जयपुर। राजस्थान के उदयपुर में वर्ष 2022 में हुए बहुचर्चित कन्हैयालाल हत्याकांड में राजस्थान हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले के आठ आरोपियों की ओर से दाखिल अपीलों को खारिज करते हुए विशेष एनआईए अदालत द्वारा आरोप तय करने के आदेश को बरकरार रखा है। इसके साथ ही आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA की धारा 16, 18 और 20 के तहत आरोप कायम रहेंगे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के चरण में किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जाता, बल्कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह देखा जाता है कि मुकदमा चलाने के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त आधार मौजूद हैं या नहीं।
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने 5 नवंबर 2026 को यह फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति समीर जैन की खंडपीठ ने आरोपियों की अपीलों पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर साक्ष्यों की विस्तृत जांच करना या उनकी विश्वसनीयता पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आरोप तय करते समय न्यायालय को यह देखना होता है कि अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत सामग्री प्रथम दृष्टया अपराध की ओर संकेत करती है या नहीं। इस दौरान अदालत को पूरे मुकदमे की तरह प्रत्येक साक्ष्य का मूल्यांकन करने की आवश्यकता नहीं होती।मामले में मुख्य आरोपी मोहम्मद रियाज अत्तारी और मोहम्मद गौस सहित कुल आठ आरोपियों ने विशेष एनआईए अदालत के आदेश को चुनौती दी थी। अपीलकर्ताओं में मोहसिन खान, आसिफ हुसैन, मोहम्मद मोहसीन, वसीम अली, मोहम्मद जावेद खान और मुस्लिम खान भी शामिल हैं। ये आरोपी अजमेर की केंद्रीय जेल में बंद हैं।
दरअसल, उदयपुर में 28 जून 2022 को दर्जी कन्हैयालाल की उनकी दुकान में हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। हत्या के बाद सामने आए वीडियो और घटना की परिस्थितियों को लेकर व्यापक आक्रोश देखने को मिला था। मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने जांच की जिम्मेदारी संभाली थी।अभियोजन पक्ष के अनुसार, कन्हैयालाल ने सोशल मीडिया पर एक टीवी कार्यक्रम में की गई विवादित टिप्पणी से जुड़ी सामग्री साझा की थी। आरोप है कि इसी कारण उन्हें निशाना बनाया गया। जांच एजेंसी ने आरोप लगाया कि हत्या से पहले धमकियां दी गई थीं और पूरे घटनाक्रम के पीछे आपराधिक साजिश थी।
एनआईए का आरोप है कि इस घटना का उद्देश्य केवल एक व्यक्ति की हत्या करना नहीं था, बल्कि धार्मिक भावनाओं को भड़काना और सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करना भी था। हालांकि, इन आरोपों की अंतिम सत्यता का निर्धारण ट्रायल के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।मामले में विशेष एनआईए अदालत ने 12 जनवरी 2024 को आरोप तय करने का आदेश दिया था। इसके बाद 13 फरवरी 2024 को आरोपों से संबंधित औपचारिक आदेश पारित किया गया। आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की हत्या, आपराधिक साजिश और अन्य संबंधित धाराओं के साथ UAPA तथा आर्म्स एक्ट के प्रावधानों के तहत आरोप तय किए गए थे।
आरोपियों ने निचली अदालत के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। बचाव पक्ष ने दलील दी कि मामले में उपलब्ध सामग्री के आधार पर UAPA की कठोर धाराएं लागू करना उचित नहीं है। आरोपियों की ओर से यह भी कहा गया कि बरामद वीडियो में ऐसी कोई सामग्री नहीं थी, जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने का निष्कर्ष निकाला जा सके।इसके अलावा बचाव पक्ष ने दावा किया कि आरोपियों के किसी गैरकानूनी संगठन का सदस्य होने के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं। इन तर्कों के आधार पर आरोपियों ने अपने खिलाफ तय किए गए आरोपों को हटाने की मांग की।
दूसरी ओर एनआईए ने इन दलीलों का विरोध किया। जांच एजेंसी का कहना था कि आपराधिक साजिश के मामलों में केवल किसी एक साक्ष्य को अलग करके नहीं देखा जा सकता। घटना से पहले और बाद की परिस्थितियां, कथित धमकियां, बरामद वीडियो और अन्य सामग्री को एक साथ देखकर मामले का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।एनआईए ने यह भी तर्क दिया कि UAPA की धारा 18 के तहत आतंकवादी कृत्य की साजिश और उससे संबंधित तैयारी के पहलुओं पर विचार किया जाना जरूरी है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि साजिश के मामलों में प्रत्येक परिस्थिति का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलना आवश्यक नहीं होता। कई बार अलग-अलग परिस्थितियों और घटनाओं को जोड़कर साजिश के अस्तित्व का अनुमान लगाया जा सकता है।अदालत ने कहा कि आपराधिक साजिश का निष्कर्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के समग्र प्रभाव से भी निकाला जा सकता है। हालांकि, अंतिम निष्कर्ष मुकदमे के दौरान साक्ष्यों की जांच और गवाहों की गवाही के बाद ही तय होगा।
खंडपीठ ने माना कि निचली अदालत के आदेश में ऐसी कोई स्पष्ट कानूनी त्रुटि या अधिकार क्षेत्र संबंधी कमी नहीं दिखाई देती, जिसके आधार पर हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए।अदालत ने कहा कि बचाव पक्ष की ओर से उठाए गए अधिकांश सवाल साक्ष्यों की विश्वसनीयता और उनके मूल्यांकन से जुड़े हैं। इन प्रश्नों पर मुकदमे की सुनवाई के दौरान विचार किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के आदेश को बरकरार रखने का अर्थ आरोपियों को दोषी घोषित करना नहीं है। किसी भी आपराधिक मामले में दोष सिद्ध करने के लिए अभियोजन पक्ष को कानून के
अनुसार
अपने आरोप प्रमाणित करने होते हैं।अदालत ने विशेष रूप से कहा कि उसके वर्तमान फैसले में की गई टिप्पणियां केवल अपीलों के निपटारे तक सीमित हैं। इनका असर ट्रायल कोर्ट द्वारा साक्ष्यों के स्वतंत्र मूल्यांकन पर नहीं पड़ना चाहिए।
अब विशेष एनआईए अदालत में मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी। अभियोजन पक्ष अपने साक्ष्य और गवाह प्रस्तुत करेगा, जबकि बचाव पक्ष को आरोपों का विरोध करने और अपने पक्ष में दलीलें रखने का पूरा अवसर मिलेगा।कन्हैयालाल हत्याकांड लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। इस मामले में आरोपियों के खिलाफ UAPA की धाराओं के तहत मुकदमा चलने को लेकर कानूनी बहस भी जारी रही है।
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