एसएमएस अस्पताल में पहली बार सफलतापूर्वक किया गया एचएलए-मिसमैच्ड ट्रांसप्लांट
एचएलए-मिसमैच्ड ट्रांसप्लांट करने वाला एसएमएस अस्पताल बना चर्चा में
जयपुर: एसएमएस मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के क्लिनिकल हीमेटोलॉजी विभाग ने जटिल रक्त संबंधी बीमारी फैंकोनी एनीमिया के उपचार में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। विभाग ने 22 वर्षीय रक्त चढ़ाने पर निर्भर मरीज का एचएलए-मिसमैच्ड एलोजेनिक बोन मैरो ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किया। विभाग में फैंकोनी एनीमिया के लिए इस प्रकार का यह पहला प्रत्यारोपण है। मरीज की वर्तमान चिकित्सकीय स्थिति स्थिर है और उसमें प्रत्यारोपित स्टेम सेल का सफलतापूर्वक स्थापित होना (इंग्राफ्टमेंट) और चिकित्सकीय सुधार दर्ज किया गया है।
क्लिनिकल हीमेटोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. विष्णु शर्मा ने बताया कि फैंकोनी एनीमिया एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है, जिसमें डीएनए की मरम्मत की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इससे धीरे-धीरे बोन मैरो फेल्योर हो सकता है और मरीज को बार-बार रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है। इस बीमारी में मायलोडिस्प्लास्टिक सिंड्रोम और एक्यूट मायलॉइड ल्यूकेमिया का खतरा भी बढ़ जाता है। बोन मैरो फेल्योर के उपचार के लिए एलोजेनिक हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल प्रत्यारोपण संभावित उपचारात्मक विकल्प है।
डॉ. शर्मा के अनुसार फैंकोनी एनीमिया के मरीजों में डीएनए की मरम्मत से जुड़ा जन्मजात दोष होने के कारण कीमोथेरेपी और विकिरण उपचार के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता होती है। इससे गंभीर दुष्प्रभाव और अंगों को नुकसान होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में विशेष रूप से अनुकूलित उपचार योजना, सावधानीपूर्वक तैयार की गई कंडीशनिंग प्रक्रिया और बेहतर सहायक चिकित्सा की आवश्यकता होती है।
एचएलए-मिसमैच्ड डोनर से प्रत्यारोपण होने पर ग्राफ्ट-वर्सेस-होस्ट डिजीज की रोकथाम, संक्रमण नियंत्रण और प्रत्यारोपण के बाद मरीज की निगरानी भी चुनौतीपूर्ण होती है। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए उपचार किया गया।
यह प्रत्यारोपण राजस्थान सरकार की मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य (मां) योजना के अंतर्गत किया गया। डॉ. विष्णु शर्मा के नेतृत्व में हुई इस प्रक्रिया में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. देवेश पराशर का महत्वपूर्ण योगदान रहा। प्रत्यारोपण टीम, नर्सिंग स्टाफ तथा ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन, पैथोलॉजी और प्रयोगशाला सेवाओं सहित सहयोगी विभागों के समन्वय से प्रक्रिया सफल हुई।
एसएमएस मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. दीपक माहेश्वरी ने इस उपलब्धि को संस्थान के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि विभाग में पहली बार इस प्रकार का एचएलए-मिसमैच्ड प्रत्यारोपण होना जटिल रक्त संबंधी बीमारियों के उपचार की दिशा में अहम कदम है। इससे उन मरीजों को नई उम्मीद मिलेगी, जिन्हें विशेष और संभावित रूप से रोगमुक्त करने वाले उपचार की आवश्यकता होती है।