बहन की देखभाल के लिए मांगी थी आठ सप्ताह की पैरोल
यह मामला दीपक उर्फ दीपू नाम के दोषी से संबंधित है। उसने हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्परेरी रिलीज) एक्ट, 2022 के तहत आठ सप्ताह की पैरोल मांगी थी।याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसकी मां का काफी समय पहले निधन हो चुका है। उसके पिता भी एक अन्य आपराधिक मामले में जेल में बंद हैं। परिवार में उसकी बहन है, जो संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी की परीक्षा की तैयारी कर रही है।
दोषी की ओर से दलील दी गई कि बहन की देखभाल करने के लिए परिवार में कोई अन्य सदस्य उपलब्ध नहीं है। इसलिए उसे कुछ समय के लिए जेल से बाहर आने की अनुमति दी जानी चाहिए।
हालांकि अदालत ने इस पारिवारिक परिस्थिति को मौजूदा सजा की शर्तों से छूट देने के लिए पर्याप्त नहीं माना।जस्टिस अनूप चितकारा और हरमीत सिंह देओल की पीठ ने सुनाया फैसलामामले की सुनवाई पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अनूप चितकारा और न्यायमूर्ति हरमीत सिंह देओल की खंडपीठ ने की।खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि दोषी को सुनाई गई सजा में स्पष्ट रूप से जीवनभर कारावास और पैरोल नहीं देने की शर्त शामिल है।
अदालत ने माना कि जब तक सजा सुनाने वाली अदालत के आदेश में मौजूद इस शर्त को संशोधित या निरस्त नहीं किया जाता, तब तक उसके विपरीत पैरोल देना उचित नहीं होगा।हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि बहन की देखभाल की आवश्यकता ऐसी आपातकालीन स्थिति साबित नहीं करती, जिसके आधार पर संबंधित कानून के तहत असाधारण राहत दी जाए।
2017 में दर्ज हुआ था गंभीर अपराध का मामला
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, दोषी के खिलाफ 20 जून 2017 को जींद सिटी पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई थी।मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 364, 302, 201 और 34 के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के प्रावधान शामिल थे।मामले की सुनवाई के बाद जींद के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 9 जनवरी 2020 को दोषी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
अदालत ने आदेश दिया था कि दोषी को अपने शेष प्राकृतिक जीवन तक जेल में रहना होगा और उसे पैरोल नहीं दी जाएगी। इसके साथ ही 23 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।इस सजा के खिलाफ दोषी की अपील हाई कोर्ट में लंबित है। वर्तमान आदेश केवल उसकी पैरोल याचिका से संबंधित है।जिला मजिस्ट्रेट ने पहले ही खारिज कर दी थी अर्जीदोषी ने सबसे पहले संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष पैरोल के लिए आवेदन किया था।
जिला मजिस्ट्रेट ने आवेदन खारिज कर दिया था। इसका प्रमुख कारण यह था कि निचली अदालत ने सजा सुनाते समय ही पैरोल पर प्रतिबंध लगाया था।इसके अलावा अपराध की गंभीरता, सजा की प्रकृति और समाज के हितों को भी ध्यान में रखा गया।प्रशासन के फैसले से असंतुष्ट होकर दोषी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की और आठ सप्ताह की अस्थायी रिहाई देने की मांग की।हाई कोर्ट ने उपलब्ध रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद जिला मजिस्ट्रेट के फैसले में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया।जेल में अनुशासन उल्लंघन का मामला भी आया सामनेसुनवाई के दौरान दोषी के जेल आचरण का मुद्दा भी सामने आया।
अदालत के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड में उल्लेख था कि दोषी को जेल के प्रिजन इनमेट कॉलिंग सिस्टम यानी PICS के दुरुपयोग के मामले में दंडित किया जा चुका है।यह व्यवस्था जेल में बंद कैदियों को निर्धारित नियमों के तहत टेलीफोन के माध्यम से संपर्क करने की सुविधा प्रदान करती है।अदालत ने इस तथ्य का भी संज्ञान लिया। हालांकि पैरोल अस्वीकार करने का मुख्य आधार सजा में पहले से मौजूद पैरोल प्रतिबंध और आपातकालीन परिस्थिति का अभाव रहा।
पैरोल कोई पूर्ण अधिकार नहीं: हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में पैरोल के कानूनी उद्देश्य को भी स्पष्ट किया।अदालत के अनुसार, पैरोल की व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि दोषी व्यक्ति आवश्यक परिस्थितियों में अपने परिवार और समाज से संपर्क बनाए रख सके तथा जरूरी व्यक्तिगत और घरेलू जिम्मेदारियां पूरी कर सके।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्रत्येक दोषी अपनी इच्छा के अनुसार जेल से अस्थायी रिहाई प्राप्त कर सकता है।पैरोल देना या अस्वीकार करना संबंधित कानून, सजा की शर्तों और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।अदालत ने स्पष्ट किया कि सक्षम प्राधिकारी उचित और कानूनी कारणों के आधार पर पैरोल देने से इनकार कर सकता है।भविष्य में आपात स्थिति होने पर फिर कर सकता है आवेदनहाई कोर्ट ने याचिका खारिज करने के बावजूद दोषी के लिए सीमित कानूनी विकल्प खुले रखे हैं।
अदालत ने कहा कि यदि भविष्य में कोई वास्तविक आपातकालीन परिस्थिति पैदा होती है, तो दोषी सक्षम प्राधिकारी के समक्ष नया आवेदन प्रस्तुत कर सकता है।इसके अलावा वह निचली अदालत द्वारा लगाई गई बिना पैरोल की सजा संबंधी शर्त को संशोधित या निरस्त कराने के लिए कानूनी उपाय अपना सकता है।
हालांकि जब तक यह शर्त प्रभावी है, तब तक उसके आधार पर पैरोल देने में कानूनी बाधा बनी रहेगी।खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि पैरोल याचिका पर दिया गया फैसला दोषसिद्धि के खिलाफ लंबित अपील के गुण-दोष पर कोई राय नहीं है।
पैरोल और जमानत में क्या अंतर है?
कानूनी दृष्टि से पैरोल और जमानत दो अलग व्यवस्थाएं हैं।जमानत आमतौर पर किसी आरोपी को निर्धारित शर्तों के तहत हिरासत से रिहा करने की प्रक्रिया है। वहीं पैरोल एक दोषसिद्ध व्यक्ति को सजा के दौरान सीमित अवधि के लिए अस्थायी रिहाई देने की व्यवस्था है।
पैरोल मिलने से दोषी की सजा समाप्त नहीं होती। निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद उसे सामान्यतः वापस जेल में आत्मसमर्पण करना पड़ता है।पैरोल की अनुमति संबंधित राज्य के कानून, जेल नियमों और सक्षम अधिकारी के निर्णय पर निर्भर करती है।हाई कोर्ट के फैसले से क्या संदेश मिला?पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का यह फैसला बताता है कि पैरोल से जुड़े मामलों में पारिवारिक कठिनाइयों के साथ सजा की कानूनी शर्तों का भी विशेष महत्व है।
अदालत ने यह स्वीकार किया कि पैरोल का उद्देश्य कैदियों को पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने का अवसर देना भी है, लेकिन गंभीर अपराधों में लगाई गई विशिष्ट सजा संबंधी शर्तों को बिना कानूनी आधार के नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जींद के इस मामले में दोषी की बहन की देखभाल की दलील पर्याप्त नहीं मानी गई और आठ सप्ताह की पैरोल याचिका खारिज कर दी गई।एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा के जींद जिले में नाबालिग से जुड़े गंभीर अपराध के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक दोषी को बड़ा झटका दिया है। हाई कोर्ट ने दोषी की आठ सप्ताह की पैरोल देने की मांग को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पैरोल किसी कैदी का पूर्ण अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि परिवार की देखभाल की जरूरत अपने आप में ऐसी आपातकालीन परिस्थिति नहीं बन जाती, जिसके आधार पर पहले से लागू पैरोल प्रतिबंध को नजरअंदाज किया जा सके। अदालत ने दोषी की बहन की देखभाल के लिए अस्थायी रिहाई की मांग को पर्याप्त आधार नहीं माना। इस फैसले में अदालत ने सजा की शर्तों, सार्वजनिक हित और पैरोल से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं।