बेंगलुरु: विकलांगों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने केंद्र सरकार के उस फैसले की आलोचना की है, जिसमें विकलांगता पेंशन को 300 रुपये से बढ़ाकर 375 रुपये प्रति माह करने की बात कही गई है। इन संगठनों ने इस बढ़ोतरी को नाकाफी बताया है और कम से कम 5,000 रुपये प्रति माह पेंशन देने की मांग की है। साथ ही, उन्होंने वरिष्ठ नागरिकों और विधवाओं के लिए अधिक पेंशन, पेंशन पाने वालों के दायरे को बढ़ाने और महंगाई के हिसाब से समय-समय पर पेंशन राशि में संशोधन करने की भी मांग की है।

'नेशनल प्लेटफॉर्म फॉर द राइट्स ऑफ द डिसेबल्ड' (NPRD) के महासचिव मुरलीधरन ने कहा कि 75 रुपये की यह बढ़ोतरी लाभार्थियों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए बहुत कम है। उन्होंने कहा, "महीने भर के लिए, यहाँ तक कि रोज़ एक कप चाय पीने के लिए भी 300 रुपये काफी नहीं हैं। इतनी रकम से आप अपनी बुनियादी ज़रूरतें, खाना-पीना या दवा-इलाज का खर्च नहीं उठा सकते।"

मुरलीधरन ने बताया कि विकलांग व्यक्तियों को अक्सर स्वास्थ्य देखभाल, अपनी देखरेख, सहायक उपकरणों और आने-जाने (परिवहन) के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। पर्याप्त आर्थिक मदद न मिलने के कारण, इनमें से कई लोग अपने परिवारों पर निर्भर हो जाते हैं, जबकि वे परिवार खुद भी अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर सही मदद नहीं मिली, तो ये कमज़ोर लोग उपेक्षा का शिकार हो सकते हैं और बेघर भी हो सकते हैं।

मुरलीधरन ने इस बात पर सवाल उठाया कि जब 40% या उससे ज़्यादा विकलांगता वाले लोगों को भी पेंशन के योग्य माना गया है, तो फिर लाभार्थियों की संख्या पर एक सीमा (कैप) क्यों लगाई गई है? उन्होंने कहा कि जब तक केंद्र सरकार बजट आवंटन नहीं बढ़ाती और लाभार्थियों की संख्या की सीमा को नहीं हटाती, तब तक इन नए नियमों का कोई खास असर नहीं पड़ेगा। ये संगठन संसद सदस्यों और संसदीय समितियों के सामने भी यह मुद्दा उठा रहे हैं।

 

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