मुंबई: लीलावती अस्पताल से जुड़े बहुचर्चित 'काला जादू' मामले में एक अहम घटनाक्रम के तहत, मझगांव स्थित ग्रेटर मुंबई सत्र न्यायालय ने निकेत विजय मेहता के खिलाफ जारी समन को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि फर्श के नीचे अनुष्ठान में इस्तेमाल होने वाले कलशों का मिलना मात्र ही कोई आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कुणाल धनाजी जाधव ने 'क्रिमिनल रिवीजन एप्लिकेशन नंबर 01/2026' को स्वीकार कर लिया और बांद्रा, मुंबई की 12वीं अदालत के न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) द्वारा 8 दिसंबर, 2025 को दिए गए आदेश को खारिज कर दिया।
दरअसल, प्रशांत मेहता ने एक शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें उन्होंने खुद को 'लीलावती कीर्तिलाल मेहता मेडिकल ट्रस्ट' का स्थायी ट्रस्टी बताया। प्रशांत का आरोप था कि 18 सितंबर, 2023 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जब उन्होंने ट्रस्ट का प्रशासन संभाला, तो 21 सितंबर, 2024 को उनके केबिन के फर्श के नीचे तांबे के आठ कलश मिले।
उन्होंने आरोप लगाया कि इन कलशों में इंसानी अवशेष, चावल, बाल, राख और ऐसी अन्य चीजें थीं, जिनका संबंध कथित तौर पर 'काला जादू' या तंत्र-मंत्र से हो सकता है। अपनी शिकायत में उन्होंने पूर्व प्रबंधन सदस्यों—जिनमें निकेत मेहता और छह अन्य लोग शामिल हैं—पर आरोप लगाया कि उन्होंने अलौकिक आशीर्वाद पाने और ट्रस्टियों को नुकसान पहुंचाने के लिए तंत्र-मंत्र का सहारा लिया।
हालांकि, सत्र न्यायालय ने शिकायत और पेश किए गए सबूतों में कई कमियां पाईं। अदालत ने कहा कि इस बात का कोई स्पष्ट विवरण नहीं है कि कलश किसने दबाए, कब दबाए गए, या इसमें प्रत्येक आरोपी की कथित भूमिका क्या थी।
अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि मामले में कोई फोरेंसिक सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि मिली हुई हड्डियां इंसानी अवशेष थीं, या फिर बाल और अन्य चीजें किसी गैर-कानूनी गतिविधि से जुड़ी थीं।
महत्वपूर्ण बात यह भी है कि न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि चावल, पवित्र जल, सिक्के या अन्य सामग्री वाले कलशों को जमीन में दबाना, हिंदू धर्म में 'वास्तु' और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ी एक पारंपरिक प्रथा का हिस्सा हो सकता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी प्रतिबंधित कृत्य का सबूत न हो, या नुकसान पहुंचाने, धोखा देने या डर पैदा करने के इरादे का पता न चले, तब तक ऐसी प्रथाओं को अपने आप में आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। यह निष्कर्ष निकालते हुए कि मजिस्ट्रेट का समन जारी करने का आदेश कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं था और इसके लिए पर्याप्त आधार नहीं थे, सत्र न्यायालय ने पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार कर लिया और निकेत मेहता के खिलाफ जारी समन को रद्द कर दिया।
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