जम्मू-कश्मीर में खुलेंगी आतंक की पुरानी फाइलें! दशकों पुराने हत्याकांडों की दोबारा जांच की तैयारी
जम्मू-कश्मीर। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के दौर में हुई हत्याओं के दशकों पुराने मामलों की फाइलें एक बार फिर खोली जा सकती हैं। केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति पुराने आतंकी हत्याकांडों से संबंधित प्राथमिकियों (FIR) की समीक्षा कर रही है। इनमें ऐसे मामले शामिल हैं, जिनमें आरोपियों की पहचान नहीं हो सकी थी या पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में जांच आगे नहीं बढ़ पाई थी। सूत्रों के अनुसार, समिति कई मामलों का अध्ययन कर चुकी है और कुछ मामलों की दोबारा जांच को लेकर जल्द अंतिम निर्णय लिया जा सकता है।
बताया जा रहा है कि जिन मामलों में नए सिरे से जांच की संभावना होगी, उन्हें जम्मू-कश्मीर की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) या संबंधित जिला पुलिस को सौंपा जा सकता है। इस पहल का उद्देश्य आतंकवाद से प्रभावित परिवारों को न्याय दिलाना और उन मामलों की सच्चाई सामने लाना है, जो लंबे समय से अनसुलझे हैं।
उच्चस्तरीय समिति कर रही पुरानी FIR की समीक्षा
आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर प्रशासन की उच्चस्तरीय समिति ने आतंकवाद से जुड़े कई पुराने मामलों का अध्ययन किया है। इनमें अधिकतर मामले कश्मीर घाटी में 1980 के दशक के अंतिम वर्षों और 1990 के दशक के दौरान हुई हत्याओं से संबंधित हैं।
समिति यह जांच कर रही है कि पुराने मामलों में तत्कालीन जांच अधिकारियों ने पर्याप्त साक्ष्य जुटाए थे या नहीं। इसके अलावा यह भी देखा जा रहा है कि आरोपियों के खिलाफ उचित कानूनी प्रावधान लगाए गए थे या जांच में कोई ऐसी कमी रह गई थी, जिसके कारण मामले अदालत तक नहीं पहुंच पाए।
समिति इस बात पर भी विचार कर रही है कि संबंधित मामलों में अब कौन से साक्ष्य उपलब्ध हो सकते हैं और क्या उन्हें न्यायिक प्रक्रिया के जरिए तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जा सकता है।
SIA और जिला पुलिस को मिल सकते हैं नए मामले
सूत्रों के अनुसार, उच्चस्तरीय समिति की मंजूरी मिलने के बाद कुछ मामलों की जांच SIA को सौंपी जा सकती है, जबकि अन्य मामलों को संबंधित जिला पुलिस के हवाले किया जा सकता है।
फिलहाल कई पुराने हत्याकांडों की जांच SIA और जिला पुलिस के स्तर पर चल रही है। अधिकारियों का प्रयास है कि जिन मामलों में नए साक्ष्य सामने आ सकते हैं, उनमें दोबारा जांच शुरू करके आरोपियों की भूमिका निर्धारित की जाए।
हालांकि, सभी पुराने मामलों को एक साथ खोलने का निर्णय नहीं लिया गया है। प्रत्येक मामले के उपलब्ध दस्तावेजों, जांच की स्थिति और कानूनी पहलुओं का अलग-अलग मूल्यांकन किया जा रहा है।
तीन दशक पुराने मामलों में जांच बनी चुनौती
जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पुराने दस्तावेजों और साक्ष्यों की उपलब्धता है। कई मामलों में मूल एफआईआर, जांच रिपोर्ट और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज या तो गायब हैं या अधूरे पाए गए हैं।
इसके अलावा कुछ मामलों में संदिग्ध आरोपियों की मृत्यु हो चुकी है, जबकि कई लोगों का वर्तमान ठिकाना पता नहीं है। इतने लंबे समय बाद प्रत्यक्षदर्शियों का पता लगाना और उनके बयान दर्ज करना भी कठिन हो सकता है।
अधिकारियों का मानना है कि पुराने मामलों की जांच में आधुनिक तकनीक, उपलब्ध अभिलेख और गवाहों के बयान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, किसी भी आरोपी के खिलाफ अदालत में आरोप साबित करने के लिए कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य जुटाना आवश्यक होगा।
सरला भट्ट हत्याकांड में दाखिल हो चुकी चार्जशीट
SIA ने इससे पहले कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट्ट की हत्या के मामले में महत्वपूर्ण कार्रवाई की है। सरला भट्ट श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में कार्यरत थीं।
अप्रैल 1990 में उनका अपहरण किया गया था और बाद में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में SIA ने 737 पन्नों की चार्जशीट अदालत में दाखिल की है।
चार्जशीट में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के पूर्व प्रमुख मोहम्मद यासीन मलिक सहित पांच लोगों को आरोपी बनाया गया है। आरोपों पर न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार फैसला होना बाकी है।
इस मामले में आरोपपत्र दाखिल होने को पुराने आतंकी हत्याकांडों की जांच आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।
कश्मीरी पंडितों के कई चर्चित मामलों की जांच जारी
SIA कश्मीरी पंडित समुदाय से जुड़े कई पुराने हत्याकांडों की भी जांच कर रही है। इनमें लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता सर्वानंद कौल प्रेमी और उनके बेटे वीरेंद्र कौल की हत्या का मामला शामिल है।
दोनों की वर्ष 1990 में आतंकियों ने हत्या कर दी थी। इस मामले में SIA ने अगस्त 2026 में विभिन्न स्थानों पर तलाशी अभियान भी चलाया था।
इसके अलावा सेवानिवृत्त न्यायाधीश नीलकंठ गंजू और भाजपा नेता टीका लाल टपलू की हत्या के मामलों की भी दोबारा जांच शुरू की गई है।
इन घटनाओं ने उस दौर में कश्मीर घाटी की सुरक्षा स्थिति और अल्पसंख्यक समुदाय के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों को उजागर किया था।
वंधामा नरसंहार की जांच भी दोबारा शुरू
जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले में वर्ष 1998 में हुए वंधामा नरसंहार की जांच भी SIA ने फिर से शुरू की है।
25 और 26 जनवरी 1998 की दरमियानी रात आतंकियों ने वंधामा गांव में हमला कर 23 कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी थी। मृतकों में नौ महिलाएं और चार बच्चे भी शामिल थे।
करीब 28 साल पुराने इस मामले को अगस्त 2026 में दोबारा जांच के लिए खोला गया। एजेंसी का उद्देश्य घटना के जिम्मेदार लोगों की पहचान करना और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाना है।
SIA अधिकारियों ने पुराने मामलों में विश्वसनीय साक्ष्य जुटाने और गवाहों के बयानों के आधार पर जांच पूरी करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाना प्रमुख उद्देश्य
आतंकवाद के दौर में अपने परिजनों को खोने वाले कई परिवार लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अनेक मामलों में हत्या के आरोपियों की पहचान नहीं हो सकी या जांच अधूरी रह गई।
पुराने मामलों को फिर से खोलने की पहल से ऐसे परिवारों में उम्मीद जगी है कि घटनाओं की सच्चाई सामने आ सकेगी।
हालांकि, तीन दशक से अधिक पुराने मामलों में जांच को निर्णायक परिणाम तक पहुंचाना आसान नहीं होगा। साक्ष्यों की कमी और गवाहों की अनुपलब्धता जैसी समस्याएं एजेंसियों के सामने बनी हुई हैं।
जल्द लिया जा सकता है अंतिम फैसला
सूत्रों के मुताबिक, उच्चस्तरीय समिति कुछ और पुराने आतंकी हत्याकांडों की जांच दोबारा शुरू करने की अनुमति दे सकती है। इस संबंध में अंतिम निर्णय जल्द लिए जाने की संभावना है।
प्रशासन का प्रयास है कि जिन मामलों में न्यायिक कार्रवाई की वास्तविक संभावना है, उन्हें प्राथमिकता दी जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि जांच निष्पक्ष हो और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़े।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि समिति किन मामलों को फिर से खोलने की मंजूरी देती है और कितने मामले SIA तथा जिला पुलिस को सौंपे जाते हैं।