अहमदाबाद। भारत और पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस से पहले दोनों देशों में जेलों में बंद उन मछुआरों की रिहाई की मांग तेज हो गई है, जिन्होंने अपनी सजा पूरी कर ली है। गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और प्रभावित मछुआरों के परिवारों के एक समूह ने भारत और पाकिस्तान की सरकारों से अपील की है कि मानवीय आधार पर ऐसे सभी कैदियों को तत्काल रिहा किया जाए और उन्हें उनके परिवारों तक पहुंचाने की प्रक्रिया तेज की जाए।

पाकिस्तान 14 अगस्त और भारत 15 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है। इन राष्ट्रीय पर्वों से पहले मछुआरों के परिवारों ने दोनों देशों की सरकारों से मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की अपील की है। परिवारों का कहना है कि समुद्री सीमाओं के अनजाने में उल्लंघन के मामलों में गिरफ्तार किए गए मछुआरों को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ता है, जबकि कई लोग अपनी निर्धारित सजा भी पूरी कर चुके हैं।

परिवारों ने सुनाई दर्द की कहानी

अहमदाबाद में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रभावित परिवारों ने अपनी परेशानियां साझा कीं। इस दौरान जागृति सोलंकी ने भावुक अपील करते हुए सरकार से अपने जीजाजी की रिहाई की मांग की। उन्होंने कहा कि उनके जीजाजी पांच साल से अधिक समय से पाकिस्तान की जेल में बंद हैं और लंबे समय तक जेल में रहने के कारण उनकी मानसिक स्थिति लगातार खराब होती जा रही है।

जागृति सोलंकी ने सरकारों से हाथ जोड़कर अपील की कि उनके परिवार के सदस्य को जल्द रिहा किया जाए। उनका कहना है कि परिवार के लिए किसी अपने का वर्षों तक जेल में रहना बेहद पीड़ादायक है। खासकर तब, जब सजा पूरी होने के बाद भी रिहाई और स्वदेश वापसी की प्रक्रिया लंबी खिंच जाए।

परिवारों का कहना है कि जेल में बंद मछुआरों के पीछे उनके बच्चे, बुजुर्ग माता-पिता और अन्य परिजन वर्षों से अपने प्रियजनों की वापसी का इंतजार कर रहे हैं।

समुद्री सीमा के अनजाने उल्लंघन का मामला

भारत और पाकिस्तान के बीच समुद्री सीमा कई जगहों पर स्पष्ट रूप से चिन्हित करना मुश्किल है। गुजरात के तटीय इलाकों के कई मछुआरे मछली पकड़ने के दौरान अनजाने में समुद्री सीमा पार कर जाते हैं। इसके बाद उन्हें दूसरे देश की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाता है।

ऐसे मामलों में मछुआरों पर संबंधित देश के कानून के तहत कार्रवाई की जाती है और उन्हें जेल भेज दिया जाता है। परिवारों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि इनमें से कई मामले जानबूझकर सीमा पार करने के नहीं होते, बल्कि समुद्र में दिशा और सीमा का पता न चल पाने के कारण ऐसी स्थिति पैदा होती है।

मछुआरों की गिरफ्तारी के बाद उनके परिवारों के सामने सबसे बड़ी समस्या उनके बारे में सही जानकारी हासिल करने और कानूनी प्रक्रिया को समझने की होती है। सीमापार होने के कारण परिजनों के लिए अपने रिश्तेदारों तक पहुंचना भी आसान नहीं होता।

सजा पूरी होने के बाद भी इंतजार

NGOs और परिवारों की मुख्य मांग उन मछुआरों की रिहाई को लेकर है, जिन्होंने अदालत द्वारा सुनाई गई सजा पूरी कर ली है। परिवारों का कहना है कि ऐसे लोगों को जेल में बनाए रखना मानवीय दृष्टि से उचित नहीं है।

सजा पूरी होने के बाद आम तौर पर कैदियों की पहचान, दस्तावेजों की जांच और दोनों देशों के बीच समन्वय जैसी प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं। परिवारों का कहना है कि इन प्रक्रियाओं में होने वाली देरी का सीधा असर उन लोगों और उनके परिजनों पर पड़ता है, जो पहले ही वर्षों से अलगाव का दर्द झेल रहे हैं।

