं।

पलायन का स्वरूप हर जिले में अलग हो सकता है। कहीं कृषि पर निर्भरता और प्राकृतिक आपदाएं बड़ी वजह हैं, तो कहीं स्थानीय रोजगार के सीमित अवसर युवाओं को बाहर जाने के लिए प्रेरित करते हैं। कुछ क्षेत्रों से कुशल और अर्धकुशल श्रमिकों का पलायन भी बड़ी संख्या में होता है।

सरकार का उद्योग और निवेश पर जोर

पलायन की समस्या को कम करने के लिए राज्य सरकार उद्योगों के विकास और निवेश को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। सरकार का प्रयास है कि राज्य में नए उद्योग स्थापित हों और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा किए जाएं।

इसी क्रम में नवंबर तक पांच लाख करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य रखा गया है। सरकार को उम्मीद है कि बड़े पैमाने पर निवेश आने से औद्योगिक गतिविधियों को गति मिलेगी और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। यदि राज्य में युवाओं को उनके घर के आसपास बेहतर रोजगार उपलब्ध होता है तो दूसरे राज्यों की ओर जाने वाले श्रमिकों और युवाओं की संख्या में कमी लाई जा सकती है।

निवेश से रोजगार बढ़ने की उम्मीद

बिहार में उद्योगों के विस्तार और नए निवेश से रोजगार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अवसर पैदा होने की उम्मीद है। नए उद्योगों के साथ परिवहन, निर्माण, सेवा, लॉजिस्टिक्स और अन्य क्षेत्रों में भी काम के अवसर बढ़ सकते हैं।

सरकार के सामने हालांकि चुनौती यह है कि निवेश को केवल बड़े शहरों तक सीमित न रखते हुए उन क्षेत्रों तक भी पहुंचाया जाए, जहां से सबसे ज्यादा पलायन होता है। यदि ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में उद्योग तथा रोजगार के अवसर विकसित किए जाते हैं तो पलायन की समस्या पर अधिक प्रभावी तरीके से नियंत्रण पाया जा सकता है।

बिहार में पलायन लंबे समय से सामाजिक और आर्थिक चुनौती बना हुआ है। राज्य के करीब 40 हजार राजस्व ग्रामों में छह हजार गांवों से सर्वाधिक पलायन होना इस समस्या की व्यापकता को दर्शाता है। रोजगार और उच्च शिक्षा की कमी के साथ बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी लोगों को घर छोड़ने के लिए मजबूर करती हैं।

ऐसे में राज्य सरकार का पांच लाख करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब देखना होगा कि प्रस्तावित निवेश जमीन पर कितनी तेजी से उतरता है और उससे स्थानीय स्तर पर कितने रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। यदि उद्योगों का विस्तार, उच्च शिक्षा के अवसर और स्थानीय रोजगार एक साथ बढ़ते हैं, तो बिहार से होने वाले बड़े पैमाने के अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय पलायन को कम करने की दिशा में ठोस बदलाव संभव हो सकता है।

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