प्रदेश में सरकारी अस्पतालों में सभी प्रकार की जीवन रक्षक दवाईयां व बच्चों को लगने वाली वैक्सीन नहीं, कई महीनों से वितरण बाधित
वित्त विभाग के आदेश की धज्जियां उड़ाता आईएएस रितेष कुमार अग्रवाल, मनमर्जी से कर रहा काम
सीजीएमएससी के 2022-23 के टेंडर रेट कांटेक्ट 18 माह के लिए जारी हुआ था। एमडी को 6 माह का टाईम आगे बढ़ाने का पावर है। लेकिन टेंडर वैलिड नहीं हुआ और आरसी भी नहीं हुई। नियम अनुसार शासन के आदेश के पालन हेतु विशेष परिस्थितियों में रेट कांटेक्ट को बढ़ाने हेतु एमडी द्वारा शासन को प्रस्ताव स्वास्थ्य सचिव को भेजा गया था। स्वास्थ्य सचिव के अनुमोदन के उपरांत स्वास्थ्य मंत्री, वित्त सचिव और वित्तमंत्री के परीक्षण के उपरांत 6 माह का अधिक समय 24.07.2026 को शासन ने आदेश दिया था उसके अनुसार पुराने ही टेंडर में आयुर्वेदित दवाओं के टेंडर को निष्पादन होना था। लेकिन एमडी शासन के आदेश से बड़ा हो गया और अभी तक आदेश का पालन नहीं करते हुए नए टेंडर और नए रेट कार्ड के जुगाड़ में जिससे शासन को करोड़ों रुपए का नुकसान होने का अनुमान है। खबर के अनुसार नए दवाई निर्माता के दबाव में बड़े कमीशन होने के कारण अपात्र कंपनियां भी मनमाने रेट में टेंडर भरने के चक्कर में। शासन के 6 माह के बढ़ोत्तरी आदेश का पालन नहीं हो रहा है।
प्रदेश में अस्पतालों में भी अनियमित्ता और दवाईयां नदारद: छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में छोटे बच्चों को दी जाने वाली रोटावायरस वैक्सीन की कमी अब चिंता का विषय बन गई है। जिले के सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में यह जरूरी वैक्सीन पिछले दो से तीन महीनों से उपलब्ध नहीं है। राज्य स्तर से आपूर्ति रुकने के कारण स्वास्थ्य केंद्रों में स्टॉक खत्म पड़ा है, जिससे बच्चों के नियमित टीकाकरण अभियान पर असर पड़ रहा है। रोटावायरस वैक्सीन छोटे बच्चों को गंभीर दस्त, उल्टी और पेट के संक्रमण से बचाने के लिए दी जाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह वैक्सीन शिशुओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि रोटावायरस संक्रमण के कारण बच्चों में डिहाइड्रेशन की स्थिति बन सकती है और कई बार उन्हें अस्पताल में भर्ती तक करना पड़ सकता है।
जिला स्वास्थ्य अधिकारी ने मानी वैक्सीन की कमी पिथौरा स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, क्षेत्र में सालभर में लगभग 3700 डोज रोटावायरस ड्रॉप की जरूरत होती है। वहीं पूरे महासमुंद जिले में हर साल करीब 15 हजार डोज की आवश्यकता बताई जा रही है। जिला स्वास्थ्य अधिकारी नागेश्वर राव ने बताया कि जिले में पिछले दो महीनों से रोटावायरस वैक्सीन का स्टॉक उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि यह वैक्सीन राज्य स्तर से सप्लाई की जाती है और फिलहाल आपूर्ति नहीं होने के कारण स्वास्थ्य केंद्रों में इसकी उपलब्धता प्रभावित हुई है।
ड्रॉप्स के रूप में दी जाती है वैक्सीन रोटावायरस वैक्सीन शिशुओं को डेढ़ माह, दो माह और साढ़े तीन माह की उम्र में तीन बार ड्रॉप्स के रूप में दी जाती है। यह इंजेक्शन नहीं बल्कि मुंह से पिलाई जाने वाली वैक्सीन है। यह वैक्सीन बच्चों को गंभीर डायरिया और उल्टी से बचाने में मदद करती है। इसके साथ ही शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी यानी डिहाइड्रेशन को रोकने में अहम भूमिका निभाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, समय पर टीकाकरण होने से बच्चों में संक्रमण का खतरा कम होता है और अस्पताल में भर्ती होने की संभावना भी घट जाती है।
गरीब और ग्रामीण परिवारों पर ज्यादा असर वैक्सीन की कमी का सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ रहा है, जो सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर निर्भर हैं। जिन अभिभावकों को जानकारी है, वे निजी अस्पतालों और क्लीनिक में जाकर बच्चों को वैक्सीन लगवा रहे हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए निजी अस्पतालों में वैक्सीन लगवाना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में कई बच्चे समय पर टीकाकरण से वंचित रह सकते हैं। स्वास्थ्य जानकारों का कहना है कि छोटे बच्चों में रोटावायरस संक्रमण तेजी से फैल सकता है। यदि समय पर बचाव नहीं किया गया तो गंभीर दस्त और डिहाइड्रेशन जैसी समस्या बढ़ सकती है।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल जिले में हर साल करीब 15 हजार डोज की जरूरत होने के बावजूद कई महीनों तक स्टॉक उपलब्ध नहीं होना स्वास्थ्य विभाग की आपूर्ति व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। टीकाकरण कार्यक्रम की सफलता के लिए वैक्सीन की नियमित उपलब्धता बेहद जरूरी है। किसी भी महत्वपूर्ण वैक्सीन की आपूर्ति में लंबे समय तक रुकावट बच्चों के स्वास्थ्य पर सीधा असर डाल सकती है। जल्द आपूर्ति की मांग स्वास्थ्य विशेषज्ञों और लोगों ने मांग की है कि रोटावायरस वैक्सीन की आपूर्ति जल्द से जल्द सुनिश्चित की जाए, ताकि जिले के सभी पात्र बच्चों को समय पर टीका मिल सके। अभिभावकों से भी अपील की जा रही है कि वे बच्चों के टीकाकरण कार्यक्रम को नियमित रखें। यदि सरकारी केंद्र में वैक्सीन उपलब्ध नहीं है तो स्वास्थ्य विभाग से जानकारी लेकर आगे की व्यवस्था करें। रोटावायरस वैक्सीन की यह कमी सिर्फ एक टीके की अनुपलब्धता नहीं है, बल्कि छोटे बच्चों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है। समय रहते आपूर्ति व्यवस्था सुधारना जरूरी है, ताकि बच्चों को संक्रमण से बचाने की मुहिम प्रभावित न हो।
प्रदेश के सभी सरकारी अस्पतालों में लचर स्वास्थ्य व्यवस्था: दवाइयों की कमी, बुनियादी सुविधाओं की कमी और डॉक्टरों की लापरवाही के कारण मरीजों का बुरा हाल है। संसाधनों के आभाव और भ्रष्टाचार के चलते गरीब जनता को समय पर उचित इलाज नहीं मिल पा रहा है जिसके वजह से या तो उनका मर्ज बढ़ जाता है अकाल काल के गाल में समा जाते हैं। प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में साफ-सुथरे शौचालय, स्वच्छ पेयजल और दवाओं की भारी कमी आम बात हो गई है। टॉयलेट में गंदगी पसरी हुई होती है। यही हाल आपातकालीन वार्डों की भी है जहाँ मरीजों की भारी भीड़ और डॉक्टरों की कमी के कारण मरीजों को स्ट्रेचर या फर्श पर इलाज कराना पड़ता है।
