दुर्ग: पंचतत्व में विलीन हुईं पद्म विभूषण तीजन बाई. छत्तीसगढ़ की लोक कला और पंडवानी गायन को वैश्विक पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन हो गया. वे 70 साल की थीं. उन्होंने शनिवार रात 3.15 बजे रायपुर एम्स में अंतिम सांस ली. वे पिछले कुछ समय से बीमार थीं.
पीएम ने जताया शोक
पीएम ने अपने शोक संदेश में लिखा, ''सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। उन्होंने छत्तीसगढ़ की इस लोक कला को अपनी भव्य प्रस्तुति से दुनियाभर में एक विशिष्ट पहचान दिलाई. उनका जाना कला एवं संस्कृति जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है. शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं.''
सीएम साय पहुंचे रायपुर एम्स
तीजन बाई के निधन की खबर मिलते ही सीएम विष्णु देव साय रायपुर एम्स पहुंचे. सीएम ने अपने शोक संदेश में कहा, ''छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की अमर गाथाकार, पद्म विभूषण से सम्मानित विश्वविख्यात पंडवानी कलाकार डॉ. तीजन बाई जी के निधन का समाचार अत्यंत दुखद है. उनका निधन न केवल लोककला जगत के लिए, बल्कि समूचे छत्तीसगढ़ तथा समस्त देश की सांस्कृतिक विरासत के लिए एक अपूरणीय क्षति है. अपने अद्वितीय गायन शैली, विलक्षण प्रतिभा और लोक परंपराओं के संरक्षण के माध्यम से उन्होंने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को विश्व पटल पर प्रतिष्ठित किया. उनका अतुलनीय योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा. प्रभु श्रीराम से प्रार्थना है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा शोकसंतप्त परिजनों, असंख्य प्रशंसकों और समस्त लोककला जगत को इस गहन दुःख को सहन करने की शक्ति एवं संबल प्रदान करें,''
पंडवानी लोकगाथा को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया
लोक कला और संस्कृति के क्षेत्र दिए गए उनके अमूल्य योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और बाद में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया. इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हुए.
विदेशों में लहराया पंडवानी का परचम
पंडवानी में दुशासन वध के प्रसंग पर तीजन बाई का प्रदर्शन दुनियाभर में लोकप्रिय हुआ. 1980 में तीजन बाई ने सांस्कृतिक राजदूत के रूप में इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, टर्की, माल्टा, साइप्रस, रोमानिया और मॉरीशस की यात्रा भी की.
तीजनबाई को मिले हैं कई पुरस्कार
तीजन बाई को साल 1988 में पद्मश्री सम्मान मिला. 1995 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. 2003 में कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से अलंकृत की गईं. 2007 में उन्हें नृत्य शिरोमणि से भी सम्मानित किया गया. 2017 में खैरागढ़ संगीत विवि से डी लिट की मानद उपाधि दी गई. साल 2019 में पद्म विभूषण से उन्हें सम्मानित किया गया. तीजनबाई को 4 डी लिट उपाधी मिले, साथ ही उन्हें जापान में फुकोका पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था.
तीजन बाई से जुड़ी बड़ी बातें
तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को दुर्ग जिले के पाटन विकासखंड के अटारी गांव में हुआ था. उनका जन्म लोकपर्व तीज के दिन हुआ था, इसलिए उनके माता-पिता ने उनका नाम तीजन रखा. उनकी मां का नाम सुखवती देवी और पिता का नाम हुनुकलाल पारधी था. वह अपने माता-पिता की वो पहली संतान थीं. तीजन बाई का बचपन अत्यंत गरीबी और अभावों में बीता. पशु-पक्षियों की आवाजें, मां के लोकगीत और पिता की बांसुरी ने उनके भीतर संगीत के प्रति गहरा लगाव पैदा किया.
एक दिन उन्होंने अपने नाना को पंडवानी गाते सुना और तभी इस लोककला को सीखने का संकल्प लिया. मात्र 9 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने चचेरे नाना बृजलाल पारधी से पंडवानी की शिक्षा शुरू कर दी. पारधी समाज की लड़की द्वारा सार्वजनिक रूप से पंडवानी गाना उस समय सामाजिक मान्यताओं के खिलाफ माना जाता था. इसके कारण उन्हें परिवार और समाज के विरोध का सामना करना पड़ा, यहां तक कि उन्हें घर से निकाल दिया गया। उनकी पहली और दूसरी शादी भी पंडवानी गायन के कारण प्रभावित हुई, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी.
13 वर्ष की आयु में उन्होंने चंदखुरी गांव के सतीचौरा चौक में अपना पहला सार्वजनिक मंचन किया. इसके बाद उनकी ख्याति आसपास के गांवों से निकलकर भिलाई, दुर्ग, रायपुर और भोपाल तक पहुंच गई. भोपाल के भारत भवन में प्रस्तुति के दौरान प्रसिद्ध रंगकर्मी उनकी प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री के सामने प्रस्तुति का अवसर दिलाया.
प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक ने भी उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए अपने धारावाहिक में उन्हें आमंत्रित किया. वर्ष 1986 में ने उन्हें नौकरी प्रदान की. तीजन बाई ने साक्षरता, महिला अधिकार और लोककला संरक्षण के लिए उल्लेखनीय कार्य किए. संघर्ष, समर्पण और अद्भुत प्रतिभा के बल पर तीजन बाई ने पंडवानी को विश्व मंच तक पहुंचाकर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया.