833 किलो गांजा जब्ती मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सभी आरोपी बरी

DRI की जांच पर उठाए सवाल

Update: 2026-07-07 08:20 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 833.271 किलोग्राम गांजा जब्ती से जुड़े बहुचर्चित मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने मामले में दोषी ठहराए गए सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने जांच प्रक्रिया में गंभीर खामियां पाए जाने पर राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने आरोपियों की ओर से दायर अपीलों पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।
मामले के रिकॉर्ड के अनुसार, 3 अक्टूबर 2021 को डीआरआई के एक खुफिया अधिकारी को सूचना मिली थी कि आंध्र प्रदेश से उत्तर प्रदेश के मथुरा की ओर जा रहे एक ट्रक में बड़ी मात्रा में गांजा छिपाकर ले जाया जा रहा है। सूचना में बताया गया था कि ट्रक क्रमांक एपी-39-टीपी-9706 के साथ एक महिंद्रा एक्सयूवी वाहन भी चल रहा है और यह खेप गरियाबंद जिले के तुरेंगा वन जांच चौकी से होकर गुजरने वाली है। सूचना के आधार पर डीआरआई की टीम ने इलाके में घेराबंदी की। दोपहर करीब 1:30 बजे संदिग्ध ट्रक को रोककर जांच की गई। ट्रक चालक ने अपना नाम बंदारी चंद्रशेखर बताया, जबकि साथ मौजूद व्यक्ति ने अपना नाम भूपेंद्र सिंह बताया। पूछताछ के दौरान ट्रक में मुरमुरे की बोरियों के नीचे गांजा छिपाकर रखने की बात सामने आई।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि मौके पर आवश्यक कानूनी कार्रवाई करने के बजाय ट्रक को करीब 150 किलोमीटर दूर डीआरआई कार्यालय रायपुर ले जाया गया। अदालत ने कहा कि इस दौरान ट्रक के साथ चल रही महिंद्रा एक्सयूवी के चालक और अन्य लोग मौके से फरार हो गए। बाद में डीआरआई कार्यालय में ट्रक की जांच के दौरान उसमें से 833.271 किलोग्राम गांजा बरामद किया गया। जांच एजेंसी ने इस मामले में डोरीलाल, चंद्रवीर उर्फ पीटू, अमित कुमार, भूपेंद्र सिंह और तुम्माला वेंकटेश्वर राव को आरोपी बनाया था।
मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को दोषी मानते हुए 15-15 वर्ष के कठोर कारावास और 1.50 लाख रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई थी। इस फैसले को आरोपियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अपील पर सुनवाई करते हुए पाया कि जांच के दौरान कई गंभीर प्रक्रियात्मक त्रुटियां हुईं। अदालत ने विशेष रूप से इस बात को गंभीर माना कि मुख्य आरोपी बंदारी चंद्रशेखर उर्फ पीटू डीआरआई कार्यालय से ही फरार हो गया था।
अदालत ने इसे जांच एजेंसी की बड़ी लापरवाही बताया और डीआरआई महानिदेशक, नई दिल्ली को पूरे मामले की विभागीय जांच कराने के निर्देश दिए। साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय कर उनके खिलाफ उचित कार्रवाई करने को कहा गया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि एनडीपीएस अधिनियम से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन करना अनिवार्य है। जांच में किसी भी तरह की लापरवाही आरोपियों के अधिकारों को प्रभावित करती है और इससे आपराधिक न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है। अदालत ने कहा कि भविष्य में ऐसी गंभीर चूक स्वीकार नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट ने आदेश की प्रति डीआरआई महानिदेशक को व्यक्तिगत अवलोकन और आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजने के निर्देश भी दिए हैं।
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