NGOs ने दोनों सरकारों से आग्रह किया है कि वे ऐसे मामलों की समीक्षा के लिए विशेष व्यवस्था करें और जिन मछुआरों की सजा पूरी हो चुकी है, उनकी स्वदेश वापसी की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जाए।

स्वतंत्रता दिवस पर मानवीय पहल की मांग

दोनों देशों के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर उठाई गई इस मांग का उद्देश्य सरकारों का ध्यान मानवीय मुद्दे की ओर आकर्षित करना है। परिवारों का कहना है कि स्वतंत्रता दिवस केवल राष्ट्रीय गौरव का अवसर नहीं है, बल्कि यह मानवीय मूल्यों और परिवारों की खुशियों को भी महत्व देने का समय है।

परिजनों ने उम्मीद जताई कि भारत और पाकिस्तान की सरकारें सद्भावना के तौर पर ऐसे कैदियों की सूची की समीक्षा करेंगी और सजा पूरी कर चुके मछुआरों की रिहाई की प्रक्रिया में तेजी लाएंगी।

सामाजिक संगठनों का भी कहना है कि दोनों देशों के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन मछुआरों और उनके परिवारों से जुड़े मानवीय मामलों को अलग दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।

परिवारों पर पड़ता है आर्थिक और मानसिक असर

मछुआरों के लंबे समय तक जेल में रहने का असर केवल कैदी तक सीमित नहीं रहता। उनके परिवारों को आर्थिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। मछली पकड़ने का काम करने वाले परिवारों में अक्सर घर की आय का बड़ा हिस्सा परिवार के मुख्य कमाने वाले सदस्य पर निर्भर होता है।

जब वह व्यक्ति वर्षों तक जेल में रहता है तो परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो सकती है। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और बुजुर्गों की देखभाल जैसी जिम्मेदारियां परिवार के दूसरे सदस्यों पर आ जाती हैं।

इसके अलावा, लंबे समय तक किसी प्रियजन की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिलना मानसिक तनाव को और बढ़ा देता है। कई परिवार वर्षों तक अपने रिश्तेदार की वापसी की उम्मीद में इंतजार करते रहते हैं।

दोनों देशों के बीच मानवीय सहयोग की जरूरत

भारत और पाकिस्तान के बीच मछुआरों की गिरफ्तारी और रिहाई का मुद्दा लंबे समय से चला आ रहा है। दोनों देशों की समुद्री सीमाओं के आसपास मछली पकड़ने वाले समुदाय इस समस्या से प्रभावित होते रहे हैं।

परिवारों और NGOs का मानना है कि दोनों देशों के बीच नियमित संवाद और बेहतर समन्वय से ऐसे मामलों के समाधान में तेजी लाई जा सकती है। विशेष रूप से सजा पूरी कर चुके मछुआरों के मामलों को प्राथमिकता देने से कई परिवारों को राहत मिल सकती है।

संगठनों ने सरकारों से यह भी आग्रह किया कि मछुआरों की पहचान और उनकी कानूनी स्थिति की जानकारी परिवारों तक जल्द पहुंचाई जाए, ताकि परिजन वर्षों तक अनिश्चितता में न रहें।

रिहाई की उम्मीद में परिवार

अहमदाबाद में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान परिवारों की अपील का केंद्र यही रहा कि जिन लोगों ने अपनी सजा पूरी कर ली है, उन्हें अब जेल में रखने के बजाय उनके परिवारों तक पहुंचाया जाए।

जागृति सोलंकी की भावुक अपील ने उन परिवारों की स्थिति को सामने रखा, जो वर्षों से अपने रिश्तेदारों की वापसी का इंतजार कर रहे हैं। परिवारों को उम्मीद है कि स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दोनों सरकारें मानवीय आधार पर सकारात्मक पहल करेंगी।

अब निगाहें इस बात पर हैं कि भारत और पाकिस्तान सरकारें सजा पूरी कर चुके मछुआरों के मामलों में क्या कदम उठाती हैं। परिवारों और NGOs का कहना है कि राजनीतिक परिस्थितियों से अलग हटकर मानवीय आधार पर की गई पहल कई परिवारों के लिए वर्षों बाद खुशी का कारण बन सकती है।

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