गायनी विभाग से लाखों के इंजेक्शन गायब PGI चंडीगढ़ में फर्जीवाड़े का भंडाफोड़
PGI चंडीगढ़ में मेडिकल सामान की चोरी लाखों के इंजेक्शन बेचने का खुलासा
चंडीगढ़ : चंडीगढ़ स्थित PGI में दवाओं की आपूर्ति और इस्तेमाल से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है। संस्थान के गायनी विभाग से लाखों रुपये कीमत के इंजेक्शन गायब होने और कथित तौर पर उन्हें मेडिकल स्टोर के जरिए बेचने का मामला सामने आने से हड़कंप मच गया है। मामला सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन और संबंधित जांच एजेंसियों की निगाहें अब इस पूरे नेटवर्क पर टिक गई हैं। मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि सरकारी अस्पताल में मरीजों के इलाज के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली दवाओं को कथित तौर पर बाहर बेचने का आरोप है। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो यह न केवल वित्तीय अनियमितता, बल्कि अस्पताल की दवा आपूर्ति व्यवस्था और मरीजों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर मामला होगा।
गायनी विभाग से गायब हुए लाखों के इंजेक्शन
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, PGI के गायनी विभाग में इस्तेमाल होने वाले कुछ महंगे इंजेक्शनों के स्टॉक में गड़बड़ी सामने आई। रिकॉर्ड में उपलब्ध दवाओं और वास्तविक स्टॉक के बीच अंतर पाए जाने के बाद मामले की जांच शुरू हुई। अस्पताल में दवाओं का स्टॉक सामान्य तौर पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत दर्ज किया जाता है। दवा कब आई, किस विभाग को कितनी मात्रा में दी गई और मरीजों के उपचार में कितनी इस्तेमाल हुई—इन सभी का रिकॉर्ड रखा जाता है। ऐसे में स्टॉक में बड़ा अंतर सामने आना व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
मेडिकल स्टोर तक कैसे पहुंची दवाएं?
मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि गायनी विभाग की बताई जा रही दवाओं के मेडिकल स्टोर के जरिए बेचे जाने का खुलासा हुआ है। इससे यह सवाल उठता है कि अस्पताल के भीतर से दवाएं बाहर कैसे निकलीं और उन्हें मेडिकल बाजार तक पहुंचाने में किन लोगों की भूमिका रही। जांच एजेंसियों के लिए अब यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि दवाओं की खरीद, स्टॉक, वितरण और बिक्री की पूरी श्रृंखला में कहां गड़बड़ी हुई।
लाखों रुपये की दवाओं का मामला
बताया जा रहा है कि गायनी विभाग से गायब इंजेक्शनों की कीमत लाखों रुपये में है। महंगी दवाओं के गायब होने से अस्पताल प्रशासन के सामने वित्तीय नुकसान के साथ-साथ दवा प्रबंधन की निगरानी पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। सरकारी संस्थानों में मरीजों को उपलब्ध कराई जाने वाली दवाओं की कीमत सार्वजनिक धन से जुड़ी होती है। इसलिए किसी भी तरह की चोरी या अवैध बिक्री से सरकारी खजाने को नुकसान पहुंच सकता है।
मरीजों के लिए भी चिंता का विषय
सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों के लिए दवाएं और इंजेक्शन बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। यदि किसी दवा का स्टॉक गलत तरीके से बाहर भेज दिया जाए तो जरूरतमंद मरीजों को उपचार के दौरान परेशानी हो सकती है। खासकर महंगे और विशेष उपचार में इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शनों की उपलब्धता प्रभावित होने से अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
रिकॉर्ड की जांच में सामने आ सकती है पूरी तस्वीर
इस मामले में जांचकर्ताओं के सामने सबसे अहम दस्तावेज अस्पताल के दवा स्टॉक और वितरण से जुड़े रिकॉर्ड होंगे। इन रिकॉर्ड के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि कितनी दवाएं खरीदी गईं, कितनी मात्रा में विभाग को मिलीं और कितनी दवाएं मरीजों के इलाज में इस्तेमाल की गईं। इसके अलावा संबंधित मेडिकल स्टोर के खरीद-बिक्री रिकॉर्ड की भी जांच महत्वपूर्ण होगी। इससे यह पता लगाया जा सकता है कि कथित तौर पर अस्पताल से बाहर गई दवाएं वहां तक किस माध्यम से पहुंचीं।
जिम्मेदार लोगों की पहचान बड़ी चुनौती
अगर अस्पताल की दवाएं अवैध तरीके से बाहर पहुंची हैं तो जांच में यह भी स्पष्ट करना होगा कि इसमें एक व्यक्ति शामिल था या पूरा नेटवर्क काम कर रहा था। दवा स्टोर, संबंधित विभाग, रिकॉर्ड संभालने वाले कर्मचारी और मेडिकल स्टोर के बीच किसी तरह का संपर्क था या नहीं—इन सभी पहलुओं की जांच की जा सकती है।
अस्पताल प्रशासन के सामने बड़ा सवाल
इस घटना के बाद PGI की दवा निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इतने बड़े संस्थान में दवाओं का स्टॉक व्यवस्थित रखने के लिए कई स्तरों पर निगरानी की व्यवस्था होती है। यदि बड़ी मात्रा में महंगे इंजेक्शन गायब हुए तो यह भी जांच का विषय होगा कि नियमित स्टॉक ऑडिट के दौरान यह अंतर पहले क्यों नहीं पकड़ा गया।
सख्त कार्रवाई की उम्मीद
ऐसे मामलों में जांच पूरी होने के बाद दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। साथ ही दवाओं की चोरी और अवैध बिक्री से हुए नुकसान की भरपाई का सवाल भी उठ सकता है। अस्पताल प्रशासन के लिए यह जरूरी होगा कि जांच निष्पक्ष तरीके से पूरी हो और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए दवा प्रबंधन प्रणाली को और मजबूत किया जाए।
डिजिटल निगरानी से कम हो सकती है गड़बड़ी
दवाओं के स्टॉक को डिजिटल तरीके से ट्रैक करने से ऐसी अनियमितताओं को कम किया जा सकता है। हर महंगी दवा के बैच नंबर, स्टॉक और मरीज को जारी की गई मात्रा का डिजिटल रिकॉर्ड रखने से दवा के पूरे सफर की निगरानी संभव हो सकती है।