कावेरी जल विवाद: सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पानी छोड़ने पर फैसला करेगा कर्नाटक
बेंगलुरु। कावेरी जल बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद एक बार फिर गहरा गया है। कर्नाटक सरकार ने साफ कर दिया है कि तमिलनाडु को पानी छोड़ने के मामले में आगे की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई के परिणाम के आधार पर की जाएगी।
कर्नाटक के मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने बुधवार को इस मुद्दे पर जानकारी देते हुए कहा कि राज्य सरकार कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है और कोर्ट के आदेश के बाद ही अगला कदम उठाया जाएगा। उन्होंने कहा कि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के निर्देश को लेकर सरकार पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
पत्रकारों से बातचीत के दौरान रामलिंगा रेड्डी ने बताया कि उन्होंने बुधवार सुबह मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और संबंधित अधिकारियों के साथ कावेरी जल विवाद को लेकर चर्चा की थी। बैठक में जल उपलब्धता, प्राधिकरण के आदेश और कानूनी पहलुओं पर विचार-विमर्श किया गया।
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने इस मामले में कानूनी विशेषज्ञों से भी सलाह ली है। कर्नाटक सरकार का कहना है कि राज्य में जल संकट और किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कोई भी फैसला लिया जाएगा।
रामलिंगा रेड्डी ने बताया कि मंगलवार को कावेरी जल विनियमन समिति और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण की बैठक हुई थी। इन बैठकों के बाद कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए 12,000 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश दिया गया है।
उन्होंने कहा कि तमिलनाडु इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। ऐसे में कर्नाटक अब न्यायालय के फैसले का इंतजार करेगा। उन्होंने कहा कि कोर्ट के आदेश के आधार पर ही आगे की रणनीति तय की जाएगी।
कावेरी नदी का पानी लंबे समय से कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद का विषय रहा है। दोनों राज्यों के किसान सिंचाई के लिए कावेरी जल पर निर्भर हैं। बारिश कम होने या जलाशयों में पानी की कमी के समय यह विवाद और अधिक बढ़ जाता है।
कर्नाटक का तर्क है कि राज्य में भी पानी की जरूरतें काफी अधिक हैं और किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। राज्य के कई किसान संगठन तमिलनाडु को पानी छोड़े जाने के फैसले का विरोध कर रहे हैं।
वहीं तमिलनाडु सरकार का कहना है कि उसके किसानों की फसलों और जल जरूरतों को पूरा करने के लिए कावेरी नदी का पानी आवश्यक है। इसी मांग को लेकर तमिलनाडु ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।
कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण केंद्र सरकार के तहत काम करने वाली संस्था है, जो दोनों राज्यों के बीच पानी के बंटवारे से जुड़े मामलों पर निर्णय और निर्देश जारी करती है। इसके आदेशों को लेकर कई बार राज्यों में मतभेद सामने आते रहे हैं।
इस बार भी प्राधिकरण के 12,000 क्यूसेक पानी छोड़ने के निर्देश के बाद कर्नाटक में विरोध तेज हो गया है। कई कन्नड़ समर्थक संगठनों और किसान समूहों ने सरकार से राज्य के हितों को प्राथमिकता देने की मांग की है।
कर्नाटक सरकार अब इस मामले में कानूनी रास्ते पर आगे बढ़ने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और अधिकारियों की बैठक के बाद सरकार ने संकेत दिया है कि वह बिना कानूनी प्रक्रिया पूरी किए कोई बड़ा कदम नहीं उठाएगी।
राजनीतिक दृष्टि से भी कावेरी जल विवाद कर्नाटक में एक संवेदनशील मुद्दा माना जाता है। राज्य में किसान संगठनों और क्षेत्रीय समूहों की ओर से लगातार सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है।
फिलहाल सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर है। कोर्ट के फैसले के बाद ही यह तय होगा कि कर्नाटक सरकार कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के आदेश पर किस तरह आगे बढ़ती है।
कावेरी विवाद का स्थायी समाधान निकालना दोनों राज्यों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। जल बंटवारे को लेकर संतुलन बनाना और किसानों के हितों की रक्षा करना सरकारों के सामने सबसे अहम मुद्दा है।