14 साल की नाबालिग को 28 सप्ताह से अधिक गर्भ का सुरक्षित चिकित्सकीय समापन कराने की अनुमति

छग

Update: 2026-07-06 18:26 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुष्कर्म की शिकार 14 वर्ष 6 माह की नाबालिग को 28 सप्ताह से अधिक अवधि के गर्भ का चिकित्सकीय समापन (एबॉर्शन) कराने की अनुमति प्रदान की है। यह आदेश जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने पारित किया। कोर्ट ने राजनांदगांव के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) को एक सप्ताह के भीतर सुरक्षित प्रक्रिया के तहत गर्भपात कराने और दो सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
मामला राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव थाना क्षेत्र से संबंधित है। याचिका के अनुसार, दिसंबर 2025 में एक आरोपी ने नाबालिग को बहला-फुसलाकर उसके साथ दुष्कर्म किया था। आरोपी द्वारा दी गई धमकियों के कारण पीड़िता ने यह घटना लंबे समय तक अपने परिजनों को नहीं बताई। बाद में जून 2026 में जब उसे पेट दर्द की शिकायत हुई, तो अस्पताल में जांच और सोनोग्राफी के दौरान उसके गर्भवती होने का पता चला। इसके बाद पीड़िता के पिता की शिकायत पर डोंगरगांव पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पीड़िता की ओर से अधिवक्ता रोहिशेक वर्मा के माध्यम से हाई कोर्ट में गर्भपात की अनुमति के लिए याचिका दायर की गई।
कोर्ट के निर्देश पर राजनांदगांव जिला अस्पताल में मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया। मेडिकल बोर्ड ने 1 जुलाई 2026 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें बताया गया कि पीड़िता का गर्भ 28 सप्ताह 5 दिन का है। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया कि गर्भ की उन्नत अवस्था और नाबालिग की कम उम्र को देखते हुए गर्भपात प्रक्रिया अत्यंत जोखिमपूर्ण हो सकती है। इसमें अत्यधिक रक्तस्राव और संक्रमण का खतरा भी बताया गया। मेडिकल विशेषज्ञों ने यह भी उल्लेख किया कि गर्भ को जारी रखना भी पीड़िता के लिए गंभीर मानसिक और शारीरिक पीड़ा का कारण बन सकता है। इस स्थिति में दोनों विकल्पों में जोखिम मौजूद होने के कारण मामला न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी महिला या नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भ को जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह उसके मौलिक अधिकारों और गरिमा के खिलाफ होगा। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, स्वतंत्रता और शारीरिक स्वायत्तता का अधिकार प्राप्त है। इसमें प्रजनन संबंधी निर्णय भी शामिल हैं।
हाई कोर्ट ने राजनांदगांव के सीएमएचओ को निर्देश दिया कि वे पीड़िता के पिता से तत्काल संपर्क कर आवश्यक प्रशासनिक सहयोग उपलब्ध कराएं। साथ ही गर्भपात की पूरी प्रक्रिया एक सप्ताह के भीतर किसी सरकारी अस्पताल में कराई जाए, जहां पूर्ण चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध हो। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि यह प्रक्रिया दो महिला स्त्री रोग विशेषज्ञों और एक सर्जन की विशेष टीम की निगरानी में की जाए, ताकि सुरक्षा और चिकित्सकीय मानकों का पूरा पालन सुनिश्चित हो सके। यह मामला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और मानवीय संवेदनशीलता को भी दर्शाता है। न्यायालय ने अपने आदेश में पीड़िता की सुरक्षा, स्वास्थ्य और गरिमा को सर्वोपरि रखते हुए त्वरित राहत सुनिश्चित की है।
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