चंडीगढ़। पंजाब के फाजिल्का जिले में लंबे समय से बनी जलभराव और खारी भूमि की समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण पहल की है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान तलाशने के लिए छह सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (ICAR-CSSRI), करनाल के निदेशक की अध्यक्षता में गठित यह समिति प्रभावित क्षेत्रों का अध्ययन करेगी और कृषि भूमि को दोबारा खेती योग्य बनाने के लिए सुझाव देगी।पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार के इस फैसले का स्वागत किया। उन्होंने पंजाब के किसानों की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का आभार व्यक्त किया। ढिल्लों ने कहा कि यह पहल जलभराव से परेशान किसानों को स्थायी राहत दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है
छह सदस्यीय विशेषज्ञ समिति करेगी जमीनी अध्ययन
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा गठित समिति में कृषि और भूमि प्रबंधन से जुड़े छह विशेषज्ञ शामिल होंगे।समिति का नेतृत्व करनाल स्थित केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के निदेशक करेंगे।यह विशेषज्ञ दल फाजिल्का जिले के जलभराव प्रभावित क्षेत्रों का जमीनी अध्ययन करेगा। इस दौरान जलभराव की समस्या के कारणों, मिट्टी में बढ़ती लवणता और कृषि उत्पादन पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किया जाएगा।इसके आधार पर वैज्ञानिक और व्यावहारिक समाधान सुझाए जाएंगे, ताकि प्रभावित कृषि भूमि की उत्पादकता दोबारा बढ़ाई जा सके।
हर साल किसानों को उठाना पड़ता है नुकसान
पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने कहा कि फाजिल्का और आसपास के क्षेत्रों में किसान लंबे समय से जलभराव की समस्या का सामना कर रहे हैं।उनके अनुसार, खेतों में अत्यधिक पानी जमा होने और मिट्टी में लवणता बढ़ने के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित होता है। इससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।उन्होंने कहा कि विशेषज्ञ समिति समस्या के वास्तविक कारणों की पहचान करने के साथ स्थायी समाधान तैयार करने में मदद करेगी।ढिल्लों ने उम्मीद जताई कि इस पहल से प्रभावित भूमि को फिर से खेती योग्य बनाने का रास्ता खुलेगा।
खारी भूमि से खेती पर पड़ता है गंभीर असर
जलभराव और मिट्टी में लवणता बढ़ना कृषि के लिए गंभीर चुनौती मानी जाती है।जब खेतों में लंबे समय तक पानी जमा रहता है, तो पौधों की जड़ों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती। वहीं, मिट्टी में अधिक नमक जमा होने से पौधों के लिए पानी और पोषक तत्व ग्रहण करना मुश्किल हो सकता है।इससे फसलों की वृद्धि और उत्पादन प्रभावित होते हैं।केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान खारी और क्षारीय भूमि के सुधार, जल निकासी तथा खराब गुणवत्ता वाले सिंचाई जल के प्रबंधन से संबंधित तकनीकों पर अनुसंधान करता है।संस्थान ने जलभराव और लवणता से प्रभावित कृषि भूमि के सुधार के लिए भूमिगत जल निकासी सहित विभिन्न तकनीकों पर काम किया है।
वैज्ञानिक तरीकों से निकाला जाएगा समाधान
विशेषज्ञ समिति से अपेक्षा की जा रही है कि वह प्रभावित क्षेत्रों की परिस्थितियों के अनुसार वैज्ञानिक उपाय सुझाएगी।इनमें जल निकासी व्यवस्था में सुधार, मिट्टी की गुणवत्ता का आकलन और लवणता नियंत्रण जैसी संभावनाओं का अध्ययन किया जा सकता है।हालांकि, समिति की अंतिम सिफारिशें अभी सामने नहीं आई हैं। इसलिए कौन-सी तकनीक लागू की जाएगी और इस पर कितना खर्च आएगा, यह विस्तृत अध्ययन के बाद ही स्पष्ट होगा।विशेषज्ञों के अनुसार, जलभराव और खारी भूमि की समस्याओं का समाधान स्थानीय मिट्टी, भूजल स्तर और सिंचाई व्यवस्था को ध्यान में रखकर करना जरूरी होता है।
किसानों की आय बढ़ाने पर केंद्र का जोर
केवल सिंह ढिल्लों ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार किसानों के कल्याण और कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।उन्होंने बताया कि केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंहचौहान ने उन्हें पत्र के माध्यम से विशेषज्ञ समिति के गठन की जानकारी दी है।ढिल्लों के अनुसार, इस पहल से फाजिल्का के किसानों की वर्षों पुरानी समस्या का समाधान तलाशने में मदद मिलेगी। इससे कृषि भूमि की उत्पादकता और किसानों की आय में सुधार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
अब विशेषज्ञों की रिपोर्ट पर रहेंगी निगाहें
फाजिल्का में जलभराव और खारी भूमि की समस्या के समाधान के लिए गठित समिति के काम पर अब किसानों की निगाहें रहेंगी।समिति प्रभावित क्षेत्रों का अध्ययन करने के बाद अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करेगी। इन सुझावों के आधार पर आगे की कार्ययोजना तैयार की जा सकती है।फिलहाल केंद्र सरकार की यह पहल समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में शुरुआती कदम है। वास्तविक राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि विशेषज्ञों की सिफारिशों को किस तरह लागू किया जाता है और प्रभावित किसानों तक उनका लाभ कब पहुंचता है।