कांगड़ा में, एक समय शादियाँ 'गालियों' (मज़ाक-मस्ती भरे गीतों) के बिना अधूरी मानी जाती थीं। ये गीत महिलाएँ बरातियों के स्वागत में गाती थीं। आज, इनकी जगह तेज़ आवाज़ वाले डीजे ने ले ली है। इन दो दौरों के बीच, एक अनमोल मौखिक विरासत लगभग लुप्त होने की कगार पर पहुँच गई थी। 'संस्कार गीत' — जो जन्म, मुंडन, विवाह और जीवन के अन्य अहम पड़ावों से जुड़े होते हैं — कभी इस घाटी का जीता-जागता विश्वकोश हुआ करते थे। इनमें यहाँ के रीति-रिवाज़, हास्य, भावनाएँ और सामाजिक स्मृतियाँ समाई हुई थीं। अगर ये गीत आज पूरी तरह से खत्म नहीं हुए हैं, तो इसका श्रेय कुछ समर्पित विद्वानों को जाता है। धर्मशाला में रहने वालीं साहित्यकार चंद्ररेखा धडवाल और संगीत विशेषज्ञ जन्मजय गुलेरिया ने इस परंपरा को सहेजने का काम किया है। यह एक ऐसी परंपरा थी जो मुख्य रूप से दादियों-नानियों के ज़रिए आगे बढ़ती थी—ऐसी महिलाएँ जिनके पास ज्ञान का भंडार तो था, लेकिन वह शायद ही कभी लिखित रूप में दर्ज किया गया।
इन दोनों ने उन बातों पर ध्यान दिया, जिन्हें अक्सर लोग अनदेखा कर देते थे।
धर्मशाला के गवर्नमेंट कॉलेज में हिंदी विभाग की पूर्व अध्यक्ष रहीं चंद्ररेखा धडवाल, कांगड़ा की लोक विरासत को सहेजने में साहित्यिक गहराई और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का पुट लाती हैं। कविता, कथा-साहित्य, उपन्यास, निबंध, ग़ज़ल और लोक-साहित्य के क्षेत्र में चार दशकों से अधिक समय तक योगदान देने के कारण, उन्हें राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान मिली है, जिसमें प्रतिष्ठित अकादमी सम्मान भी शामिल हैं। उनकी रचनाएँ कांगड़ा की महिलाओं की आवाज़ों, अनुभवों और परंपराओं को एक स्थायी साहित्यिक रूप देती हैं। कई राज्य और राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित डॉ. गुलेरिया ने अपना जीवन हिमाचल की लोक संगीत परंपराओं को बचाने के लिए समर्पित कर दिया है। कई पीढ़ियों के विद्यार्थियों द्वारा बेहद सम्मान पाने वाले डॉ. गुलेरिया ने कई उभरते संगीतकारों का मार्गदर्शन किया है। इनमें से कई ने आगे चलकर फेलोशिप हासिल की और इस क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई। पारंपरिक संगीत की गहरी समझ होने के कारण, वे लोक गीतों को केवल शब्दों के समूह से कहीं बढ़कर देखते हैं; उनके अनुसार, गीत की धुन, लय, अवसर और उसे गाने का अंदाज़—ये सभी उसके सांस्कृतिक अर्थ का अभिन्न हिस्सा हैं।
इन दोनों ने मिलकर, कांगड़ा की लोक-आत्मा को सुरक्षित रखने के लिए धुन और अर्थ को एक साथ पिरोया है। कांगड़ा की लोक-आत्मा का एक संग्रह उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान 'लोकभाव स्वरांजलि' श्रृंखला है, जो तीन खंडों में 2015, 2017 और 2023 में प्रकाशित हुई। इन दोनों लेखकों ने मिलकर 300 से अधिक लुप्तप्राय कांगड़ी लोकगीतों को सहेजा है। यदि ऐसा न किया जाता, तो ये गीत उन पीढ़ियों के साथ ही हमेशा के लिए खत्म हो जाते, जो इन्हें अपने साथ संजोए हुए थीं।
धडवाल ने इन गीतों में छिपे 'भाव'—यानी भावनाओं, अर्थों और जीवन के अनुभवों—को गहराई से समझा, विशेष रूप से महिलाओं के दृष्टिकोण से। उन्होंने 'द ट्रिब्यून' को बताया, "मैंने इन गीतों में उस वैदिक सत्य को महसूस किया है, जो प्रकृति को सर्वोच्च स्थान देता है।" विवाह के दौरान होने वाली एक शुभ रस्म 'समुहत' में 'बाल दीपक बाल, लोये ना बाल-तेरिया लोयेया कौन कौन बैठे?' जैसा एक लोकप्रिय गीत सवाल-जवाब के रूप में गाया जाता है। इसमें ईश्वर से भी पहले सूर्य और चंद्रमा का आह्वान किया जाता है। 'तेरा सेहरा लाहौर तो आया' जैसे गीतों में लाहौर और पेशावर का जिक्र आना, इन गीतों के व्यापक सांस्कृतिक संबंधों को दर्शाता है।
वहीं, गुलेरिया ने इन गीतों की संगीत संरचना, लय और उस संदर्भ पर ध्यान केंद्रित किया है, जिसमें इन्हें गाया जाता था। इन खंडों में जन्म गीत, झिंझोरी गीत, विवाह गीत, लोकगाथा गीत और सुहाग गीत शामिल हैं। इनकी लय, सुर और गति को सुरक्षित रखने के लिए, इन्हें बहुत बारीकी से उनके मूल संगीत नोटेशन (स्वरलिपि) में दर्ज किया गया है। गुलेरिया इन धुनों को याद करते हुए पूरी तरह से उनमें खो जाते हैं—जैसे कि बच्चे के जन्म पर महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला 'चरखा बड़ा घुमेदार...' या शादी-ब्याह के मौकों पर गाया जाने वाला 'खोल श्यामा मेरे...'। उनके द्वारा तैयार किए गए ये नोटेशन एक अमूल्य धरोहर हैं।
गाँव के आँगन से लेकर अकादमिक शोध तक
आज के दौर में, जब पारंपरिक विवाह रीतियों की जगह मैरिज पैलेस, तेज़ संगीत और डीजे ने ले ली है, तो उनके इस काम की अहमियत और भी बढ़ गई है। नई पीढ़ी उन गीतों को खो सकती है, जो कभी मुंडन, जनेऊ और विवाह जैसे संस्कारों का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे; जबकि ये गीत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। "समुहत के दौरान गाए जाने वाले 'सुहाग' गीत महिलाओं से जुड़े सवालों को उठाते हैं और उनके सटीक जवाब भी देते हैं। वहीं, 'झमकड़ा' गीत बारात के विदा होने के बाद होने वाले स्वाभाविक उल्लास और आनंद को दर्शाते हैं।" गुलेरिया गर्व से बताते हैं कि 'लोकभाव स्वरांजलि' ग्रामीण परंपराओं को आगे बढ़ाने वालों—खासकर बुजुर्ग महिलाओं—के माध्यम से मौखिक धुनों को सहेजती है। यह 'स्वरंकन' (व्यवस्थित नोटेशन) के जरिए साहित्य और संगीत के बीच एक सेतु का काम करती है। केवल संकलन ही नहीं, बल्कि यह स्वर, आरोह-अवरोह, थाट, राग, ताल और गायन की बारीकियों का विश्लेषण भी करती है। इस तरह, यह लोक संगीत की शास्त्रीय नींव को मजबूत करती है, ताकि इसे विद्वतापूर्ण ढंग से संरक्षित और पुनर्जीवित किया जा सके।
वे आवाजें, जिन्हें खामोश नहीं होने देना है
कांगड़ा की सांस्कृतिक आत्मा केवल औपचारिक उत्सवों के मंचों पर ही नहीं बसती, बल्कि यह गांवों के आंगन में और उन बुजुर्ग महिलाओं की धुंधलाती यादों में भी मौजूद है, जिन्हें ये गीत दशकों पहले अपनी माताओं से विरासत में मिले थे। धडवाल और गुलेरिया का दृढ़ विश्वास है कि स्कूल और कॉलेज छात्रों को इस विरासत से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। वे न केवल गीतों और धुनों को, बल्कि उनके पीछे छिपे रीति-रिवाजों, भावनाओं और उन कहानियों को भी रिकॉर्ड कर सकते हैं, जो पीढ़ियों से विकसित होती रही हैं। हर खोया हुआ गीत अपने साथ हमारी सामूहिक स्मृति का एक हिस्सा भी ले जाता है। उनका यह काम यह सुनिश्चित करेगा कि कांगड़ा की संगीत विरासत, ढोलक की धीमी होती थाप के बाद भी जीवित रहे।