RTE राशि तय करने की मांग तेज

Update: 2026-08-06 06:29 GMT

बेंगलुरु। कर्नाटक के प्राइमरी और सेकेंडरी स्कूलों के मैनेजमेंट एसोसिएशन ने शिक्षा के अधिकार (RTE) कानून के तहत निजी स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों के लिए सरकार की ओर से दिए जाने वाले ‘प्रति बच्चा खर्च’ की राशि को एक समान और मानकीकृत करने की मांग की है।

एसोसिएशन ने इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर केंद्र सरकार से पूरे देश में एक समान दर तय करने की अपील की है। संगठन का कहना है कि अलग-अलग राज्यों में निजी स्कूलों को मिलने वाली प्रतिपूर्ति राशि में काफी अंतर है, जिससे स्कूलों के संचालन और शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ रहा है।

राज्यों में राशि में भारी अंतर का दावा

स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन ने अपने पत्र में कहा है कि RTE के तहत निजी स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों की फीस की भरपाई सरकार की ओर से की जाती है, लेकिन राज्यों में तय की गई राशि में बड़ा अंतर देखने को मिलता है।

संगठन के अनुसार, कुछ राज्यों में प्रति बच्चे के लिए मिलने वाली राशि काफी अधिक है, जबकि कई राज्यों में यह राशि इतनी कम है कि स्कूलों के लिए खर्च निकालना मुश्किल हो जाता है।

एसोसिएशन ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि पूरे देश के लिए एक न्यूनतम मानक राशि तय की जाए, ताकि सभी राज्यों में बच्चों को समान शिक्षा सुविधाएं मिल सकें।

तमिलनाडु में सबसे अधिक राशि का दावा

एसोसिएशन ने बताया कि तमिलनाडु में RTE के तहत निजी स्कूलों को मिलने वाली ‘प्रति बच्चा खर्च’ राशि देश में सबसे अधिक है।

संगठन के मुताबिक, तमिलनाडु में यह राशि लगभग 25,155 रुपये से 33,806 रुपये के बीच है।

वहीं, एसोसिएशन ने बताया कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में यह राशि करीब 19,176 रुपये, त्रिपुरा में 21,138 रुपये और महाराष्ट्र में लगभग 17,670 रुपये है।

कर्नाटक और मध्य प्रदेश में कम राशि का मुद्दा

स्कूल एसोसिएशन ने कर्नाटक और मध्य प्रदेश में मिलने वाली राशि को लेकर भी चिंता जताई है।

संगठन के अनुसार, मध्य प्रदेश में निजी स्कूलों को प्रति बच्चे के लिए केवल 4,419 रुपये दिए जाते हैं, जो कई अन्य राज्यों की तुलना में काफी कम है।

वहीं, कर्नाटक में यह राशि लगभग 8,000 रुपये से 16,000 रुपये के बीच बताई गई है।

एसोसिएशन का कहना है कि इतनी कम राशि में स्कूलों के लिए RTE छात्रों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

शिक्षा की गुणवत्ता पर असर का दावा

स्कूल प्रबंधन संगठनों का कहना है कि RTE के तहत दाखिला लेने वाले बच्चों को भी अन्य छात्रों की तरह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर बुनियादी सुविधाएं और योग्य शिक्षकों की जरूरत होती है।

उनका तर्क है कि यदि सरकार की ओर से मिलने वाली राशि वास्तविक खर्च के अनुरूप नहीं होगी तो निजी स्कूलों पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा और इसका असर शिक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है।

केंद्र से नीति बनाने की मांग

एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि केंद्र सरकार राज्यों के साथ मिलकर RTE के तहत प्रतिपूर्ति राशि के लिए एक राष्ट्रीय मानक तैयार करे।

संगठन का कहना है कि एक समान नीति बनने से राज्यों के बीच असमानता कम होगी और निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भी बेहतर सुविधाएं मिल सकेंगी।

RTE छात्रों के हित में फैसले की मांग

स्कूल एसोसिएशन ने कहा कि उनकी मांग केवल स्कूलों के आर्थिक हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य RTE के तहत पढ़ने वाले बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराना भी है।

संगठन ने केंद्र सरकार से इस मामले में जल्द हस्तक्षेप करने और सभी राज्यों के लिए व्यावहारिक दर तय करने की मांग की है।

आगे केंद्र के फैसले पर नजर

अब सभी की नजर केंद्र सरकार के रुख पर है। यदि केंद्र सरकार इस मांग पर विचार करती है तो RTE के तहत निजी स्कूलों को मिलने वाली राशि को लेकर देशभर में एक नई व्यवस्था लागू हो सकती है।

स्कूल संगठनों का मानना है कि समान ‘प्रति बच्चा खर्च’ तय होने से शिक्षा क्षेत्र में वित्तीय संतुलन आएगा और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।

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