पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक कैदी को आठ सप्ताह की पैरोल दी है, ताकि वह अपने बेटे की देखभाल कर सके। उसका बेटा 'डुचेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी' (DMD) से पीड़ित है, जो एक गंभीर आनुवंशिक (जेनेटिक) बीमारी है। अदालत ने कहा कि बच्चे की चिकित्सा जरूरतों का आकलन करते समय, आदर्श अस्पताल की स्थितियों के बजाय, स्वास्थ्य सेवा की जमीनी हकीकत को ध्यान में रखा जाना चाहिए। न्यायमूर्ति अनूप चितकारा और न्यायमूर्ति हरमीत सिंह देओल की खंडपीठ ने कहा कि कैदी की रिहाई को लेकर जताई गई आशंकाएं केवल अटकलों पर आधारित नहीं हो सकतीं।
अदालत ने कहा कि अधिकांश अस्पतालों में तीमारदारों (देखभाल करने वालों) का न होना, "पहाड़ों पर बिना हेडलाइट के रात में गाड़ी चलाने" जैसा है। चिकित्सा सुविधाओं में मौजूद असमानताओं को उजागर करने के लिए, पीठ ने "भारत में स्वास्थ्य सेवा के समक्ष चुनौतियां" (Challenges to Healthcare in India) नामक एक लेख का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि हालांकि आधुनिक और हाई-टेक अस्पतालों में तीमारदारों की जरूरत शायद न पड़े, लेकिन ज्यादातर अस्पतालों में मरीजों की देखभाल के लिए उनके परिवार वालों पर निर्भर रहना पड़ता है, खासकर तब जब मरीज की बीमारी गंभीर हो और वहां पैरामेडिकल स्टाफ की कमी हो।
अदालत ने गौर किया कि कैदी के बेटे को DMD के कारण 50 प्रतिशत विकलांगता का प्रमाण पत्र मिला है। यह एक ऐसी स्थिति है जो समय के साथ और बिगड़ सकती है, जिससे बच्चे को और अधिक सहारे की जरूरत पड़ेगी। अदालत ने जोर देकर कहा कि बच्चे को लगातार देखभाल और माता-पिता के साथ की जरूरत है, खासकर मेडिकल इमरजेंसी के समय, जब सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से तुरंत मदद मिलने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
पीठ ने कहा कि चिकित्सा साक्ष्यों के आधार पर पैरोल की मांग का मानवीय दृष्टिकोण से मूल्यांकन किया जाना चाहिए। केवल अपराध की प्रकृति या जोखिम की आशंकाओं के आधार पर इसे खारिज नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने पाया कि संबंधित आदेश में विकलांगता प्रमाण पत्र पर विचार नहीं किया गया, यह नहीं देखा गया कि क्या कोई और बच्चे की देखभाल कर सकता है, और न ही बच्चे की जरूरतों और संभावित जोखिमों के बीच कोई संतुलन बिठाया गया।
लुधियाना के जिला मजिस्ट्रेट के 21 मई के उस आदेश को रद्द करते हुए जिसमें पैरोल खारिज कर दी गई थी, अदालत ने कहा कि याचिका इसलिए खारिज की गई थी क्योंकि कैदी एक गंभीर अपराध के लिए सजा काट रहा है और 'नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट' (NDPS Act) के तहत एक अलग मामले में भी आरोपी है। हालांकि, पीठ ने कहा कि आदेश में यह कहीं नहीं बताया गया कि लंबित मामला किस तरह पैरोल के दुरुपयोग की संभावना पैदा करता है। साथ ही, इसमें ऐसा कोई ठोस आधार भी नहीं बताया गया जिससे यह लगे कि कैदी भाग सकता है या कोई और अपराध कर सकता है।
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