पुरानी और खराब मशीनें : प्रदेश के अधिकतर बड़े सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज सालों पुरानी और जर्जर हो चुकी मशीनों के भरोसे चल रहा है। नई मशीने अगर खरीद भी लिए हैं तो उसे ऑपरेट करने कोई मिलता नहीं क्योकि योग्य ऑपरेटरों की कमी है। देखने में आ रहा है की संविदा कर्मचारियों व नर्सों के भरोसे बड़े बड़े सरकारी अस्पताल चल रहे हैं उसमे भी उनके वेतन में घोटाले और शोषण के मामले सामने आते रहते हैं, जिससे व्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है।
डॉक्टर जेनेरिक दवाई नहीं लिखते: प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल मेकाहारा में शासन द्वारा अति आवश्यक दवाइयों का टोटा है। धन्वंतरि मेडिकल स्टोर्स में भी अधिकतर दवाइयां नहीं मिलने की शिकायत मिलती है। अस्पतालों में लगभग कई दवाइयाँ सूची में है लेकिन मिलती मात्र कुछ ही दवाइयां है। डॉक्टर भी जेनेरिक दवाइयां नहीं लिखते ऐसी दवाई लिखते जो दवाइयां बाजार में ऊंचे दामों में खरीदने के लिए मरीज और उनके परिजन मजबूर होते हैं।
स्वास्थ्य विभाग की दुर्गति की वजह? : स्वास्थ्य अमले का फेल होने का प्रमुख कारण राजनेता और रसूखदार अधिकारियों के पार्टनरशिप में निजी अस्पताल चलाना है । इनके धौंस या रसूख की वजह से स्वास्थ्य विभाग का चुप रहना मज़बूरी हो सकती है लेकिन प्रश्न ये उठता है कि क्या स्वास्थ्य मंत्री भी इनके धौंस के आगे घुटने टेकने मजबूर हैं? यह असंभव है लेकिन हालत यही बयान कर रहे हैं। पूरे छत्तीसगढ़ में इन अधिकारियो के स्वामित्व वाले या पार्टनरशिप में अस्पताल चल रहे हैं। क्या यही वजह है जिसके कारण निजी अस्पताल वाले खुली लूट मचा रखे हैं। एक बार अस्पताल में घुसे यानी जिंदगी भर की कमाई इन अस्पताल मालिकों के जेब में। यह भी देखा गया है की निजी अस्पताल वाले डाक्टर वही दवाई लिखते हैं जो उनके स्वामित्व वाले मेडिकल स्टोर में उपलब्ध रहते हैं। बाजार में जो इंजेक्शन 1500 की आती है। वही इंजेक्शन 2500 रूपये में इनके द्वारा संचालित मेडिकल स्टोर में मिलते हैं। मरीज की जान को खतरा बता कर बेतहाशा कमाई करने से ये पीछे नहीं रहते। सरकार का नाम खऱाब कर रहा स्वास्थ्य अमला प्रदेश सरकार का नाम खराब करने में स्वास्थ्य अमला कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखना चाहता मु यमंत्री की योजनाओं पर स्वास्थ्य अमला ने पतीला लगाया। सरकारी अस्पताल में मरीजों को जबरदस्ती इलाज के गफलत में रखकर निजी अस्पतालों के सुझाव दिए जाते हैं क्योकि शहर के कई निजी अस्पताल छुटभैय्या नेताओं और आईपीएस अधिकारियों के रिश्तेदारों के हैं। यही वजह है कि बड़े छुटभय्ये नेताओं की और बड़े अधिकारियों के अपने निजी अस्पतालों के होने से सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज सही ढंग से नहीं किया जाता। अस्पताल खुद बीमार सरकारी अस्पताल में मरीजों को किसी भी तरह का बहाना बताकर जैसे-तैसे उनको निजी अस्पतालों में भेजा जाता है।
जनता से रिश्ता ने सीजीएमएससी के अध्यक्ष दीपक मसके और एमडी रितेश अग्रवाल से संपर्क करने की कई बार कोशिश की ताकी प्रकरण में सच्चाई सामने आए। लेकिन दोनों ने फोन नहीं उठाया या कहें तो जवाब देने से बचते रहे।
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