Chandigarh: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक आपराधिक मामले में फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट में हुई लंबी देरी पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने पाया कि मामले से जुड़ी केस प्रॉपर्टी करीब डेढ़ साल बाद FSL भेजी गई, लेकिन उसके बाद भी जांच रिपोर्ट समय पर प्राप्त नहीं हुई। इस पर नाराजगी जताते हुए हाई कोर्ट ने लुधियाना के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को मामले की जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। फोरेंसिक रिपोर्ट में अनावश्यक देरी से न केवल जांच प्रभावित होती है, बल्कि पीड़ित और आरोपी—दोनों के अधिकारों पर भी असर पड़ सकता है।
क्या है पूरा मामला?
मामला एक ऐसे आपराधिक प्रकरण से जुड़ा है, जिसमें जांच के लिए जब्त की गई केस प्रॉपर्टी को फोरेंसिक जांच हेतु FSL भेजा जाना था। रिकॉर्ड के अनुसार, इसे निर्धारित समय के बजाय करीब डेढ़ साल बाद प्रयोगशाला भेजा गया। इसके बाद भी रिपोर्ट लंबे समय तक लंबित रही, जिससे मुकदमे की सुनवाई प्रभावित हुई।
इसी देरी को लेकर मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए।
हाई कोर्ट ने जताई नाराजगी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियों और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे फोरेंसिक साक्ष्यों को समय पर प्रयोगशाला भेजें और रिपोर्ट भी निर्धारित अवधि में प्राप्त करें।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी लापरवाही न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब का कारण बनती है और इससे पूरे मामले की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
SSP लुधियाना को दिए गए निर्देश
हाई कोर्ट ने एसएसपी लुधियाना को निर्देश दिया कि—
मामले की विस्तृत जांच कराई जाए।
देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की पहचान की जाए।
यदि लापरवाही या कर्तव्य में चूक पाई जाती है तो नियमानुसार विभागीय कार्रवाई की जाए।
जांच की प्रगति से अदालत को अवगत कराया जाए।
FSL रिपोर्ट का महत्व
फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट आपराधिक मामलों में महत्वपूर्ण साक्ष्य मानी जाती है। इसके माध्यम से—
डीएनए परीक्षण,
फिंगरप्रिंट विश्लेषण,
हथियारों की जांच,
रासायनिक परीक्षण,
डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण,
जैसे वैज्ञानिक परीक्षण किए जाते हैं, जो अदालत में महत्वपूर्ण प्रमाण के रूप में पेश किए जाते हैं।
देरी से क्या होता है असर?
विशेषज्ञों के अनुसार, FSL रिपोर्ट में अत्यधिक देरी से—
मुकदमे की सुनवाई लंबी खिंच सकती है।
आरोप तय करने या दोषमुक्त करने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
पीड़ित पक्ष को न्याय मिलने में विलंब होता है।
जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं।
न्यायालय की सख्त टिप्पणी
हाई कोर्ट ने संकेत दिया कि जांच एजेंसियों को समयबद्ध तरीके से काम करना चाहिए और फोरेंसिक जांच में अनावश्यक विलंब को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में ऐसी लापरवाही दोहराई नहीं जानी चाहिए।
सुधार की आवश्यकता
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों से बचने के लिए—
केस प्रॉपर्टी समय पर FSL भेजी जाए।
प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ाई जाए।
डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम लागू किया जाए।
लंबित मामलों की नियमित समीक्षा हो।
पुलिस और FSL के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए।
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