अगस्त के लिए जारी नेशनल ड्रग अलर्ट में देश भर में 220 दवा के सैंपल 'नॉट ऑफ़ स्टैंडर्ड क्वालिटी' (NSQ) यानी घटिया क्वालिटी के पाए गए। इनमें से 62 सैंपल हिमाचल की दवा बनाने वाली कंपनियों ने बनाए थे, जिससे राज्य के दवा-निर्माण हब में क्वालिटी कंट्रोल को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। ये सैंपल बद्दी, नालागढ़, बरोटीवाला, पोंटा साहिब, काला अंब, सोलन, कांगड़ा और ऊना में स्थित कंपनियों ने बनाए थे। चार से पांच कंपनियों की कई दवाएं फेल पाई गईं, और कुछ कंपनियों की तो दो से पांच दवाएं NSQ कैटेगरी में आईं।
इन कमियों में दवा के मुख्य तत्व (assay content) की मात्रा में कमी, घुलने की क्षमता (dissolution) और विवरण में अंतर जैसी समस्याएं शामिल हैं। हालांकि ऐसी कमियों से इलाज में विफलता हो, यह ज़रूरी नहीं है, लेकिन मेडिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि बेअसर दवाओं की वजह से डॉक्टर दवा की डोज़ बढ़ा सकते हैं, जिससे दवा के बुरे असर (adverse drug reactions) का खतरा बढ़ सकता है।
इससे भी गंभीर बात यह है कि कई इंजेक्शन में कण (particulate matter) पाए गए। सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन (CDSCO) ने इस कमी को मैन्युफैक्चरिंग की बहुत गंभीर खामी माना है। जिन इंजेक्शन में यह कमी पाई गई, उनमें गंभीर बैक्टीरियल इन्फेक्शन के लिए इस्तेमाल होने वाली 'अमिकैसिन सल्फेट' (Amikacin Sulphate), एसिड से जुड़ी समस्याओं के लिए 'राबेप्राज़ोल सोडियम' (Rabeprazole Sodium) और जटिल बैक्टीरियल इन्फेक्शन के लिए 'मेरोपेनेम' (Meropenem) शामिल हैं।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि इंजेक्शन वाली दवाओं में कण होने से शरीर में सूजन (inflammatory reactions) हो सकती है, स्थानीय टिश्यू को नुकसान पहुंच सकता है और गंभीर मामलों में खून की नसें ब्लॉक हो सकती हैं, इसलिए यह बात बहुत चिंताजनक है। राज्य के ड्रग्स कंट्रोलर डॉ. मनीष कपूर ने इन नतीजों की पुष्टि की और कहा कि प्रभावित बैच को तुरंत बाज़ार से वापस मंगा लिया जाएगा।
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