पुरी में रथ यात्रा, उमड़ा आस्था का सैलाब

Update: 2026-07-16 03:58 GMT

पुरी : भगवान श्री जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा के पावन अवसर पर गुरुवार को ओडिशा के पवित्र तीर्थ नगरी पुरी में आस्था का अभूतपूर्व जनसैलाब उमड़ पड़ा। देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक और धार्मिक आयोजन के साक्षी बनने के लिए पुरी पहुंचे। भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा अपने-अपने भव्य लकड़ी के रथों पर सवार होकर श्री जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर के लिए निकले। इस दिव्य यात्रा के दर्शन के लिए श्रद्धालु सुबह से ही ग्रैंड रोड (बड़ा डंडा) पर एकत्र होने लगे थे।

रथ यात्रा भारत के सबसे प्राचीन और भव्य धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाती है। इस दिन भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहन के साथ श्रीमंदिर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह यात्रा भगवान के अपनी मौसी के घर जाने का प्रतीक है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु भगवान के रथों को खींचने का सौभाग्य प्राप्त करने के लिए उत्सुक रहते हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान के रथ को खींचने से पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं।

सुबह से ही पुरी की सड़कों पर श्रद्धालुओं का सैलाब दिखाई देने लगा। ग्रैंड रोड पूरी तरह भक्तों से भर गया। भगवान जगन्नाथ के जयकारों, भजन-कीर्तन और शंखनाद से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में भगवान के दर्शन के लिए घंटों तक इंतजार करते रहे। जैसे ही तीनों देवताओं के रथ यात्रा के लिए आगे बढ़े, पूरा क्षेत्र "जय जगन्नाथ" के उद्घोष से गूंज उठा।

इस अवसर पर सबसे पहले भगवान बलभद्र के रथ 'तलध्वज', उसके बाद देवी सुभद्रा के रथ 'दर्पदलन' और अंत में भगवान जगन्नाथ के भव्य रथ 'नंदीघोष' को हजारों श्रद्धालुओं ने रस्सियों के माध्यम से खींचा। विशाल लकड़ी के इन रथों का निर्माण हर वर्ष विशेष परंपरा और धार्मिक विधि-विधान के अनुसार किया जाता है। इन रथों की भव्यता और कलात्मकता श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहती है।

रथ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और समानता का भी प्रतीक मानी जाती है। इस अवसर पर किसी भी जाति, वर्ग, धर्म या समुदाय का भेदभाव नहीं होता। हर व्यक्ति भगवान के रथ को खींच सकता है और इस दिव्य आयोजन में भागीदारी कर सकता है। यही कारण है कि रथ यात्रा को विश्वभर में भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक माना जाता है।

श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। हजारों पुलिसकर्मियों, केंद्रीय सुरक्षा बलों और आपदा प्रबंधन टीमों को तैनात किया गया है। ड्रोन कैमरों, सीसीटीवी निगरानी और अत्याधुनिक नियंत्रण कक्ष के माध्यम से पूरे आयोजन पर नजर रखी जा रही है। भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष बैरिकेडिंग, अलग-अलग प्रवेश और निकास मार्ग तथा चिकित्सा शिविरों की भी व्यवस्था की गई है। एम्बुलेंस, अग्निशमन दल और आपातकालीन सेवाओं को भी पूरी तरह तैयार रखा गया है।

ओडिशा सरकार और श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पेयजल, स्वास्थ्य सेवाएं, विश्राम स्थल और यातायात प्रबंधन की विशेष व्यवस्था की है। स्वयंसेवी संस्थाएं भी श्रद्धालुओं को सहायता उपलब्ध कराने में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। प्रशासन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लाखों श्रद्धालु सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से भगवान के दर्शन कर सकें।

रथ यात्रा का महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के अनेक देशों में बसे भारतीय समुदाय और भगवान जगन्नाथ के भक्त भी इस पर्व को बड़े उत्साह से मनाते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और अन्य देशों में भी भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है। यही कारण है कि पुरी की रथ यात्रा को वैश्विक धार्मिक आयोजनों में विशेष स्थान प्राप्त है।

धार्मिक विद्वानों के अनुसार, रथ यात्रा मानव जीवन में सेवा, समर्पण, समानता और भाईचारे का संदेश देती है। भगवान जगन्नाथ को 'विश्व के नाथ' के रूप में पूजा जाता है और उनकी रथ यात्रा यह संदेश देती है कि ईश्वर सभी के हैं तथा उनके दरबार में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है।

रथ यात्रा के दौरान तीनों देवता गुंडिचा मंदिर में नौ दिनों तक विराजमान रहेंगे। इसके बाद बहुदा यात्रा के माध्यम से वे पुनः श्री जगन्नाथ मंदिर लौटेंगे। इस अवधि में भी लाखों श्रद्धालु गुंडिचा मंदिर पहुंचकर भगवान के दर्शन करते हैं।

हर वर्ष की तरह इस बार भी रथ यात्रा ने श्रद्धा, आस्था और उत्साह का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया है। पुरी की ऐतिहासिक ग्रैंड रोड पर उमड़ा लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब इस बात का प्रमाण है कि भगवान जगन्नाथ के प्रति लोगों की आस्था समय के साथ और अधिक मजबूत होती जा रही है। यह महापर्व न केवल धार्मिक विश्वास का प्रतीक है, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक एकता और आध्यात्मिक चेतना का भी जीवंत उत्सव है।

Tags:    

Similar News