छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, जब्त मवेशी आरोपी या मालिक को नहीं सौंपे जाएंगे
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Raipur. रायपुर। मवेशियों की तस्करी और उन्हें कत्लखानों तक ले जाने से जुड़े मामलों में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पुलिस द्वारा जब्त किए गए कृषि उपयोगी पशुओं को मुकदमे की सुनवाई पूरी होने तक आरोपी, वाहन चालक या कथित मालिक को सुपुर्दनामे पर नहीं दिया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मवेशियों को केवल पंजीकृत गौशाला, गोसदन या गोरक्षण संस्थान की अभिरक्षा में ही रखा जाएगा। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि पशु तस्करी के मामलों में जब्त मवेशियों को आरोपियों को वापस सौंपना कानून की मूल भावना के खिलाफ होगा। अदालत ने कहा कि यदि आरोपी या कथित मालिकों को ही जब्त पशु सुपुर्द कर दिए जाते हैं।
छत्तीसगढ़ कृषक पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004 का उद्देश्य कमजोर हो जाएगा। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह अधिनियम कृषि उपयोगी पशुओं की सुरक्षा और संरक्षण के लिए बनाया गया विशेष कानून है। इसलिए इसके प्रावधानों का पालन करना जरूरी है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में सामान्य आपराधिक प्रक्रिया के प्रावधानों की अपेक्षा विशेष कानून के नियम प्रभावी होंगे। यह मामला जशपुर जिले के मनोरा पुलिस चौकी क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। पुलिस ने एक ट्रक क्रमांक एचआर-55-क्यू-5980 को रोककर जांच की थी। जांच के दौरान ट्रक में बड़ी संख्या में मवेशी पाए गए थे। पुलिस ने ट्रक में लदे 23 नर और 5 मादा भैंसों को जब्त किया था।
पुलिस जांच में सामने आया था कि इन मवेशियों को छत्तीसगढ़ से झारखंड के कत्लखाने ले जाया जा रहा था। इसके बाद पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए मवेशियों को अपने कब्जे में लिया था। इस मामले में झारखंड के गुमला निवासी मो. वसीम कुरैशी ने खुद को मवेशियों का मालिक बताते हुए अदालत से मांग की थी कि जब्त पशुओं को सुपुर्दनामे पर उन्हें सौंप दिया जाए। हालांकि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) जशपुर ने उनकी मांग को खारिज कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सेशन कोर्ट में अपील की, लेकिन वहां भी निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर निचली अदालतों के फैसले को चुनौती दी थी।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने इस मामले में पहले दिए गए एक निर्णय पर पुनर्विचार की जरूरत महसूस की। इसके बाद पूरे मामले को निर्णय के लिए डिवीजन बेंच के पास भेजा गया। डिवीजन बेंच ने सभी कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ कृषक पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004 की धारा 7 और 18 में स्पष्ट प्रावधान है कि जब्त किए गए कृषि उपयोगी पशुओं को मुकदमे के अंतिम निर्णय तक पंजीकृत गौशालाओं, गोसदनों या गोरक्षण संस्थानों की अभिरक्षा में रखा जाएगा। अदालत ने कहा कि अधिनियम की व्यवस्था का उद्देश्य पशुओं को सुरक्षित रखना है।
यदि जब्त पशुओं को उन्हीं लोगों को वापस कर दिया जाता है जिन पर तस्करी के आरोप हैं, तो पशुओं की सुरक्षा और कानून का उद्देश्य दोनों प्रभावित होंगे। डिवीजन बेंच ने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ कृषक पशु परिरक्षण अधिनियम एक विशेष कानून है। ऐसे मामलों में सामान्य कानूनी प्रावधानों के आधार पर आरोपियों, वाहन चालकों या कथित मालिकों को पशुओं की सुपुर्दगी नहीं दी जा सकती। मजिस्ट्रेट को भी विशेष कानून के प्रावधानों का पालन करना होगा। अदालत ने अपने आदेश में साफ किया कि मुकदमे की प्रक्रिया पूरी होने तक जब्त मवेशियों की जिम्मेदारी पंजीकृत संस्थाओं की होगी। इससे पशुओं की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और पशु तस्करी जैसे मामलों में कानून का प्रभावी पालन हो सकेगा। हाईकोर्ट के इस फैसले को पशु संरक्षण और तस्करी रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। फैसले के बाद अब राज्य में पशु तस्करी से जुड़े मामलों में जब्त मवेशियों को लेकर अदालतों में चल रही प्रक्रियाओं पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा।