उराली जनजाति की पहली डॉक्टर बनीं डॉ. शरण्या, स्वास्थ्य मंत्री ने फोन कर दी बधाई
इडुक्की। केरल की उराली जनजाति समुदाय से आने वाली डॉ. शरण्या मोहन ने कठिन परिस्थितियों को पार करते हुए बड़ी उपलब्धि हासिल की है। वह अपने समुदाय की पहली डॉक्टर बनी हैं, जिन्होंने मेडिकल शिक्षा पूरी करने के बाद अब अपने ही लोगों की सेवा करने का संकल्प लिया है। उनकी इस सफलता पर केरल के स्वास्थ्य मंत्री के.ए. तुलसी ने फोन कर उन्हें बधाई दी और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
डॉ. शरण्या मोहन ने इडुक्की जिले के कन्नमपाडी वन क्षेत्र से निकलकर यह मुकाम हासिल किया है। जंगल और दुर्गम इलाके में रहने वाले आदिवासी समुदाय से आने वाली शरण्या ने कई चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी की और अब डॉक्टर बनकर अपने समुदाय के लिए काम करने जा रही हैं।
शरण्या ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति विकास विभाग की देखरेख में संचालित पलक्कड़ सरकारी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने अपनी पढ़ाई में शानदार प्रदर्शन करते हुए फर्स्ट क्लास हासिल किया। उनकी सफलता को आदिवासी समुदाय के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है।
स्वास्थ्य मंत्री के.ए. तुलसी ने शरण्या से बातचीत करते हुए उनकी मेहनत और लगन की सराहना की। उन्होंने कहा कि विभाग के अंतर्गत आने वाले संस्थान से शिक्षा प्राप्त कर अपने ही समुदाय के लोगों की सेवा के लिए डॉक्टर बनना गर्व का विषय है।
मंत्री ने कहा कि डॉ. शरण्या की सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह पूरे आदिवासी समाज और देश के लिए प्रेरणा है। उन्होंने कहा कि शरण्या ने यह साबित कर दिया है कि कठिन परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के बावजूद मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि शरण्या की उपलब्धि आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले अन्य विद्यार्थियों के लिए उम्मीद और प्रेरणा का स्रोत बनेगी। इससे युवाओं को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने और अपने सपनों को पूरा करने का हौसला मिलेगा।
स्वास्थ्य मंत्री ने शरण्या के माता-पिता से भी बातचीत की और बेटी की सफलता के लिए उन्हें बधाई दी। उन्होंने कहा कि माता-पिता के सहयोग और त्याग के बिना ऐसी उपलब्धियां हासिल करना आसान नहीं होता।
मंत्री ने यह भी घोषणा की कि जब वह अगली बार इडुक्की जाएंगे तो व्यक्तिगत रूप से डॉ. शरण्या से मुलाकात करेंगे। उन्होंने कहा कि शरण्या की कहानी को समाज के सामने लाने की जरूरत है, ताकि अन्य आदिवासी छात्र भी इससे प्रेरणा ले सकें।
डॉ. शरण्या की सफलता उन छात्रों के लिए विशेष संदेश है, जो दूरदराज और सुविधाओं से वंचित क्षेत्रों में रहकर पढ़ाई करते हैं। उन्होंने दिखाया है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, लक्ष्य के प्रति समर्पण और मेहनत से सफलता हासिल की जा सकती है।
कन्नमपाडी जैसे वन क्षेत्र से निकलकर मेडिकल कॉलेज तक का सफर शरण्या के लिए आसान नहीं था। उन्हें पढ़ाई के दौरान कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार प्रयास करती रहीं।
आदिवासी समुदायों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रही है। ऐसे में उसी समुदाय से एक डॉक्टर का सामने आना स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि डॉ. शरण्या की उपलब्धि पूरे क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है। उनके डॉक्टर बनने से समुदाय के लोगों को उम्मीद है कि अब उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं में बेहतर सहयोग मिलेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि आदिवासी क्षेत्रों से आने वाले युवाओं की सफलता समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकती है। जब वंचित समुदायों के युवा शिक्षा और पेशेवर क्षेत्रों में आगे बढ़ते हैं तो इससे पूरे समाज का विकास होता है।
डॉ. शरण्या मोहन की कहानी संघर्ष, मेहनत और सफलता का उदाहरण बन गई है। उनकी उपलब्धि न केवल उराली जनजाति के लिए गर्व का क्षण है, बल्कि उन सभी छात्रों के लिए प्रेरणा है जो विपरीत परिस्थितियों में अपने सपनों को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं।