Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जशपुर जिले से जुड़े करीब 22 साल पुराने एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। नाबालिग से दुष्कर्म की घटना को पंचायत के जरिए दबाने और आरोपियों को कानूनी कार्रवाई से बचाने के आरोप में दोषी ठहराए गए अंजुलुस खलखो को हाईकोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ पर्याप्त और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई तीन साल के सश्रम कारावास और एक हजार रुपये जुर्माने की सजा निरस्त कर दी। अदालत ने आरोपी की अपील स्वीकार कर ली।
2004 में सामने आया था नाबालिग से दुष्कर्म का मामला
जानकारी के अनुसार, यह मामला जनवरी 2004 का है। जशपुर जिले में उस समय 13 वर्षीय किशोरी के साथ दुष्कर्म की घटना सामने आई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना के बाद गांव में पंचायत बुलाई गई थी। आरोप था कि पंचायत में पीड़िता के परिवार पर मामले में समझौता करने के लिए दबाव बनाया गया। आरोप यह भी था कि घटना को पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंचने से रोकने का प्रयास किया गया। इसी मामले में अंजुलुस खलखो की भूमिका को लेकर सवाल उठे थे। अभियोजन ने आरोप लगाया था कि खलखो ने घटना के बाद आरोपियों को कानूनी कार्रवाई से बचाने के उद्देश्य से मामले को दबाने में भूमिका निभाई।
पंचायत के जरिए मामला दबाने का लगा था आरोप
मामले की जांच के दौरान अंजुलुस खलखो के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 201 के तहत कार्रवाई की गई थी। यह धारा अपराध के साक्ष्य मिटाने या किसी अपराधी को कानूनी सजा से बचाने के उद्देश्य से जानकारी छिपाने जैसे कृत्यों से संबंधित है। अभियोजन का आरोप था कि आरोपी ने पंचायत के माध्यम से दुष्कर्म के मामले को दबाने में भूमिका निभाई थी। हालांकि, इन आरोपों को साबित करने के लिए अदालत में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक था।
2005 में निचली अदालत ने सुनाई थी तीन साल की सजा
मामले की सुनवाई अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जशपुर की अदालत में हुई थी। 19 अप्रैल 2005 को निचली अदालत ने अंजुलुस खलखो को भारतीय दंड संहिता की धारा 201 के तहत दोषी करार दिया था। अदालत ने आरोपी को तीन वर्ष के सश्रम कारावास और एक हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई थी। इस फैसले से असंतुष्ट अंजुलुस खलखो ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की। अपील के माध्यम से उसने निचली अदालत के दोषसिद्धि और सजा संबंधी फैसले को चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों की जांच की
हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ के समक्ष हुई। अदालत ने निचली अदालत के फैसले और अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों का परीक्षण किया। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 201 के अंतर्गत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। अदालत ने माना कि आपराधिक मामले में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए आरोपों को विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर साबित करना जरूरी है।
संदेह का लाभ देकर आरोपी को किया बरी
हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों को दोषसिद्धि बरकरार रखने के लिए अपर्याप्त पाया। इसके बाद जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने अंजुलुस खलखो को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का फैसला सुनाया। अदालत ने 19 अप्रैल 2005 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जशपुर द्वारा सुनाए गए दोषसिद्धि और सजा संबंधी निर्णय को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही आरोपी की आपराधिक अपील स्वीकार कर ली गई। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद तीन वर्ष के सश्रम कारावास और एक हजार रुपये जुर्माने की सजा समाप्त हो गई।
21 साल पुराने फैसले के खिलाफ अपील में मिली राहत
निचली अदालत द्वारा वर्ष 2005 में सजा सुनाए जाने के करीब 21 साल बाद आरोपी को हाईकोर्ट से राहत मिली है। इस मामले में हाईकोर्ट का निर्णय आपराधिक न्याय प्रणाली में साक्ष्यों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है। किसी व्यक्ति पर गंभीर आरोप होने के बावजूद अदालत में अपराध को कानूनी मानकों के अनुसार साबित करना आवश्यक होता है। हालांकि, यह फैसला केवल अंजुलुस खलखो के खिलाफ धारा 201 के आरोप से संबंधित है। इसे मूल दुष्कर्म की घटना या अन्य व्यक्तियों की आपराधिक जिम्मेदारी पर अंतिम निर्णय नहीं माना जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने स्पष्ट साक्ष्यों के अभाव में दोषसिद्धि को बरकरार रखना उचित नहीं माना और आरोपी को बरी कर दिया।