भुवनेश्वर: नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने रविवार को कहा कि 2014 के बाद से शहरी क्षेत्र के लिए बजटीय आवंटन में 10 गुना वृद्धि हुई है। भारतीय शहरों में विकास को गति देने के लिए स्मार्ट सिटीज, अमृत (AMRUT), प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वच्छ भारत और शहरी आजीविका मिशन जैसे कई बड़े अभियानों के जरिए ठोस प्रयास शुरू किए गए हैं।
मेट्रो रेल और बस प्रणालियों में भी लगभग 3.7 लाख करोड़ रुपये का भारी निवेश किया गया है।
दूसरे राष्ट्रीय शहरी सम्मेलन (नेशनल अर्बन कॉन्क्लेव) के समापन सत्र को संबोधित करते हुए, पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा ने नीति आयोग की 'ग्रोथ हब' पहल के बारे में बताया। उन्होंने 2025-26 के बजट में शहरों को 'ग्रोथ हब' के रूप में विकसित करने के लिए घोषित 1 लाख करोड़ रुपये के 'अर्बन चैलेंज फंड' और इस साल के बजट में 7 शहरी आर्थिक क्षेत्रों के लिए पांच वर्षों में 5,000-5,000 करोड़ रुपये के आवंटन का जिक्र किया।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सेवा वितरण में सुधार लाने और नागरिकों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए, सही मायने में सशक्त शहरी सरकारों का होना बहुत जरूरी है। नीति आयोग और आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई रिपोर्ट 'मूविंग टुवर्ड्स इफेक्टिव सिटी गवर्नेंस' (प्रभावी शहरी शासन की ओर) का हवाला देते हुए, उन्होंने सुझाव दिया कि शहरों में 5 साल के कार्यकाल वाले सीधे चुने गए मेयर होने चाहिए, 'मेयर-इन-काउंसिल' प्रणाली लागू होनी चाहिए और नगर निकाय चुनाव समय पर होने चाहिए।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि 74वें संविधान संशोधन के अनुरूप, राज्यों को शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को सभी 18 कार्य सौंपने चाहिए, जिनमें मास्टर प्लानिंग, जलापूर्ति, अग्निशमन सेवाएं और यातायात प्रबंधन शामिल हैं। उन्होंने कहा कि राज्य की राजधानियों से शहरों का प्रभावी ढंग से संचालन नहीं किया जा सकता; इसलिए, स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए शहरी सरकारों के पास अधिकार और संस्थागत क्षमता होनी चाहिए। केवल इसी तरह से नागरिकों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है।
गौबा ने कहा कि नगर निकायों का राजस्व अभी भी कम है, और उन्होंने संपत्ति कर (प्रॉपर्टी टैक्स) तथा उपयोगकर्ता शुल्क (यूजर-चार्ज) की वसूली में सुधार करने का आह्वान किया। उन्होंने बताया कि हालांकि केंद्रीय वित्त आयोग द्वारा शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को दिए जाने वाले अनुदान में काफी वृद्धि हुई है (इनका हिस्सा 36 प्रतिशत से बढ़कर 45 प्रतिशत हो गया है), लेकिन राज्यों से शहरों को मिलने वाली धनराशि अभी भी कम है। उन्होंने कहा कि राज्य वित्त आयोगों का नियमित रूप से गठन किया जाना चाहिए और शहरी स्थानीय निकायों को पर्याप्त वित्तीय हस्तांतरण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
शहरी नियोजन और आवास के मुद्दे पर बात करते हुए, गौबा ने मौजूदा नियोजन ढांचे में व्यापक बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने ऐसे प्रतिबंधात्मक FAR (फ्लोर एरिया रेशियो) और निर्माण नियमों में सुधार की वकालत की, जो भूमि की उपलब्धता को सीमित करते हैं और आवासीय तथा व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं के लिए लागत बढ़ा देते हैं। उन्होंने भूमि की उपलब्धता बढ़ाने और आवास तथा आर्थिक गतिविधियों की लागत कम करने के लिए 'मिक्स्ड-यूज़ ज़ोनिंग' (मिश्रित उपयोग वाले क्षेत्र), ट्रांजिट हब (परिवहन केंद्रों) के आसपास विकास और 'लैंड पूलिंग' (भूमि एकत्रीकरण) को अपनाने पर जोर दिया।
उन्होंने प्रवासी श्रमिकों, औद्योगिक मजदूरों, छात्रों और युवा पेशेवरों के लिए किफायती किराये के आवास के महत्व को रेखांकित किया। साथ ही, उन्होंने राज्यों से आग्रह किया कि वे किराये के आवास की उपलब्धता बढ़ाने के लिए 'मॉडल टेनेंसी एक्ट' (आदर्श किरायेदारी अधिनियम) को अपनाएं।
गौबा ने कहा कि राज्य नए नगरपालिका अधिनियम लाकर इन सुधारों को लागू कर सकते हैं। उन्होंने आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) से आग्रह किया कि वह शहरी मिशनों के तहत मिलने वाली सहायता को इन सुधारों से जोड़कर इन्हें लागू करवाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की शहरी विकास क्षमता को पूरी तरह से सामने लाने और 'विकसित राज्यों' तथा 'विकसित भारत' के विजन को साकार करने के लिए सशक्त शहरी सरकारों का होना बहुत जरूरी है।
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