महाराष्ट्र के दही हांडी उत्सव को UNESCO टैग दिलाने की तैयारी, जन्माष्टमी पर बढ़ी उम्मीद
मुंबई। जन्माष्टमी के उत्साह के बीच महाराष्ट्र अपने विश्व प्रसिद्ध दही हांडी उत्सव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने की तैयारी कर रहा है। राज्य की ओर से दही हांडी परंपरा के लिए UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी मान्यता हासिल करने की दिशा में प्रयास किए जाने की बात सामने आई है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव से जुड़ी यह परंपरा महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें ‘गोविंदा’ की टोलियां मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर बंधी दही से भरी मटकी को तोड़ती हैं।
महाराष्ट्र में दही हांडी का आयोजन कृष्ण जन्माष्टमी या गोकुलाष्टमी के अगले दिन बड़े उत्साह के साथ किया जाता है। मुंबई, ठाणे और महाराष्ट्र के कई अन्य शहरों में इसका खास आकर्षण देखने को मिलता है। दही हांडी के दिन अलग-अलग गोविंदा मंडलियां मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर लटकी हांडी तक पहुंचने का प्रयास करती हैं।
इस परंपरा को भगवान श्रीकृष्ण के बचपन की लीलाओं से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बाल कृष्ण अपने मित्रों के साथ घरों में रखे दही और मक्खन तक पहुंचने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाते थे। इसी प्रसंग की स्मृति में दही हांडी उत्सव मनाने की परंपरा विकसित हुई। समय के साथ महाराष्ट्र में यह धार्मिक आयोजन एक बड़े सांस्कृतिक और सामुदायिक उत्सव का रूप ले चुका है।
दही हांडी की सबसे बड़ी पहचान मानव पिरामिड है। इसमें गोविंदा एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर कई स्तरों वाला पिरामिड तैयार करते हैं। सबसे ऊपर पहुंचने वाला गोविंदा ऊंचाई पर बंधी हांडी को तोड़ता है। इस दौरान आसपास मौजूद लोगों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिलता है।
दही हांडी के लिए गोविंदा मंडलियां कई सप्ताह पहले से अभ्यास शुरू कर देती हैं। मानव पिरामिड तैयार करने के लिए शारीरिक फिटनेस के साथ टीम के सदस्यों के बीच बेहतर तालमेल और संतुलन की जरूरत होती है। अलग-अलग स्तरों पर खड़े सदस्यों की जिम्मेदारी तय होती है और सबसे ऊपर अपेक्षाकृत हल्के सदस्य को भेजा जाता है।
महाराष्ट्र में यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। वर्षों से दही हांडी ने एक बड़े सार्वजनिक उत्सव का रूप ले लिया है। मुंबई और ठाणे में कई स्थानों पर बड़े आयोजन किए जाते हैं, जहां गोविंदा मंडलियों के बीच प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिलती है। हजारों लोग इन आयोजनों को देखने के लिए पहुंचते हैं।
अब इस सांस्कृतिक परंपरा को UNESCO स्तर पर पहचान दिलाने की कोशिश से दही हांडी एक बार फिर चर्चा में है। UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी मान्यता किसी समुदाय की परंपराओं, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों, रीति-रिवाजों और पीढ़ियों से चली आ रही विरासत के संरक्षण और वैश्विक पहचान के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
दही हांडी के समर्थकों का मानना है कि यह परंपरा सामूहिकता और टीम भावना का भी उदाहरण पेश करती है। मानव पिरामिड किसी एक व्यक्ति के प्रयास से नहीं बन सकता। नीचे से लेकर सबसे ऊपर तक प्रत्येक सदस्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। संतुलन और आपसी भरोसे के बिना पिरामिड को सफलतापूर्वक पूरा करना मुश्किल होता है।
हालांकि दही हांडी के आयोजन में सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। ऊंचे मानव पिरामिड बनाने के दौरान गोविंदाओं के गिरने और घायल होने का खतरा रहता है। इसी वजह से आयोजनों के दौरान सुरक्षा उपकरणों, चिकित्सा सुविधाओं और अन्य सावधानियों पर लगातार जोर दिया जाता है। किसी सांस्कृतिक परंपरा को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाने के साथ प्रतिभागियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
मुंबई में दही हांडी का उत्साह विशेष रूप से देखने को मिलता है। कई गोविंदा मंडलियां एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाकर अलग-अलग हांडियां फोड़ने की कोशिश करती हैं। सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर बड़ी संख्या में दर्शक जुटते हैं। ढोल-नगाड़ों, संगीत और ‘गोविंदा आला रे’ जैसे जयकारों के बीच पूरा माहौल उत्सव में बदल जाता है।
महाराष्ट्र में वर्षों से चली आ रही यह परंपरा स्थानीय समुदायों को भी जोड़ती है। गोविंदा मंडलियों में युवाओं की बड़ी भागीदारी रहती है। कई मंडलियां पूरे साल सामाजिक और सामुदायिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहती हैं। दही हांडी के समय उनकी गतिविधियां अपने चरम पर पहुंच जाती हैं।
UNESCO की मान्यता की दिशा में प्रयास सफल होने पर दही हांडी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान मिल सकती है। इससे महाराष्ट्र की इस सांस्कृतिक परंपरा के संरक्षण और दस्तावेजीकरण को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। साथ ही दुनिया के दूसरे देशों के लोगों को भी इसके धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व को समझने का अवसर मिलेगा।
भारत की कई सांस्कृतिक परंपराएं UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में स्थान बना चुकी हैं। ऐसी मान्यता संबंधित परंपरा को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने के साथ उसके संरक्षण की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है। दही हांडी के लिए संभावित प्रयास को भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जन्माष्टमी के नजदीक आते ही महाराष्ट्र में गोविंदा मंडलियों की तैयारियां और उत्साह बढ़ने लगता है। इस बार दही हांडी को UNESCO से जुड़ी वैश्विक पहचान दिलाने की कोशिश की चर्चा ने उत्सव को अतिरिक्त महत्व दे दिया है। यदि यह प्रयास आगे बढ़ता है और सफल होता है तो महाराष्ट्र की यह लोकप्रिय परंपरा वैश्विक सांस्कृतिक मंच पर नई पहचान हासिल कर सकती है।