बेंगलुरु : कर्नाटक की महत्वाकांक्षी कलासा-बंदूरी पेयजल परियोजना को एक बार फिर केंद्र सरकार से झटका लगा है। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने परियोजना के लिए मांगी गई वन्यजीव मंजूरी (Wildlife Clearance) से जुड़े कर्नाटक सरकार के प्रस्ताव को वापस भेज दिया है। यह परियोजना महादयी वन्यजीव अभयारण्य (Mahadayi Wildlife Sanctuary) के क्षेत्र से जुड़ी हुई है और लंबे समय से विवादों में रही है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस संबंध में कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को पत्र लिखकर जानकारी दी है। पत्र में कहा गया है कि राज्य सरकार द्वारा भेजे गए प्रस्ताव को इसलिए वापस किया गया है, क्योंकि इससे संबंधित मामला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद कलासा-बंदूरी परियोजना को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर फिर से चर्चा शुरू हो गई है। कर्नाटक सरकार लंबे समय से इस परियोजना को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है, जबकि पर्यावरणीय और कानूनी बाधाओं के कारण इसमें लगातार देरी हो रही है।
मुख्यमंत्री ने मांगी थी वन्यजीव मंजूरी
कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने 23 दिसंबर 2025 को केंद्र सरकार को पत्र लिखकर कलासा-बंदूरी पेयजल परियोजना के लिए वन्यजीव मंजूरी देने का अनुरोध किया था। यह परियोजना बेलगावी जिले के खानापुर तालुक के पास प्रस्तावित है।
राज्य सरकार का कहना है कि यह परियोजना उत्तरी कर्नाटक के कई क्षेत्रों की पेयजल जरूरतों को पूरा करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। खासकर सूखे और जल संकट से प्रभावित इलाकों के लिए कलासा-बंदूरी परियोजना को लंबे समय से एक बड़ी उम्मीद के तौर पर देखा जा रहा है।
कर्नाटक सरकार का तर्क है कि परियोजना पूरी होने से क्षेत्र के लोगों को स्थायी पेयजल उपलब्ध कराया जा सकेगा। हालांकि, परियोजना के लिए पर्यावरणीय और वन्यजीव संबंधी मंजूरी जरूरी है, क्योंकि इसका एक हिस्सा संवेदनशील वन क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।
महादयी अभयारण्य से जुड़ा है विवाद
कलासा-बंदूरी परियोजना महादयी नदी के पानी के उपयोग से संबंधित है। इस परियोजना के तहत कर्नाटक महादयी नदी की सहायक नदियों कलासा और बंदूरी नालों के पानी को मोड़कर उत्तरी कर्नाटक के क्षेत्रों तक पहुंचाना चाहता है।
परियोजना का क्षेत्र महादयी वन्यजीव अभयारण्य के आसपास आता है, जिसके कारण पर्यावरणीय मंजूरी का मुद्दा सामने आया है। वन्यजीव संरक्षण नियमों के तहत ऐसे क्षेत्रों में किसी भी बड़े निर्माण या जल परियोजना के लिए विशेष अनुमति की आवश्यकता होती है।
केंद्र सरकार ने इसी आधार पर प्रस्ताव को वापस भेजते हुए सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले का हवाला दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित है विवाद
कर्नाटक सरकार ने अक्टूबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट में एक अंतरिम याचिका दायर की थी। इस याचिका में गोवा के मुख्य वन्यजीव वार्डन द्वारा 29 मार्च 2023 को जारी आदेश को चुनौती दी गई थी।
कर्नाटक सरकार का कहना था कि परियोजना के लिए आवश्यक प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने में संबंधित आदेश बाधा बन रहा है। वहीं, पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े पहलुओं को लेकर गोवा और अन्य पक्षों की आपत्तियां रही हैं।
चूंकि मामला अभी सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए केंद्र सरकार ने वन्यजीव मंजूरी के प्रस्ताव पर आगे बढ़ने के बजाय इसे वापस भेजने का फैसला किया है।
पेयजल संकट से जूझ रहे क्षेत्रों के लिए अहम परियोजना
कलासा-बंदूरी परियोजना को कर्नाटक के उत्तरी हिस्सों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। राज्य सरकार के अनुसार, धारवाड़, गडग, बेलगावी और आसपास के क्षेत्रों में पेयजल की समस्या को दूर करने के लिए यह परियोजना जरूरी है।
इन क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान पानी की कमी एक बड़ी समस्या बन जाती है। सरकार का कहना है कि परियोजना के पूरा होने से लाखों लोगों को लाभ मिलेगा और लंबे समय से चली आ रही जल समस्या का समाधान हो सकेगा।
हालांकि, पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी परियोजना को आगे बढ़ाने से पहले वन्यजीवों, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन जरूरी है।
राज्य सरकार के लिए बढ़ी चुनौती
केंद्र द्वारा प्रस्ताव लौटाए जाने के बाद कर्नाटक सरकार के सामने अब कानूनी और पर्यावरणीय प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की चुनौती बढ़ गई है। राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले के समाधान का इंतजार करना होगा।
फिलहाल कलासा-बंदूरी परियोजना एक बार फिर कानूनी पेच में फंस गई है। कर्नाटक सरकार जहां इसे क्षेत्र की पेयजल जरूरतों के लिए जरूरी बता रही है, वहीं पर्यावरणीय मंजूरी और न्यायिक प्रक्रिया इसके क्रियान्वयन की राह में बड़ी बाधा बनी हुई है।