हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: भर्ती के बाद नहीं बदले जा सकते नियम, शिक्षकों की बर्खास्तगी रद्द

छग

Update: 2026-07-08 15:04 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दृष्टिबाधित शिक्षकों के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए शिक्षा विभाग की ओर से की गई सेवा समाप्ति की कार्रवाई को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि भर्ती प्रक्रिया पूरी होने और कर्मचारी के सेवा में आने के बाद सरकार किसी प्रशासनिक कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर नियुक्ति के नियमों को बदलकर कर्मचारी को नौकरी से नहीं हटा सकती। जस्टिस एनके चंद्रवंशी की एकलपीठ ने पीटीआई (शारीरिक शिक्षा शिक्षक) के पद पर कार्यरत दो दृष्टिबाधित शिक्षकों के मामले में सुनवाई करते हुए सरकार के फैसले को मनमाना बताया। कोर्ट ने सेवा समाप्ति के आदेश और कारण बताओ नोटिस को निरस्त कर दिया है।
मामला वर्ष 2019 में जारी शिक्षक भर्ती विज्ञापन से जुड़ा है। संचालनालय लोक शिक्षण रायपुर ने 9 मार्च 2019 को व्याख्याता, शिक्षक और सहायक शिक्षक पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। इस भर्ती में दिव्यांगजन अधिकार कानून के तहत आरक्षण का प्रावधान किया गया था, लेकिन विज्ञापन में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि किस श्रेणी के दिव्यांग अभ्यर्थी किसी विशेष पद के लिए अयोग्य होंगे। इसी भर्ती प्रक्रिया में 40 प्रतिशत दृष्टिबाधित शिव शंकर साहू और नील कुमारी ने शिक्षक (शारीरिक शिक्षा) पद के लिए आवेदन किया था। दोनों अभ्यर्थियों ने चयन प्रक्रिया पूरी की और दस्तावेज सत्यापन के बाद 24 अगस्त 2021 को उनकी नियुक्ति कर दी गई। नियुक्ति के बाद दोनों शिक्षक नियमित रूप से अपनी सेवाएं दे रहे थे।
करीब डेढ़ साल बाद शिक्षा विभाग ने दोनों शिक्षकों की नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए कार्रवाई शुरू की। 19 जनवरी 2023 को संयुक्त संचालक शिक्षा, बिलासपुर ने दोनों को कारण बताओ नोटिस जारी किया। विभाग ने एक प्रशासनिक कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पीटीआई शिक्षक पद के लिए केवल एक हाथ से प्रभावित और कम सुनने वाले दिव्यांग अभ्यर्थी ही पात्र हैं। इसी आधार पर शिव शंकर साहू को सेवा समाप्ति का नोटिस जारी किया गया, जबकि नील कुमारी की सेवाएं 6 फरवरी 2023 को समाप्त कर दी गईं। दोनों शिक्षकों ने विभाग की इस कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी और कहा कि भर्ती विज्ञापन में ऐसी कोई शर्त नहीं थी, जिसके आधार पर उन्हें अयोग्य माना जा सके।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के प्रावधानों का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समान अवसर प्रदान करता है और दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करता है। हाईकोर्ट ने कहा कि सामान्य प्रशासन विभाग के वर्ष 2014 के निर्देशों के अनुसार सरकार दिव्यांगों के अवसरों को बढ़ा सकती है, लेकिन पहले से उपलब्ध अवसरों को सीमित नहीं कर सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी दिव्यांगता से जुड़ी कोई जानकारी छिपाई नहीं थी, इसलिए विभाग अपनी गलती का जिम्मेदार कर्मचारियों को नहीं ठहरा सकता।
कोर्ट ने शिव शंकर साहू के खिलाफ जारी कारण बताओ नोटिस को रद्द कर दिया। वहीं नील कुमारी की सेवा समाप्ति का आदेश भी निरस्त कर दिया गया। हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग को निर्देश दिया है कि आदेश मिलने के 30 दिनों के भीतर नील कुमारी को पुनः सेवा में लिया जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने उन्हें बर्खास्तगी की तारीख से लेकर बहाली तक का पूरा पिछला वेतन और सेवा अवधि का वरिष्ठता लाभ देने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट के इस फैसले को दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों और समान अवसर के सिद्धांत की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस आदेश से सरकारी नियुक्तियों में पारदर्शिता और भर्ती नियमों की स्थिरता को लेकर भी बड़ा संदेश गया है।
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